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अफगान शांति प्रक्रिया में भारत की दुविधा

हर्ष वी पंत /  July 31, 2019

लंबे समय से हिंसा एवं अशांति का शिकार रहे अफगानिस्तान में शांति स्थापना प्रक्रिया में भारत को अधिक सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। इसकी अहमियत बता रहे हैं हर्ष वी पंत

 
अफगानिस्तान में मेलमिलाप की चर्चाएं तेज होने के साथ हिंसा की घटनाओं में भी तेजी देखने को मिली है। इससे पता चलता है कि वहां कितना कुछ दांव पर लगा हुआ है? अफगानिस्तान के लिए नियुक्त अमेरिका के विशेष दूत जालमे खलीलजाद 18 वर्षों से चला आ रहा हिंसा का दौर खत्म करने के लिए उपद्रवियों के साथ 1 सितंबर तक एक समझौता कराने की कोशिश में लगे हुए हैं। दरअसल अमेरिकी जनता अफगानिस्तान में जल्द शांति स्थापना की पक्षधर है और डॉनल्ड ट्रंप के चुनाव अभियान में यह एक अहम वादा भी था।
 
अमेरिका और तालिबान के बीच पिछले साल अक्टूबर से अब तक सात दौर की सीधी बातचीत हो चुकी है। इस बातचीत का बुनियादी मकसद अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना की सुरक्षित वापसी के साथ ही तालिबान से यह गारंटी भी लेनी है कि अफगान धरती का इस्तेमाल विदेशी आतंकी नहीं करेंगे ताकि बाकी दुनिया के लिए कोई खतरा न पैदा हो। दोहा में संपन्न आठवें दौर की बातचीत को सबसे उपयोगी माना गया और कई महीनों के गतिरोध के बाद इस वार्ता में एक नई ऊर्जा नजर आई। अमेरिका का इस पर जोर रहा है कि वह एक 'समग्र शांति समझौते के पक्ष में है, न कि एक वापसी समझौता' चाहता है। हालांकि उसके इस दावे को स्वीकार करने वाले लोग कम ही हैं।
 
इस महीने की शुरुआत में अमेरिका ने चीन, रूस और पाकिस्तान के साथ एक साझा बयान जारी किया था जिसमें तालिबान से संघर्ष-विराम पर सहमत होने और निर्वाचित अफगान सरकार के साथ बातचीत शुरू करने की अपील की गई थी ताकि लंबे युद्ध से बेहाल देश में शांति एवं स्थिरता का युग लौट सके। शांति स्थापना प्रक्रिया में 'तालिबान के मुख्य प्रायोजक' पाकिस्तान की भागीदारी का स्वागत होना अमेरिका के उस रवैये से नाटकीय भटकाव दिखाता है जिसमें पाकिस्तान को अलग-थलग रखा जाता था। इस बीच पाकिस्तान ट्रंप प्रशासन के साथ अपने ठंडे पड़े रिश्तों में थोड़ी गरमाहट लाने को बेकरार है। उसे उम्मीद है कि अफगानिस्तान में शांति समझौते के लिए तालिबान पर दबाव डालने में अमेरिका की मदद कर वह लगातार विरोधी होते जा रहे ट्रंप प्रशासन के सुर को थोड़ा नरम कर सकता है। अफगानिस्तान में नई शुरुआत को लेकर पाकिस्तान एक बार फिर केंद्रीय भूमिका में उभरा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को अमेरिकी यात्रा के लिए न्योता दिए जाने को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
 
भारत इस घटनाक्रम पर पूरे चौकन्नेपन के साथ नजर रखता रहा है क्योंकि अभी तक अमेरिका ने भारत को इस प्रकरण से सीधे तौर पर नहीं जोड़ा है। भारत की तरफ से आपत्ति जताए जाने के बाद हाल ही में अमेरिकी अधिकारियों ने भारत को अफगानिस्तान संबंधी घटनाओं से अवगत कराना शुरू किया है। तालिबान के साथ कोई लेना-देना नहीं होने का भारत का रुख अब अस्वीकार्य हो चुका है। पिछले साल नवंबर में जाकर भारत ने अपने दो पूर्व राजनयिकों को मॉस्को दौर की वार्ता में शामिल होने के लिए 'गैर-आधिकारिक' तौर पर भेजा था। भारत ने तालिबान के साथ बातचीत के सफल होने के लिए जरूरी लगने वाली कुछ खास परिस्थितियों का हाल ही में जिक्र किया है।
 
अफगानिस्तान की मौजूदा सरकार में लगे अपने दांव के मद्देनजर भारत ने अफगानी समाज के सभी तबकों को समाहित करने के लिए सभी पहलुओं एवं प्रक्रियाओं का आह्वान किया है। भारत को डर है कि अशरफ गनी सरकार का कमजोर होना इस अशांत देश में लोकतांत्रिक तरीके से सामान्य स्थिति बहाल करने की दिशा में दो दशकों में किए गए तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के खात्मे का इशारा होगा। यह पहल भारत को तालिबान के साथ औपचारिक संपर्क करने की सुविधा भी देती है। भारत ने इस बात पर भी जोर दिया है कि शांति स्थापना की 'किसी भी प्रक्रिया को संवैधानिक विरासत एवं राजनीतिक जनादेश का सम्मान करना चाहिए'। यह इसलिए अहम है कि तालिबान व्यापक लोकतांत्रिक प्रक्रिया एवं महिला अधिकार जैसे प्रमुख पहलुओं को लेकर प्रतिबद्धता जताने से हिचक रहा है। इसके बजाय वह अब भी शरीया कानून की अपनी व्याख्या पर ही टिके रहना चाहता है। आखिर में, भारत के लिए यह खासा अहम है कि अफगानिस्तान में कोई भी प्रक्रिया ऐसी न हो जो आतंकवादियों एवं उसके हमराहियों के लिए शरणगाह बनने लायक जगह की गुंजाइश छोड़े। पिछली बार अफगानिस्तान से जाते समय अमेरिका ने पाकिस्तान को खुली छूट दे दी थी। इसके चलते कश्मीर में आतंकवाद एवं कट्टरपंथ का उभार होने से भारत के सुरक्षा हितों को गहरा आघात लगा।
 
हालांकि यह पूरी तरह साफ नहीं है कि भारत अपने कितने उद्देश्यों को हासिल कर पाएगा क्योंकि अमेरिका अफगानिस्तान से निकलने की जल्दबाजी में है। भारत का अफगानिस्तान में किया गया आर्थिक एवं सांस्कृतिक निवेश नगण्य हो जाएगा, अगर वह तत्काल अपनी राह दुरुस्त नहीं करता है। गत दिनों मोदी सरकार ने अफगानिस्तान के लिए 5.8 करोड़ डॉलर की मदद राशि देने के साथ ही ईरान के चाबहार बंदरगाह के लिए अपना आवंटन भी 1.5 अरब डॉलर से घटाकर 65 लाख डॉलर कर दिया। यह अफगानिस्तान में बदलती जमीनी हकीकत की स्वीकारोक्ति है क्योंकि भारत को वहां अपनी भूमिका अनिश्चित नजर आ रही है।
 
भारत में कई लोग इस स्थिति का ठीकरा ट्रंप प्रशासन पर फोडऩे लगेंगे। लेकिन भारत को इस रूपक से बचना चाहिए। अफगानिस्तान में अमेरिका के अपने हित हैं और वह उन्हें सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा है। असल में, ऐसी संभावना है कि इस प्रक्रिया में वह कुछ भारतीय हितों को भी सुरक्षित बनाए रखेगा क्योंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अनुकूल शक्ति संतुलन बनाए रखने के लिए अमेरिका को भारत की जरूरत है। लेकिन अफगानिस्तान के प्रति भारत का रवैया शुरू से ही दूसरों पर उपकार करने वाला रहा है। भारत लगातार इस बात पर जोर देता रहा कि वह अफगानिस्तान में केवल अपनी नरम ताकत ही लगाना चाहता है लेकिन सच यह है कि अमेरिकी सुरक्षा आवरण में रहने से ही यह सफल हो पाया। भारत ने अफगानिस्तान में कुछ शानदार काम किए हैं। वह बड़े दानदाता देशों में है, सांस्कृतिक प्रभाव का अहम जरिया है, उभरते लोकतांत्रिक शासन के विभिन्न क्षेत्रों में क्षमता विकसित करने और सुरक्षाबलों के प्रशिक्षण में सक्रिय रहा है। लेकिन जब मामला मुश्किल हालात का आता है तो उसे अपने नागरिकों पर हमले की स्थिति में भी सशक्त दिखने के लिए दूसरों पर निर्भर होना पड़ा।
 
एक अग्रणी वैश्विक शक्ति के तौर पर पहचान बनाने की मंशा रखने वाले एक राष्ट्र के लिए ऐसी स्थिति में होना बहुत सुविधाजनक नहीं है। विदेश नीति में जोखिम से बहुत परहेज रखने की अपनी कीमत भी होती है। काफी कुछ दांव पर है और भारत को शांति प्रक्रिया में अधिक सक्रियता दिखानी चाहिए और अपनी ही खींची सीमारेखा से संकोच नहीं करना चाहिए। आखिरकार, अपने हितों को नजरअंदाज किए जाने पर भारत विध्वंसक की भूमिका भी निभा सकता है। यह भारतीय हितों के साथ ही आम अफगानियों की आशाओं एवं आकांक्षाओं को चकनाचूर होने से बचाने के लिए भी जरूरी है। भारत सरकार को यह साफ करना चाहिए कि अच्छे लोगों का हमेशा आखिर में ही रहना जरूरी नहीं है।
 
(लेखक लंदन स्थित किंग्स कॉलेज में प्राध्यापक हैं) 
Keyword: india, Afghanistan, peace,,
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