facebookmetapixel
Advertisement
लाइन लगाने की जरूरत नहीं, घर पहुंचेगा गैस सिलेंडर: सीएम योगी आदित्यनाथऑल टाइम हाई के करीब Oil Stock पर ब्रोकरेज सुपर बुलिश, कहा- खरीद लें, 65% और चढ़ने का रखता है दमBharat PET IPO: ₹760 करोड़ जुटाने की तैयारी, सेबी में DRHP फाइल; जुटाई रकम का क्या करेगी कंपनीतेल, रुपये और यील्ड का दबाव: पश्चिम एशिया संकट से बढ़ी अस्थिरता, लंबी अनिश्चितता के संकेतवैश्विक चुनातियों के बावजूद भारतीय ऑफिस मार्केट ने पकड़ी रफ्तार, पहली तिमाही में 15% इजाफाJio IPO: DRHP दाखिल करने की तैयारी तेज, OFS के जरिए 2.5% हिस्सेदारी बिकने की संभावनाडेटा सेंटर कारोबार में अदाणी का बड़ा दांव, Meta और Google से बातचीतभारत में माइक्रो ड्रामा बाजार का तेजी से विस्तार, 2030 तक 4.5 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमानआध्यात्मिक पर्यटन में भारत सबसे आगे, एशिया में भारतीय यात्रियों की रुचि सबसे अधिकबांग्लादेश: चुनौतियों के बीच आजादी का जश्न, अर्थव्यवस्था और महंगाई बनी बड़ी चुनौती

स्थानीय नौकरियों में कोटा: भारत में उभरती ‘स्थानीयतावादी राजनीति’ की खतरनाक नई लहर

Advertisement

भारत के सबसे समृद्ध राज्यों की प्रगति में प्रवासियों के योगदान के स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद संकीर्णतावाद पूरे भारत में जोर पकड़ रहा है

Last Updated- March 20, 2026 | 10:23 PM IST
Indian

भारतीय नागरिकों की एकता का सबसे सशक्त संकेत छह साल पहले कोविड-19 लॉकडाउन के शुरुआती दिनों में सामने आया, जब ​​दुकानें और कारखाने बंद हो गए तथा निर्माण स्थलों पर काम ठप हो गया। हजारों मजदूर और उनके परिवार सड़कों पर उतर आए। रोजगारदाताओं और मकान मालिकों द्वारा जबरन बेदखल किए जाने के बाद उन्हें दक्षिण और पश्चिम के तेजी से विकसित हो रहे शहरों से पैदल, साइकलों, बैलगाड़ियों (जो भाग्यशाली थे उन्हें ट्रक या ट्रेन से) के जरिये बिहार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल में अपने घर लौटने को मजबूर होना पड़ा।

कोविड-19 के दौरान हुए पलायन ने अन्य भारतीय राज्यों के लोगों के प्रति स्थानीय निवासियों के स्वार्थपरक रवैये को उजागर किया, जबकि ये लोग अपने घर से दूर अर्थव्यवस्था को पटरी पर बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आठ साल पहले आंतरिक प्रवासियों की दयनीय स्थिति तब और भी स्पष्ट हो गई थी जब असम में सांप्रदायिक संघर्षों के बाद हिंसा की निराधार अफवाहों के कारण पूर्वोत्तर के हजारों प्रवासी बेंगलूरु, चेन्नई और पुणे से पलायन कर गए। इन शहरों के फलते-फूलते खुदरा और सेवा व्यवसाय में उनकी भूमिका को देखते हुए, कर्नाटक सरकार ने उनकी चिंताओं को दूर करने और उन्हें सुरक्षा का आश्वासन देने के लिए तुरंत कदम उठाए। तब से ऐसी कोई और संकट की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई है।

भारत के सबसे समृद्ध राज्यों की प्रगति में प्रवासियों के योगदान के स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद संकीर्णतावाद पूरे भारत में जोर पकड़ रहा है। बाहरी या घुसपैठिये होने के आरोप में मुसलमानों पर बार-बार होने वाले हमले, दशकों से कई भारतीयों के मन में बसी खतरे की धारणा का एक प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। लेकिन पिछले साल उत्तराखंड में चीनी नागरिक होने के संदेह में त्रिपुरा मूल के एक युवक की स्थानीय बदमाशों द्वारा हत्या ने इस विरोधाभास की गहराई को रेखांकित किया है। जैसे-जैसे समृद्धि के उभरते क्षेत्र देश भर के नागरिकों के विविध कौशल और क्षमताओं की मांग को बढ़ा रहे हैं, भारतीय अपने ही देशवासियों को पराया समझने लगे हैं।

राजनीतिक नेताओं की यह प्रवृ​त्ति है कि वे संकीर्णता की नीतियों को बढ़ावा देकर अपनी लोकप्रियता बढ़ाने के लिए किसी आसान मुद्दे को उठा लेते हैं। यहां सबसे आकर्षक विकल्प यह रहा है कि निजी क्षेत्र द्वारा होने वाली भर्ती में स्थानीय लोगों के लिए निचले स्तर की नौकरियां आरक्षित कर दी जाएं। आंध्र प्रदेश (2019), हरियाणा (2020) और कर्नाटक (2024) ने इसी राह को अपनाया। लेकिन सभी सरकारें नाकाम रहीं।

आंध्र प्रदेश का वह विधेयक, जिसका उद्देश्य औद्योगिक इकाइयों, कारखानों और संयुक्त उद्यमों में 75 फीसदी नौकरियां स्थानीय उम्मीदवारों के लिए आरक्षित करना था, उच्च न्यायालय में चुनौती के बाद रुक गया। अदालत ने कहा कि यह कानून असंवैधानिक हो सकता है। हरियाणा का विधेयक अपने उद्देश्य में स्पष्ट था। उसके उद्देश्य और कारणों के विवरण में राज्य में प्रवासियों की बढ़ती संख्या का उल्लेख किया गया था, जो कम वेतन वाली नौकरियों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे थे। इस कानून को 2023 में अधिक निर्णायक परिणाम मिला, जब पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के एक पीठ ने इसे असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया (राज्य ने सर्वोच्च न्यायालय में अपील की है)। विशेष रूप से उच्च न्यायालय ने कहा कि यह कानून अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 19 (व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता) का उल्लंघन करता है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय ने एक तीखी टिप्पणी की कि इस कानून ने नागरिकों के बीच भेदभावपूर्ण कृत्रिम विभाजन पैदा किया है। हालांकि, उत्तर भारत के उच्च न्यायालय के इस फैसले से दक्षिण में स्थित कर्नाटक सरकार का इरादा नहीं बदला। राज्य सरकार ने 2024 में एक कानून प्रस्तावित किया जिसके तहत प्रबंधन के 50 फीसदी और गैर-प्रबंधन के 75 फीसदी पद स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित किए जाने थे। इस घोषणा से उद्योग जगत, विशेष रूप से आईटी और आईटीईएस उद्योग, जिसने बेंगलूरु को विश्व मानचित्र पर पहचान दिलाई, उसकी ओर से इतना कड़ा विरोध हुआ कि तब से यह कानून अधर में लटका हुआ है।

जैसा कि यूरोप और अमेरिका ने दिखाया है, चाहे कितनी भी बाधाएं हों, संकीर्णता का आकर्षण हमेशा बना रहता है, खासकर तब जब अच्छी नौकरियां मिलनी मुश्किल हो। अविभाजित आंध्र प्रदेश ने 2012 में यह अनिवार्य कर दिया था कि सभी दुकानों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के साइनबोर्ड तेलुगु में प्रमुखता से प्रदर्शित किए जाएं, और तेलंगाना ने राज्य बनने के बाद भी इस नियम को जारी रखा (अन्य भाषाओं की अनुमति है लेकिन छोटे अक्षरों में)। प्रवर्तन बहुत सख्त है, इसलिए बड़े शहरों में अधिकांश प्रतिष्ठान इसका पालन करते हैं, छोटे शहरों में अनुपालन थोड़ा ढीला है।

आंध्र प्रदेश अपने राज्य में जनसंख्या बढ़ाने के लिए एक नई पहल कर रहा है, जिसके तहत दंपतियों को एक से अधिक बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करने के वास्ते जनसंख्या प्रबंधन नीति की घोषणा की गई है। ऐसा करने का कारण कुल प्रजनन दर में हो रही भारी गिरावट की आशंका से उपजा है, जो प्रतिस्थापन दर से नीचे गिर गई है।

बेशक, प्रजनन दर में गिरावट सामाजिक प्रगति का संकेत है, लेकिन आंध्र प्रदेश के राजनेता चाहते हैं कि राज्य के नागरिक अधिक बच्चे पैदा करें ताकि भविष्य में संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी आने के डर को कम किया जा सके। आंध्र प्रदेश एक उभरता हुआ औद्योगिक क्षेत्र है। यह अन्य राज्यों के ऊपरी स्तर के कार्मिकों और निचले स्तर के श्रमिकों के बड़े समूहों को अधिवास का दर्जा देकर और उससे जुड़े सभी लाभों का लाभ उठाकर आसानी से अपनी जनसंख्या बढ़ा सकता है। लेकिन ‘बाहरी लोगों’ को औपचारिक रूप से आंतरिक लोगों के रूप में मान्यता देने के लिए एक साहसी राजनेता की आवश्यकता होगी, जबकि भारत के अधिकांश गतिशील शहरों में नियमित रूप से ऐसा होता रहता है।

आज पश्चिम बंगाल में ‘बंगाली गौरव’ और ‘उत्तरी संस्कृति’ के बीच अस्पष्ट राजनीतिक विभाजन रेखाएं खींची जा रही हैं। लेकिन मात्र 50 वर्ष पूर्व, ‘आमरा बंगाली’ नामक एक संकीर्ण राजनीतिक दल अपनी छाप छोड़ने में विफल रहा था। आमरा बंगाली की प्रमुख मांग तब भी और अब भी ‘बंगालिस्तान ‘ के निर्माण की है, जिसमें पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, (अविभाजित) बिहार, असम और ओडिशा-यानी बड़ी बंगाली आबादी वाले किसी भी राज्य शामिल होंगे।

उसने 1980 के दशक में कोलकाता के कुछ हिस्सों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, जो उस समय भारत का सबसे महानगरीय शहर था, जहां दुकानों के अंग्रेजी में लिखे साइनबोर्ड मिटा दिए गए थे। किसी ने इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया। इसे चुनावी समर्थन नगण्य ही मिला, सिवाय त्रिपुरा के जहां उसने विधान सभा में कुछ सीटें जीतीं। यह आज भी पूर्वी राजनीतिक परिदृश्य के हाशिये पर है, लेकिन यह चिंताजनक है कि उसके एजेंडे के कुछ हिस्से मुख्यधारा के दलों के बीच जोर पकड़ रहे हैं।

Advertisement
First Published - March 20, 2026 | 10:11 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement