बिज़नेस स्टैंडर्ड के BS ‘मंथन’ समिट में डिक्सन टेक्नोलॉजीज के MD और CEO अतुल लाल ने साफ कहा कि भारत इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग में अब एक बड़े मोड़ पर आ गया है। उन्होंने कहा कि अब सिर्फ असेंबल करना नहीं, बल्कि वैल्यू एडिशन गहरा करना, खास टैलेंट तैयार करना, AI को अपनाना और खुद का इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी यानी आईपी बनाना है। लाल ने इंडस्ट्री 5.0 पर फायरसाइड चैट में ये बातें कहीं।
अतुल लाल ने अपनी कंपनी की कहानी सुनाते हुए कहा, “हर संकट मौका लाता है। डिक्सन इसी से जन्मी। कंपनी शुरू हुई सिर्फ 49 लाख रुपये के छोटे से कैपिटल से। उस वक्त भारत में आउटसोर्सिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) की कोई बात भी नहीं थी। मैन्युफैक्चरिंग को कोई सरकारी सपोर्ट नहीं मिलता था। सबकी नजर IT सर्विसेज पर थी। लोग कहते थे कि खरीदो, बनाओ मत। ग्लोबल सप्लाई चेन ही सबकुछ संभाल लेगी, ऐसा माना जाता था।”
लाल आगे कहते हैं, “हमने अभी तो सतह को भी छुआ नहीं है। इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग के लिए ये असली ‘व्हाई बाय’ का वक्त है। हम इन्फ्लेक्शन पॉइंट पर खड़े हैं।”
जब एपल और सैमसंग जैसी बड़ी कंपनियां भारत में अपना प्लांट बढ़ा रही हैं तो सवाल उठता है कि देशी EMS प्लेयर्स पर दबाव तो नहीं पड़ेगा? अतुल लाल ने इसे बिल्कुल अलग नजरिए से देखा। उन्होंने कहा, “किसी भी इंडस्ट्री को उड़ान भरने के लिए फ्लैग बियरर्स चाहिए।” उन्होंने ऑटो सेक्टर का उदाहरण दिया जहां विदेशी कंपनियों ने क्षमता बढ़ाई और पूरा सेक्टर मजबूत हुआ।
उनके मुताबिक इंडस्ट्री में पैसे से ज्यादा मायने रखती है कैपेबिलिटी हासिल करना। एपल ठीक यही ला रही है। मोबाइल फोन का बाजार भारत में 150 मिलियन यूनिट का है, जिसमें एंड्रॉयड अकेला 130-135 मिलियन यूनिट का है। डिक्सन की क्षमता अभी 60-65 मिलियन यूनिट है। लाल का मानना है कि ये कंपनियां इंडस्ट्री को नई ऊंचाई दे रही हैं, न कि खतरा पैदा कर रही हैं।
अतुल लाल ने जोर देकर कहा कि अब असली छलांग IP ओन करने की है। इसके लिए जरूरत है प्रिसीजन इंजीनियरिंग, थर्मल मैनेजमेंट, ऑप्टिक्स, टूल्स एंड डाइज और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक्स में माहिर इंजीनियर्स की। हर साल कम से कम 100-200 ऐसे स्पेशलाइज्ड इंजीनियर निकलने चाहिए।
इंडस्ट्री को यूनिवर्सिटी के साथ मिलकर कोर्स डिजाइन करने होंगे, फैकल्टी को ट्रेन करना होगा और सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस बनाने होंगे। साथ ही जॉब आकर्षक होनी चाहिए। फ्रेशर को 20-25 लाख रुपये सालाना सैलरी मिले तो 5-6 साल में वो 80-90 लाख तक पहुंच सके। लाल ने कहा, “ये एक लंबा सफर है। सरकार और इंडस्ट्री दोनों को और मेहनत करनी होगी।”
डिक्सन का प्लांट नोएडा, ग्रेटर नोएडा, उत्तराखंड, तिरुपति, श्री सिटी और चेन्नई में फैला है। अब कंपनी मध्य प्रदेश के ग्वालियर को भी देख रही है, खासकर टेलीकॉम मैन्युफैक्चरिंग के लिए। वहां एक्सप्रेसवे की अच्छी कनेक्टिविटी है और इंजीनियरिंग कॉलेजों का मजबूत नेटवर्क है।
सरकार की स्कीम्स जैसे MSIPS, फेज्ड मैन्युफैक्चरिंग प्रोग्राम, पीएलआई और ISM 1.0 का श्रेय देते हुए लाल ने कहा कि अगर अगले 2-3 साल और सपोर्ट मिले तो मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग ग्लोबल मार्केट में जा सकती है और डिजाइन बेस्ड कैपेबिलिटी भी गहरी हो सकती है।