facebookmetapixel
Advertisement
रुपये पर अमेरिका की बड़ी राहत! US Treasury ने भारत को दी क्लीन चिट, निगरानी सूची से रखा बाहरSUV, EV और एक्सपोर्ट पर RC Bhargava का बड़ा खुलासा, जानिए भारत की ऑटो इंडस्ट्री कैसे बदली4 साल में 4 गुना बढ़े ₹100 करोड़ से ज्यादा कमाने वाले! संसद में सरकार ने बताए चौंकाने वाले आंकड़ेब्रेंट 85 डॉलर के नीचे फिसला, पश्चिम एशिया में तनाव कम होने की उम्मीद से कच्चे तेल में गिरावटभारत में EV की नई रेस! मारुति, VinFast और Tesla की एंट्री से बदला खेल, टाटा-महिंद्रा को मिली कड़ी चुनौतीStocks to Watch Today: Wipro की AI डील, Adani का QIP, TVS का ₹711 करोड़ का दांव; आज इन शेयरों पर रहेगी नजरबैंक ऑफ बड़ौदा में बड़ी सेंधमारी: 1TB डेटा डार्क वेब पर हुआ लीक, जांच में जुटी एजेंसियांHDFC Bank के बोर्ड ने अपने ही अधिकारियों पर की कार्रवाई, MD-CFO पर लगाया 1-1 लाख रुपये का जुर्मानासुप्रीम कोर्ट की दो टूक: शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार मौलिक, आंदोलन के नाम पर पुलिस ज्यादती जायज नहींटाटा पावर का मुनाफा 11% बढ़ा, 2030 तक ट्रांसमिशन में ₹40,000 करोड़ निवेश की तैयारी में कंपनी

हिदायतों पर अमल करने से शीर्ष तक पहुंचने में मिली सहूलियत

Advertisement
Last Updated- December 12, 2022 | 12:13 AM IST

साल 1996 में भारत में उथल-पुथल का दौर था। इंडियाना यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर और भारतीय मामलों के विशेषज्ञ सुमित गांगुली कहते हैं कि उस वर्ष भ्रष्टाचार शब्द का इस्तेमाल सबसे अधिक किया गया और लगभग हर राष्ट्रीय राजनीतिक दल की प्रतिष्ठा इससे प्रभावित हुई थी। जैन हवाला कांड में आखिरकार उन 115 सांसदों, मंत्रियों, अफसरों के नाम सामने आए जिन पर रिश्वत लेने का संदेह था। आरोपियों में प्रधानमंत्री पी वी नरसिंह राव के मंत्रिमंडल के तीन मंत्री और विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी का नाम भी शामिल था।
बिहार में भी इसी दौरान एक घोटाले का पर्दाफाश होना शुरू हो रहा था। सन 1996 में राज्य के वित्त सचिव वी एस दुबे ने सभी जिलाधिकारियों और उपायुक्तों को आदेश दिया कि वे जांच करें कि राज्य के खजाने से बड़ी मात्रा में पैसा कैसे निकाला गया और यह कहां गया। उस वक्त पश्चिमी सिंहभूम के तत्कालीन उपायुक्त अमित खरे, इस मामले में सबसे पहले कार्रवाई करने वालों में शामिल थे। उन्होंने चाईबासा के पशुपालन विभाग के कार्यालय पर छापा मरवाया। इस छापेमारी में पैसे की अवैध निकासी वाले कई दस्तावेज मिले जिनसे अधिकारियों और आपूर्तिकर्ताओं के बीच सांठगांठ का पता चला। इस घोटाले के केंद्र में जानवरों को दिया जाने वाला चारा था जिसे सरकार खरीदकर किसानों को देने वाली थी।
हैरानी की बात यह थी कि चारा कहीं नहीं था और केवल पैसे की नकद निकासी की गई थी। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रदेश अध्यक्ष सुशील कुमार मोदी और तत्कालीन भाजपा नेता सरयू रॉय द्वारा एक जनहित याचिका दायर किए जाने के बाद पटना उच्च न्यायालय ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को जांच करने की जिम्मेदारी लेने का आदेश दिया। उनके वकील रविशंकर प्रसाद थे। सीबीआई के आरोपपत्र में पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा और तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के नाम थे। बाकी तो इतिहास है।
चारा घोटाला मामले में अमित खरे की भूमिका लगभग आकस्मिक कही जा सकती है जिसकी वजह से लालू प्रसाद को जेल जाना पड़ा। वास्तव में इस घोटाले की जांच में उनके वरिष्ठ अधिकारी दुबे की पहल ज्यादा महत्त्वपूर्ण है जिनका इस कदम की वजह से काफी कुछ दांव पर लगा था लेकिन फिर भी उन्होंने कार्रवाई की। दुबे ने बिज़नेस स्टैंडर्ड से अपने सहयोगी के बारे में बात करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा, ‘खरे मुझसे 10 साल से ज्यादा कनिष्ठ हैं। मेरे लिए कोई टिप्पणी करना उचित नहीं होगा।’
हालांकि रॉय ने कहा कि उन्हें यह सुनकर सुखद आश्चर्य हुआ कि खरे अपने अफसरशाही के करियर में शीर्ष पर पहुंच गए हैं और वह प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में अब सलाहकार हैं। रॉय ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘इसमें कोई शक नहीं कि उनका दिमाग तेज था। लेकिन उनकी एक और भी खूबी थी जो मैंने महसूस किया, ‘सत्यं ब्रूयात, प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यं अप्रियम् (सत्य बोलें जो सुखद हो। कभी भी वह सत्य न बोलें जो अप्रिय हो)।’ रॉय कहते हैं, ‘उनके स्तर का कोई भी अधिकारी यह कर सकता था जो उन्होंने किया क्योंकि आदेश वरिष्ठ अधिकारी की तरफ  से मिला था। लेकिन हां, कुछ और भी अधिकारी थे जो कार्रवाई कर सकते थे लेकिन उन्होंने कार्रवाई नहीं की। खरे ने कार्रवाई की।’
अफसरशाहों से बेहद औपचारिक और बिना किसी निश्चित पहचान और व्यक्तित्व के बने रहने की उम्मीद की जाती है और इस पैमाने के लिहाज से 60 साल के खरे बिल्कुल उपयुक्त हैं। उनके समकालीन रहे कई लोग इस बात से सहमत हैं कि उनकी ईमानदारी निर्विवाद है। लेकिन अधिकांश लोगों का मानना है कि एक अफसरशाह के रूप में उनका करियर कुछ हद तक फीका ही रहा है जिससे यह जाहिर होता है कि उनकी मौजूदा प्रोन्नति केवल सही समय पर, सही जगह पर होने की वजह से हुई है। हालांकि सुशील मोदी इस बात से असहमत हैं। वह कहते हैं, ‘वह बेहद ईमानदार और अच्छा काम करने वालों में से एक हैं। साल 2000 में, जब बिहार का विभाजन हुआ तो वह झारखंड काडर में चले गए। घोटाले में लालूजी की मिलीभगत के बारे में हमारे पास अलग-अलग दस्तावेज थे। उन्होंने हमसे जुड़कर कार्रवाई नहीं की। लेकिन उन छापों ने हमारे अदालती केस का वजन बढ़ा दिया।’
खरे के करियर का अधिकांश वक्त शिक्षा क्षेत्र के कामों में गुजरा है। वह शीर्ष पुलिस अधिकारी रह चुके दिवंगत वेद मारवाह के प्रधान सचिव (साल 2004 से 2008 तक) भी थे जिन्हें झारखंड का राज्यपाल बनाया गया था। लेकिन इससे पहले और बाद में, वह भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के अपने कार्यकाल के लगभग 16 साल तक मानव संसाधन विकास मंत्रालय में ही किसी न किसी पद पर बने रहे। हालांकि वह झारखंड के मुख्य सचिव बनने से चूक गए। मानव संसाधन विकास मंत्रालय में उनका सबसे लंबा कार्यकाल संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के  शासनकाल के दौरान ही था। वह 2008 से 2014 तक उच्च शिक्षा के संयुक्त सचिव थे। वह 2019 में उच्च शिक्षा विभाग के सचिव बने जिस पद से वे 2021 में सेवानिवृत्त हुए।
पीएमओ में उनकी नियुक्ति का मतलब यह हो सकता है कि 2024 के आम चुनाव में शिक्षा मोदी सरकार का प्रमुख मुद्दा बन जाए, जैसे पहले उज्ज्वला योजना और अन्य कल्याणकारी योजनाओं पर जोर दिया गया था। तमिलनाडु की द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (द्रमुक) सरकार ने अखिल भारतीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) पर एतराज जताया है जिसकी वजह से इस पर आशंका के बादल मंडरा रहे हैं। द्रमुक ने नीट को खत्म करने का वादा विधानसभा चुनाव से पहले एक घोषणापत्र में किया था और कहा था कि अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में पढऩे से वंचित छात्रों के लिए नीट परेशानी का सबब है। द्रमुक अन्य विपक्षी दलों के साथ इसे एक साझा मुद्दा बनाने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री ने उन्हें सलाहकार के पद पर रखा है और ऐसा माना जाता है कि सलाहकार उनकी मदद करते हैं। शिक्षा के क्षेत्र में अहम सलाह के लिए अमित खरे प्रमुख व्यक्ति साबित हो सकते हैं।

Advertisement
First Published - October 15, 2021 | 11:15 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement