ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध छिड़ने के बाद भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले लगातार दबाव में है। रुपये को संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने अपने प्रयास तेज कर दिए हैं। हालांकि, आरबीआई ने जो उपाय किए हैं उनका विपरीत असर होने और विदेशी मुद्रा बाजार में व्यवधान उत्पन्न का खतरा है। इसके अलावा, जिन दबावों को दूर करने की कोशिश की जा रही है वे और अधिक प्रबल हो सकते हैं जिसका अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
फरवरी 2026 के अंत में जब युद्ध छिड़ा तो लगभग 730 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार से लैस आरबीआई ने आक्रामक हस्तक्षेप किया। केंद्रीय बैंक ने अकेले मार्च में हाजिर बाजार में 30 अरब डॉलर से अधिक की बिकवाली की और फॉरवर्ड मार्केट में भी बड़े पैमाने पर डॉलर बेचे। इन प्रयासों के बावजूद रुपया कमजोर होता रहा।
मार्च के अंत में आरबीआई ने अपनी रणनीति बदल दी। उसने नियामक प्रतिबंध लागू किए। केंद्रीय बैंक ने बैंकों को ऑफशोर नॉन-डिलिवरेबल फॉरवर्ड (एनडीएफ) बाजार में निवेश करने से रोक दिया और उनका दैनिक ऑनशोर फॉरेक्स एक्सपोजर 10 करोड़ डॉलर तक सीमित कर दिया। इन उपायों का कुछ तात्कालिक प्रभाव दिखाई दिया जिससे रुपये में थोड़े समय के लिए स्थिरता आई। मगर मुख्य प्रश्न यह है कि क्या यह रणनीति कायम रह सकती है।
संदेह करने के ठोस कारण हैं। पहली चिंता इन उपायों की व्यापक और अचानक वाली प्रकृति को लेकर है। आरबीआई ने न केवल नई पोजीशन पर रोक लगाई बल्कि बैंकों को मौजूदा पोजीशन को समाप्त करने का भी आदेश दिया जिसकी लागत कथित तौर पर 4,000-5,000 करोड़ रुपये थी। असल में बैंकों को उन कार्यों से रोका गया जो उनके लिए पूरी तरह से वैध थे। इस तरह की पूर्वव्यापी लागत से विश्वास कम होने और बैंकों के विदेशी मुद्रा बाजारों में अधिक सतर्क रहने का जोखिम बढ़ गया है।
कम भागीदारी से तरलता कम हो सकती है और जब यह कम होगी तो मुद्राएं अधिक अस्थिर हो जाती हैं। यह विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि जिस गतिविधि पर रोक लगाई जा रही थी वह न तो अवैध थी और न ही संदिग्ध। इसका अधिकांश भाग साधारण आर्बिट्राज था (यानी घरेलू बाजार में डॉलर खरीदना और उन्हें विदेशी बाजार में बेचना और दोनों बाजारों में विनिमय दरों को संतुलित रखना)।
ये व्यापार पूरी तरह से सामान्य थे और आरबीआई की अनुमति से ही हो रहे थे। वास्तव में, कई वर्षों से आरबीआई मुद्रा के अंतरराष्ट्रीयकरण के व्यापक प्रयास के तहत रुपये में विदेशी व्यापार को प्रोत्साहित कर रहा था। सिंगापुर, लंदन और दुबई जैसे केंद्रों में एक विशाल ऑफशोर बाजार विकसित हो चुका है जिसका अनुमानित दैनिक कारोबार 70 अरब डॉलर है। भारतीय बैंकों को इस बाजार में भाग लेने से अचानक रोककर आरबीआई ने अपना पुराना रुख बदल दिया है। हालांकि, केंद्रीय बैंक ने इस कदम को अस्थायी बताया है मगर इस तरह के अचानक नीतिगत बदलाव से स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ जाती हैं।
बाजार के लिए ये उपाय एक असहज संकेत देते हैं कि स्थिति कहीं अधिक गंभीर हो सकती है जिसे शायद रिजर्व बैंक अकेले न संभाल पाए। निवेशकों को आश्वस्त करने के बजाय इससे विश्वास कम होने का खतरा है। यह हस्तक्षेप जिस उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए किया गया था उसके बिल्कुल विपरीत है। एक और व्यापक चिंता भी है। इसे लेकर सवाल उठ सकते हैं कि वैध बाजार गतिविधियों पर प्रतिबंध लगाने से भविष्य में क्या हो सकता है।
निवेशक आगे और प्रतिबंधों जैसे बाहर भेजे जाने वाले धन पर सीमा को लेकर चिंतित हो सकते हैं और एहतियात के तौर पर अपनी धन राशि बाहर निकाल सकते हैं। अगर भविष्य में निकासी मार्गों के अवरुद्ध होने का खतरा होगा तो विदेशी निवेशक भारत में पूंजी लाने से कतरा सकते हैं । अगर यह डर बढ़ा तो आरबीआई के कदम से पूंजी देश से बाहर जा सकती है जिसे वह रोकने की कोशिश कर रहा है।
साथ ही, इन उपायों से विदेशी मुद्रा बाजार के काम-काज पर भी असर पड़ने का खतरा है। मौजूदा अत्यधिक अस्थिरता के दौर में कंपनियों को अपने मुद्रा जोखिम को कम करने की आवश्यकता होती है। बैंकों की विदेशी मुद्रा स्थितियों पर सीमा लगाने और उनकी भागीदारी सीमित करने वाले इन उपायों से हेजिंग लागत बढ़ने की आशंका है। शुरुआती रिपोर्ट से पता चलता है कि ऐसा पहले से ही हो रहा है। जैसे-जैसे भारतीय बैंक पीछे हट रहे हैं वैसे-वैसे हेजिंग अधिक महंगी हो गई है। ऐसा तब हो रहा है जब विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक पूंजी लगाने से पहले विनिमय दरों को लेकर आश्वस्त होना चाहते हैं। इससे भारत निवेश के लिहाज से आकर्षक बाजार नहीं रह जाता है।
इससे हम मूल समस्या पर आते हैं। रुपये पर दबाव केवल अस्थायी या हालात पर निर्भर नहीं बल्कि संरचनात्मक है। कुछ समय से भारत में पूंजी प्रवाह सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लगभग 1 फीसदी के मामूली चालू खाता घाटे को भी वित्तपोषित करने के लिए पर्याप्त नहीं रहा है। यह असंतुलन यह समझने में सहायक है कि युद्ध से पहले ही 2025 में रुपया एशिया की सबसे कमजोर मुद्राओं में एक क्यों था।
पश्चिम एशिया संघर्ष ने इस स्थिति को और भी बदतर बना दिया है। वैश्विक तेल और गैस की बढ़ती कीमतें चालू खाते के घाटे को बढ़ा रही हैं जो ऊर्जा आयात पर भारत की भारी निर्भरता को दर्शाती हैं। साथ ही, वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति और भारतीय परिसंपत्तियों के प्रति निवेशकों की रुचि में गिरावट के कारण पूंजी प्रवाह कमजोर हो रहा है। ऐसी परिस्थितियों में रुपये का कुछ अवमूल्यन न केवल अपरिहार्य है बल्कि बाह्य संतुलन को बहाल करने के लिए आवश्यक भी है।
इस पृष्ठभूमि में यह स्पष्ट नहीं है कि आरबीआई के उपाय वास्तव में क्या हासिल कर सकते हैं। अधिक से अधिक सकारात्मक असर यह होगा कि वे आवश्यक समायोजन को टाल सकते हैं। बदतर स्थिति यह हो सकती है कि वे विश्वास कमजोर कर और पूंजी प्रवाह को रोक कर अंतर्निहित दबावों को बढ़ा सकते हैं। विदेशी मुद्रा बाजार के बाहर भी इसके परिणाम दिखने लगे हैं।
विदेशी मुद्रा रणनीति को लेकर अनिश्चितता ने बाजार में ब्याज दरों को बढ़ा दिया है जिससे ऊर्जा संकट के कारण विकास पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव और भी बढ़ गए हैं। संभवतः समय आने पर प्रतिबंध हटा लिए जाएंगे मगर तब भी विश्वास बहाल होने में काफी समय लगेगा।