वित्त मंत्रालय, भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) और भारतीय बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) द्वारा हाल में उठाए गए कदम बैंकों द्वारा बीमा पॉलिसियों की अनुचित तरीके से बिक्री पर अंकुश लगाने की राह तैयार कर रहे हैं। इनका मुख्य उद्देश्य पर्यवेक्षण संबंधी कमियां दूर करना, बैंकों को उनके जरिये बेची गई प्रत्येक बीमा पॉलिसी (बैंकाश्योरेंस) के लिए जवाबदेह बनाना और लेखा परीक्षा एवं उपयुक्तता जांच के साथ-साथ बैंक कर्मचारियों के लिए प्रोत्साहन संरचना सुव्यवस्थित करना है।
आरबीआई और आईआरडीएआई दोनों ने बैंकों और बीमा कंपनियों के लिए बैंक बीमा गतिविधियों हेतु व्यवस्था और जोखिम प्रबंधन ढांचा मजबूत करने की आवश्यकता पर बार-बार जोर दिया है। खासकर वित्त वर्ष 2025 में ग्राहकों को गुमराह कर बेची गईं पॉलिसियों और अनुचित कारोबार व्यवहारों की शिकायतों की संख्या 26,000 से अधिक होने के बाद यह मुहिम और तेज हो गई है। बैंकाश्योरेंस या बैंक बीमा की निगरानी न तो बैंकिंग नियामक और न ही बाजार नियामक द्वारा सक्रिय रूप से की गई है।
आरबीआई ने बैंकों द्वारा बेचे जाने वाले तीसरे पक्ष (थर्ड पार्टी) के उत्पादों के लिए आचरण और बिक्री संबंधी मानदंडों का मसौदा पहले ही जारी कर दिया है। आने वाले समय में बैंकिंग नियामक प्रत्येक बैंक की जोखिम-आधारित आंतरिक लेखा परीक्षा (आरबीआईए) प्रणाली की समीक्षा करने की योजना बना रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बेचा गया प्रत्येक बीमा उत्पाद एक सख्त जोखिम विश्लेषण परीक्षण से गुजरे।
आरबीआईए उत्पादों, प्रक्रियाओं और बैंकिंग प्रणाली में हर स्तर पर होने वाली कमियों पर नजर रखता है मगर शाखाओं से बेचे जा रहे तीसरे पक्ष के उत्पादों पर मौन रहा है। मजबूत अंकेक्षण (ऑडिट) प्रणाली और जोखिम विश्लेषण के अभाव में गलत तरीके से बिक्री हो सकती है जिससे केवल बैंकिंग सेवाओं की तलाश में शाखाओं में आने वाले ग्राहक असुरक्षित हो जाते हैं।
गलत तरीके से बेची गई पॉलिसियों को लेकर लगातार असंतोष बना हुआ है। क्या बैंक बीमा की पेशकश किए गए ग्राहकों के संतुष्टि अनुपात पर कोई डेटा उपलब्ध है? इसके अलावा, उत्पादों और आवश्यक दस्तावेज की जांच-पड़ताल के लिए बैंक शाखाओं में कोई नियमित ऑडिट भी नहीं होता है।
एक समाधान यह हो सकता है कि बैंक की शाखा से गैर-बैंकिंग उत्पाद बेचने वाले व्यक्ति के लिए ‘निर्दिष्ट व्यक्ति’ (एसपी) की विशिष्ट पहचान अनिवार्य कर दी जाए। यह प्रणाली पहले से ही लागू है मगर इसका पूरी तरह से पालन नहीं किया जाता है। अक्सर, बीमा उत्पादों को समझने के लिए प्रशिक्षित या कुशल न होने वाले भी बैंकर एसपी की भूमिका निभाते हैं। बैंकरों को केवल बैंकिंग उत्पादों से निपटना चाहिए वे एसपी का तमगा नहीं ले सकते।
बैंक बीमा उत्पादों पर प्रभाव अध्ययन में कुछ प्रमुख मापदंड और श्रेष्ठ व्यवहार शामिल किए जा सकते हैं। इनमें निम्नलिखित शामिल हैं।
ग्राहक अधिग्रहण और प्रतिधारण: नए ग्राहकों की संख्या और मौजूदा ग्राहक बनाए रखने की दर पर नजर रखना।
उत्पादों की पहुंच: बैंक बीमा उत्पाद खरीदने वाले ग्राहकों के फीसदी यानी हिस्से का आकलन।
राजस्व वृद्धि: बैंक बीमा उत्पादों से उत्पन्न राजस्व और बैंक के समग्र राजस्व में इसके योगदान का विश्लेषण।
ग्राहक संतुष्टि: बैंक बीमा उत्पादों एवं सेवाओं के प्रति ग्राहकों की संतुष्टि का आकलन करने के लिए सर्वेक्षण का आयोजन।
शिकायत अनुपात: बैंक बीमा उत्पादों से संबंधित प्राप्त और हल की गई शिकायतों की संख्या पर नजर रखना और आंतरिक डेटा के माध्यम से बाहरी वास्तविकता को परिलक्षित करना।
प्रभाव अध्ययन करने के सर्वोत्तम तरीकों में नियमित समीक्षा, स्वतंत्र ऑडिट और डेटा विश्लेषण का उपयोग करके ग्राहक व्यवहार, उत्पाद प्रदर्शन और बिक्री व्यवहारों की जानकारी प्राप्त करना आदि शामिल किए जा सकते हैं। बैंकों को ऐसा अध्ययन कैसे करना चाहिए? डिजिटलीकरण जोर पकड़ने के बाद ऐसा करना जटिल नहीं रह गया है। उन्हें निम्नलिखित पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है।
डेटा संग्रह: बैंक ग्राहक अधिग्रहण, राजस्व वृद्धि और शिकायत अनुपात जैसे प्रमुख मापदंडों पर नज़र रखने के लिए डेटा संग्रह प्रणाली स्थापित कर सकते हैं।
डैशबोर्ड और रिपोर्टिंग: वे प्रदर्शन की निगरानी और रुझानों की पहचान करने के लिए डैशबोर्ड और नियमित रिपोर्ट बना सकते हैं।
मानदंड निर्धारण: वे उद्योग मानकों या आंतरिक लक्ष्यों (जिनमें शिकायतों और आचरण जोखिम पर आईआरडीए और आरबीआई के खुलासे शामिल हैं) के समकक्ष प्रदर्शन की तुलना कर सकते हैं।
क्रॉस-फंक्शनल टीम: बैंक बीमा कारोबार संचालन की देख-रेख के लिए जोखिम, अनुपालन और बिक्री टीमों को शामिल करते हुए क्रॉस-फंक्शनल टीमें स्थापित कर सकते हैं।
प्रशिक्षण और जागरूकता: बैंक कर्मचारियों को बैंक बीमा उत्पादों, बिक्री प्रक्रियाओं और विनियामक आवश्यकताओं (जिनमें आरबीआई के नवीनतम आचरण नियम और आईआरडीएआई के पॉलिसीधारक-संरक्षण मानदंड शामिल हैं) पर नियमित प्रशिक्षण देना सहायक होगा।
ग्राहक प्रतिक्रिया: वे ग्राहकों की प्रतिक्रिया और चिंताओं के लिए एक मंच बना सकते हैं।
कम से कम 50,000 रुपये या उससे अधिक वार्षिक नियमित प्रीमियम वाली पॉलिसियों का ऑडिट और जांच करने की व्यवस्था से गलत बिक्री रोकने और उपयुक्तता सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।
निश्चित रूप से चुनौतियां तो हैं। उदाहरण के लिए जांच में सख्ती से प्रक्रियागत समय बढ़ सकता है और संभावित देरी हो सकती है साथ ही परिचालन जटिलता उत्पन्न हो सकती है। अगर कुशलतापूर्वक प्रबंधन न किया जाए तो अतिरिक्त जांच ग्राहक संतुष्टि को प्रभावित कर सकती है। बैंकों को ऑडिटिंग और सत्यापन प्रक्रियाओं के लिए अधिक संसाधनों का आवंटन करने की भी आवश्यकता हो सकती है।
मगर समाधान भी मौजूद हैं। बैंक कुशल जोखिम मूल्यांकन और सत्यापन के लिए प्रौद्योगिकी का लाभ उठा सकते हैं। अगर वे ऑडिट के लिए पॉलिसियों के चयन हेतु जोखिम-आधारित मानदंडों को लागू करते हैं और ग्राहकों को ऑडिट प्रक्रिया और समय-सीमा के बारे में सूचित करते हैं तो समस्या का समाधान हो जाएगा।
वर्तमान में आईआरडीएआई द्वारा नई जीवन और व्यक्तिगत स्वास्थ्य बीमा पॉलिसियों के लिए 30 दिन की एक समान ‘कूलिंग ऑफ’ या ‘फ्री लुक अवधि’ निर्धारित की गई है चाहे उन्हें भौतिक रूप से खरीदा गया हो या इलेक्ट्रॉनिक रूप से। सरकार ने निजी बीमा कंपनियों से इस ‘फ्री लुक’ अवधि को बढ़ाकर एक वर्ष तक करने पर विचार करने को कहा है ताकि गलत बिक्री पर अंकुश लगाया जा सके। ‘फ्री लुक’ अवधि की सीमा ही क्यों न हटा दी जाए? इसकी आवश्यकता इसलिए है क्योंकि अक्सर यह देखा गया है कि जब तक ग्राहकों को अपने साथ धोखे का पता चलता है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
साथ ही, पॉलिसी विक्रेताओं का कमीशन पॉलिसी की पूरी अवधि में समान रूप से वितरित किया जा सकता है। बैंकों को कर्मचारियों के लिए निर्धारित बिक्री लक्ष्यों और प्रोत्साहन संरचना पर बारीकी से भी विचार करने की आवश्यकता है। तभी बैंक बीमा ‘2047 तक सभी के लिए बीमा’ की दिशा में शिकायत और अविश्वास का स्रोत बनने के बजाय वित्तीय सुरक्षा का एक वास्तविक साधन बन सकता है।
(लेखक जन स्मॉल फाइनैंस बैंक लिमिटेड के वरिष्ठ सलाहकार हैं)