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ट्रंप की बड़ी भूल? सद्दाम और गद्दाफी जैसी गलतियों से क्या अमेरिका ने नहीं सीखा कोई सबक

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युद्ध से अमेरिका के लक्ष्य पूरे नहीं हो सके। उसमें युद्ध दोबारा शुरू करने की क्षमता नहीं हैं। जहां तक ईरान की बात है, उसकी न केवल सत्ता बची बल्कि अब अधिक कट्टर लोग शासन में है

Last Updated- April 20, 2026 | 2:48 AM IST
US President Donald Trump
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप | फाइल फोटो

इजरायल और अमेरिका ने ईरान के साथ जंग की शुरुआत अत्य​धिक नाटकीय अंदाज में की थी। यह बात भी उतनी ही नाटकीय है कि तथाकथित विजेता, खासकर अमेरिका अब रुक गया है। इसमें नाटकीयता का तत्व ईरान के शीर्ष धार्मिक, सैन्य, वैचारिक और खुफिया नेतृत्व की लक्षित हत्या में निहित था। अमेरिकी कार्रवाई में वर्तमान ठहराव ईरान की जिद और आत्मसमर्पण से इनकार के कारण आया है। ऐसे में कुछ सवाल पैदा होते हैं।

क्या नेतृत्व-विहीन करने के प्रयास करने वाले हमले विरोधी के विनाश की गारंटी देते हैं? क्या इससे बेहतर तरीका भी हो सकता है? क्या इजरायल-अमेरिका गठबंधन ने कोई चूक की? क्या अन्य जगहों पर ऐसे ही किसी युद्ध का इतिहास हमें कुछ और बताता है? क्या भारतीय अनुभव में भी कुछ सबक हैं? पहले तीन प्रश्नों का उत्तर ‘नहीं’ है। बाकी का ‘हां’।

हमें इजरायल और अमेरिका को अलग-अलग संदर्भों में देखना होगा। इजरायल हमेशा अस्तित्वगत खतरों से लड़ता है। उन्हें निराशा होगी कि ईरान में शासन परिवर्तन नहीं हुआ। लेकिन ईरान को कमजोर कर देना, उसके परमाणु कार्यक्रम को लंबा झटका, और उसके मिसाइल ढांचे का विनाश अपेक्षाकृत कम लागत पर बड़े लाभ हैं।

लेबनान में कार्रवाई और हिज्बुल्लाह का कमजोर होना इजरायल के लिए फायदेमंद ही है। अगर इजरायल अपने लिए कुछ वक्त चाहता था तो उस लिहाज से यह एक अच्छा कदम था। इसके अलावा इजरायल अपनी इच्छा से युद्ध और शांति के बीच आवाजाही कर सकता है।

ऐसे में अमेरिका को कहां रखें? उसके ज्यादातर लक्ष्य वही थे जो इजरायल के थे लेकिन साथ ही उसके कुछ खास हित भी थे। सत्ता परिवर्तन और ईरान की परमाणु महत्वाकांक्षाओं के खात्मे के अलावा उसे अरब में अपने संरक्षण वाले देशों (खाड़ी सहयोग परिषद या जीसीसी) को भी बचाना और आश्वस्त करना था।

यह तीनों लक्ष्यों को पाने में विफल रहा। ईरान की सत्ता न केवल बरकरार रही बल्कि द वॉल स्ट्रीट जर्नल के मुताबिक अब वह अधिक कट्टर व्यक्तियों के हाथ में है। यूरेनियम की बात करें तो ईरान अभी भी संवर्धित यूरेनियम भंडार सौंपने को तैयार नहीं है न ही वह उसे निगरानी में लाना चाहता है। उसके मिसाइल हमले कमजोर हुए हैं लेकिन साथ ही विरोधियों का बचाव तंत्र भी कमजोर पड़ा है। हर बार जब अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप या उनके युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ईरान की नौसेना और वायु सेना के अंत के दावे करते हैं तब आप केवल हंस सकते हैं। वास्तव में ईरान के पास एक छोटी नौ सेना थी और वायु सेना तो लगभग नहीं थी।

छोटे लेकिन हिम्मती यूएई को छोड़ दें तो बाकी अरब देश डरे हुए और युद्ध से बचते हुए नजर आए। लंबे समय से वे पश्चिमी देशों पर निर्भर रहे हैं।  उन्होंने इजरायल को अपने हवाई क्षेत्र का इस्तेमाल करने दिया और फिलिस्तीन के मुद्दे पर सिर्फ औपचारिक बातें करते रहे।

कतर जैसे कुछ देशों ने दोनों पक्षों का साथ दिया। उसने अमेरिका को अपना सबसे बड़ा अड्डा बनाने दिया और दूसरी ओर मुस्लिम ब्रदरहुड, हमास और ईरान के साथ भी रिश्ते कायम रखे। सऊदी शाही परिवार को लगा कि पवित्र मस्जिदों का संरक्षक होने के नाते उसे सुरक्षा मिलेगी। उन्होंने अमेरिकी सेना पर पूरा भरोसा किया। अब यह भरोसा हिल चुका है। जीसीसी के देशों को आधुनिक इतिहास में पहली बार हमले का सामना करना पड़ा। उन्हें न केवल अपने सुरक्षा बल बचा पाए और न ही अमेरिका।

पश्चिम एशिया की लड़ाई इजरायल और ईरान के बीच नहीं है। यह ईरान और खाड़ी के अरब देशों के बीच प्रभुत्व की लड़ाई है जिसमें इजरायल एक हिस्सा भर है। ईरान की जनसंख्या पूरे जीसीसी की तुलना में डेढ़ गुना से अधिक है, और उसकी सेना (इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स के साथ) उनके संयुक्त बल से भी बड़ी है।

गरीब मुस्लिम देशों में ईरानी इस्लाम को अमीर खाड़ी देशों के इस्लाम की तुलना में अधिक विश्वसनीय और शुद्ध माना जाता है। और यह केवल शियाओं तक सीमित नहीं है। उनमें से कई ईरान को एकमात्र इस्लामी देश मानते हैं जो इजरायल और अमेरिका के खिलाफ फिलिस्तीनियों के लिए लड़ रहा है, और इसके लिए भारी कीमत चुका रहा है। यह उस दृष्टिकोण से ज्यादा अलग नहीं है जिसमें वे खाड़ी अरबों को ‘अमीर, निर्बल, अनैतिक पश्चिमी कठपुतलियां’ मानते हैं। यूएई को छोड़कर, जीसीसी में किसी ने भी प्रतिरोध की बात नहीं की है। वे दोनों पक्षों से सौदे तलाश रहे हैं।

जीसीसी का डर केवल ईरान की सैन्य शक्ति से नहीं है, बल्कि उस तबाही से भी है जो वह अपनी खुफिया पैठ और वैचारिक प्रभाव का उपयोग करके उनकी जनसंख्या में फैला सकता है। अब यह डर इस तथ्य से और बढ़ गया है कि इसे कई लोग पश्चिमी शक्ति के खिलाफ पहला वास्तविक मुस्लिम प्रतिरोध मानेंगे, इराक, अफगानिस्तान और सीरिया जैसी लगातार अपमानजनक घटनाओं के बाद। खाड़ी अरबों को सबसे अधिक डर अपने ही लोगों के इस्लामी विद्रोह से है यानी एक नया अरब स्प्रिंग।

इसी डर के कारण सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ रक्षा समझौता फिर से बहाल किया और अपनी सेना को उसमें शामिल किया। लेकिन पाकिस्तान शायद ही ईरान या इराक के खिलाफ लड़ता दिखेगा। वह वहां पैसों की खातिर रहेगा। डर इतना ज्यादा है कि कतर ने भी स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान को 5 अरब डॉलर दिए हैं।

साफ कहें तो अमेरिका युद्ध से जुड़े उद्देश्य पूरे नहीं कर सका है। उसके पास न तो ताकत है और न ही प्रेरणा है कि वह जमीनी हमलों के साथ युद्ध दोबारा शुरू कर सके। हेगसेथ ने कहा था कि ईरान युद्ध विराम चाहता था लेकिन अब यह स्पष्ट हो चुका है कि ट्रंप ही समझौते के लिए अधिक उत्सुक हैं। यह हमें हमारे मुख्य प्रश्नों तक ले जाता है। क्या ईरानी नेतृत्व की हत्या एक मास्टरस्ट्रोक थी या एक भूल? आत्मसमर्पण के बजाय, ईरानी प्रतिरोध युद्ध विराम के दिन तक दृढ़ और लगातार बना रहा। वास्तव में ये हत्याएं गलती साबित हुई हैं।

वर्तमान वार्ताओं में अमेरिका के लिए बेहतर यही होता कि वह अयातुल्लाह खामेनेई (जो 86 वर्ष की आयु में प्रोस्टेट कैंसर के शिकार थे) और उनके प्रमुख सैन्य सहयोगियों से उनकी पराजय के बाद निपटता। दो देशों के बीच होने वाली जंग में आपको किसी के साथ बातचीत करनी ही होती है। यही वजह है कि कभी शीर्ष नेताओं को निशाना नहीं बनाया जाता है। रूस और यूक्रेन इसका उदाहरण हैं।

किसी आतंकी, गैर राज्य समूह और संगठित राज्यों से निपटने में अंतर होता है। हमास, हिज्बुल्लाह और हूती पहले वर्ग में आते हैं, लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद भी। राष्ट्रीय नेताओं की बात अलग होती है। क्या 1991में सद्दाम हुसैन को बख्शकर जॉर्ज बुश सीनियर ने समझदारी दिखाई थी बजाय कि जॉर्ज बुश जूनियर के जिन्होंने 2006 में सद्दाम को मार डाला। क्या लीबिया को गद्दाफी की हत्या से कोई फायदा हुआ?

अंततः हम भारतीय अनुभव पर आते हैं। सैद्धांतिक रूप से भारत ने सबसे कठिन विद्रोहों से लड़ते हुए भविष्य की वार्ताओं के लिए शीर्ष नेताओं को सुरक्षित रखा। मिजो और नागा के भूमिगत नेताओं और मणिपुर तथा असम के नेताओं पर कभी हमला नहीं हुआ।

अक्सर उन्हें बख्श दिया गया या जब वे घिर गए तो उन्हें सूचना भी दी गई। भारतीय शांति सेना के वरिष्ठों से पूछिए, उनका यह दृढ़ रूप से मानना रहा है कि जब वे वेलुपिल्लई प्रभाकरण को घेरते तो रॉ उन्हें सूचना दे रहा था। यह सही था क्योंकि उनको मारना नरसंहार होता जिसे केवल श्रीलंका ही सह सकता था। महिंदा राजपक्षे ने 2009 में यही किया भी।

कश्मीर में भारत हमेशा सशस्त्र समूहों और असशस्त्र अलगाववादियों के बीच रेखा खींचता है। हुर्रियत नेताओं को हमेशा सुरक्षा दी जाती है, चाहे दिल्ली में सत्ता में कोई भी हो। यहां तक कि सबसे कट्टरपंथी, सैयद अली शाह गिलानी को भी दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञों के जरिये बड़ी देखभाल दी गई।

दो हुर्रियत नेताओं मीरवाइज मौलवी फारूक (21 मई 1990) और अब्दुल गनी लोन (21 मई 2002) की हत्या आईएसआई की कारस्तानी थी। इसी तरह नक्सलियों को दशकों तक कई बार आम माफी की पेशकश की गई और सुरक्षित मार्ग के साथ वार्ता के लिए आमंत्रित किया गया। यही कारण है कि कई जीवित हैं और आम माफी व पुनर्वास के साथ सामान्य जीवन जीते हैं।

भारत में नेतृत्व-विहीन करने वाली एकमात्र कार्रवाई ऑपरेशन ब्लूस्टार में जरनैल सिंह भिंडरांवाले और उनके शीर्ष साथियों की थी। लेकिन इसके चलते आतंकवाद फिर लौट आया, और अधिक अलगाव के साथ।

बेशक ट्रंप के बारे में कयास लगाना गलत है। परंतु सत्ता परिवर्तन हेतु किसी देश के नतृत्व की हत्या चाहे जितनी रोमांचक लगे वह होती हमेशा गलत है।

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First Published - April 20, 2026 | 2:48 AM IST

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