लोन या क्रेडिट कार्ड के लिए अप्लाई करते समय अक्सर लोग एक बड़ी उलझन में फंस जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने कभी कोई कर्ज नहीं लिया है, तो उनका रिकॉर्ड बहुत साफ है और बैंक उन्हें तुरंत लोन दे देगा। वहीं, कुछ लोग ‘नो क्रेडिट हिस्ट्री’ (No Credit History) और ‘बैड क्रेडिट हिस्ट्री’ (Bad Credit History) को एक ही समझ लेते हैं। लेकिन बैंकों और अन्य संस्थाओं के नजरिए से इन दोनों बातों में जमीन-आसमान का अंतर होता है।
इस विषय पर बारीक रोशनी डालते हुए ZET के CEO और को-फाउंडर मनीष शारा बताते हैं कि दोनों ही स्थितियों में बैंक से लोन मिलने में दिक्कत आ सकती है, लेकिन इसके पीछे की वजहें पूरी तरह अलग होती हैं। बैंक के लिए एक स्थिति सिर्फ एक अनजान पहेली की तरह है, तो दूसरी स्थिति सीधे तौर पर घाटे का सौदा यानी जोखिम है।
शारा कहते हैं कि ‘नो क्रेडिट हिस्ट्री’ का सीधा सा मतलब है कि आप पहली बार कर्ज की दुनिया में कदम रख रहे हैं। ऐसे लोगों को बैंकिंग भाषा में ‘न्यू-टू-क्रेडिट’ यूजर कहा जाता है। ये वो लोग होते हैं जिन्होंने आज तक न तो कोई लोन लिया है और न ही कभी क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किया है। आमतौर पर पहली नौकरी शुरू करने वाले युवा, छात्र, या फिर वो लोग जो अपने रोजमर्रा के खर्चों के लिए सिर्फ कैश और UPI पर भरोसा करते हैं, इस कैटेगरी में आते हैं।
शारा के मुताबिक, चूंकि ऐसे लोगों का पुराना कोई रिकॉर्ड मौजूद नहीं होता, इसलिए बैंकों के पास यह समझने का कोई जरिया नहीं होता कि यह व्यक्ति आगे चलकर रीपेमेंट (लोन चुकाने की आदत) कैसे संभालेगा।
आसान शब्दों में कहें तो बैंक के सामने आपकी ईमानदारी या लापरवाही का कोई सबूत नहीं होता। इसलिए बैंक इसे एक ‘अनिश्चितता’ (Uncertainty) के रूप में देखता है, जहां उसे आपके बारे में बहुत कम जानकारी होती है।
दूसरी तरफ, ‘बैड क्रेडिट हिस्ट्री’ की कहानी पूरी तरह अलग है। इस स्थिति में व्यक्ति के पास पुराना कर्ज लेने का अनुभव तो होता है, लेकिन उसका रिकॉर्ड बेहद खराब रहता है। अगर किसी ने पहले अपनी EMI बाउंस की है, क्रेडिट कार्ड के बिल समय पर नहीं चुकाए हैं, लोन सेटलमेंट किया है या फिर लोन डिफॉल्ट कर दिया है, तो उसका नाम इस लिस्ट में आ जाता है।
एक्सपर्ट बताते हैं कि बैंकों के लिए यह स्थिति अनिश्चितता की नहीं, बल्कि सीधे तौर पर ‘रिस्क’ (Risk) यानी खतरे की होती है। यहां बैंक के पास आपका पुराना ट्रैक रिकॉर्ड होता है, जो साफ-साफ चिल्लाकर कह रहा होता है कि आपके साथ पैसों का लेन-देन करना सुरक्षित नहीं है। बैंक को पहले से ही आपके रीपेमेंट व्यवहार में गड़बड़ी के संकेत मिल जाते हैं।
शारा के मुताबिक, इन दोनों स्थितियों का असर आपके क्रेडिट स्कोर और लोन मिलने की संभावना पर भी अलग-अलग पड़ता है। जिन लोगों की कोई क्रेडिट हिस्ट्री नहीं होती, उनका कोई क्रेडिट स्कोर भी नहीं होता, क्योंकि सिस्टम के पास स्कोर तय करने के लिए पर्याप्त डेटा ही नहीं होता। ऐसे लोगों को बैंक पूरी तरह निराश नहीं करते।
शारा समझाते हैं, “पहली बार लोन लेने वाले लोग छोटे लोन (Small-ticket loans) या कुछ पारंपरिक क्रेडिट कार्ड जैसे शुरुआती प्रोडक्ट्स आसानी से हासिल कर सकते हैं। बैंक इन शुरुआती टूल्स की मदद से समय के साथ उनके खर्च और पैसे चुकाने की आदत को ट्रैक करते हैं।”
वे आगे बताते हैं, “इसके उलट, जिनका क्रेडिट हिस्ट्री खराब होता है, उनका क्रेडिट स्कोर काफी नीचे गिर जाता है। बैंकों के सिस्टम में उनकी चूके हुए पेमेंट्स और डिफॉल्ट की जानकारी लंबे समय तक दिखाई देती है। नतीजा यह होता है कि ऐसे लोगों को लोन देने से पहले बैंक बहुत सख्त जांच करते हैं। अगर लोन मिल भी जाए, तो उसकी क्रेडिट लिमिट बहुत कम होती है और ब्याज दरें ज्यादा वसूली जाती हैं”
शारा के मुताबिक, अगर आप ‘नो क्रेडिट हिस्ट्री’ वाले ग्रुप में हैं, तो आपके लिए रास्ता थोड़ा आसान है। आपको बस धीरे-धीरे बैंकों का भरोसा जीतना होगा। इसकी शुरुआत आप एक सुरक्षित विकल्प जैसे कि ‘सिक्योर्ड क्रेडिट कार्ड’ (जो एफडी के बदले मिलता है) से कर सकते हैं। इसके बाद अपने खर्चों को सीमित रखें और हर बिल का भुगतान समय पर करें। इससे धीरे-धीरे आपकी एक मजबूत और सेहतमंद क्रेडिट प्रोफाइल तैयार हो जाएगी।
लेकिन, अगर आप ‘बैड क्रेडिट हिस्ट्री’ के जाल में फंसे हैं, तो आपको ज्यादा धैर्य और अनुशासन दिखाना होगा। इसे रातों-रात नहीं सुधारा जा सकता। इसके लिए सबसे पहले अपने पुराने सभी बकाए पैसों को क्लियर करें, बिल चुकाने के लिए रिमाइंडर सेट करें और अपने क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल को काबू में रखें। बैंक हमेशा आपकी महीनों की लगातार अच्छी आदतों को देखते हैं, न कि कुछ दिनों के बदलाव को।