वर्ष 1997 का केंद्रीय बजट कुछ साहसिक पहलों के लिए जाना जाता है। वह बजट आने से करीब एक हफ्ते पहले तेजी से बढ़ रहे दूरसंचार क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया। उसी वर्ष 20 फरवरी को भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य इस क्षेत्र के नियमन का काम सरकार पर छोड़ने के बजाय स्वतंत्र निकाय को सौंपना था।
इसके पीछे की कहानी महत्त्वपूर्ण थी। मोबाइल टेलीफोन सेवा 1995 में शुरू हो चुकी थी और निजी कंपनियां सरकार के स्वामित्व वाली उन फोन सेवा प्रदाता कंपनियों को टक्कर देने को तैयार थीं, जिनका वर्षों से लैंडलाइन सेवा पर एकाधिकार था। योजना यह थी कि कामों को दूरसंचार विभाग और ट्राई के बीच बांट दिया जाए। दूरसंचार विभाग को नीति निर्माता और ट्राई को दूरसंचार उद्योग का प्रमुख नियामक बनाया जाना था।
किंतु लगता है कि जिस उद्देश्य से ट्राई का गठन किया गया था, वह इस सफर के दौरान पूरा नहीं हो पाया है। उद्योग जगत के पर्यवेक्षक के लिए कागज पर ट्राई नियामक संस्था होगी मगर व्यवहार में वह केवल सिफारिश करने वाली संस्था है। लाइसेंस जारी करने, स्पेक्ट्रम का प्रबंधन करने और सेवा प्रदाताओं के लिए दंड तय करने का काम दूरसंचार विभाग ही करता है। दूसरे शब्दों में कहें तो वास्तव में नियामक वही है। वह सेवा गुणवत्ता के मानकों के पालन समेत उपभोक्ताओं से जुड़े तमाम मसले देखता है और ट्राई में भर्ती के नियम भी तय करता है।
आज नवीनतम तकनीक सभी दूरसंचार सेवाओं की रीढ़ है और डिजिटल नेटवर्क ने पारंपरिक नेटवर्कों की जगह ले ली है तब किसी भी नियामक प्रक्रिया में गति अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। भारत में कई तकनीकी मामलों में नियामक ढांचा बंटा हुआ है। उदाहरण के लिए, साइबर सुरक्षा से जुड़े मसलों में गृह मंत्रालय, दूरसंचार विभाग, इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय तथा ट्राई सहित विभिन्न संस्थाएं फैसले लेती हैं।
व्हाट्सऐप की नई पहल का उदाहरण भी ले सकते हैं, जिसमें उपभोक्ता अपने नाम पंजीकृत कर सकते हैं ताकि संदेश भेजते समय उनके मोबाइल नंबर गोपनीय रहें। सरकार पहले ही मेटा (व्हाट्सऐप की मूल कंपनी) को यह सेवा रोकने का आदेश दे चुकी है। मामला बढ़ा तो कई मंत्रालय और नियामक हस्तक्षेप कर सकते हैं।
दूरसंचार क्षेत्र की बात करें तो पेचीदा डिजिटल व्यवस्था में नियमों के कार्यान्वयन में दो नियामकों – ट्राई और दूरसंचार विभाग की मौजूदगी से लंबा समय लगता है और विलंब हो जाता है, जिसका असर उद्योग और उपभोक्ताओं दोनों पर पड़ता है। ट्राई का मकसद तो उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना और निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा तथा समान अवसरों के जरिये उद्योग का विकास सुनिश्चित करना था। तकनीकी प्रगति लंबे समय से मौजूद नियामकीय व्यवस्था को पछाड़ रही है और उपभोक्ता तथा उद्योग जगत खुद को ठगा हुआ महसूस कर सकते हैं।
नियामक और सरकार के बीच घूमते रहने वाले निर्णयों के कारण होने वाले नियामकीय विलंब को प्रक्रिया सुगम बनाकर टाला जा सकता है। स्पैम कॉल और अवांछित संचार को रोकना ऐसा ही उदाहरण है, जहां नियामकीय व्यवस्था कई तरह से बदली है किंतु उपभोक्ताओं को अब भी राहत नहीं मिली है और उद्योग यही सोच रहा है कि आगे क्या होगा।
वर्ष 1997 में ट्राई के गठन का एक प्रमुख कारण यह आशंका थी कि यदि महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड और विदेश संचार निगम लिमिटेड में स्वामित्व रखने वाली सरकार निजी कंपनियों के लिए खोले गए क्षेत्र का विनियमन जारी रखती है तो हितों का टकराव हो सकता है। आज सरकारी स्वामित्व वाली भारत संचार निगम लिमिटेड और एमटीएनएल के अलावा वोडाफोन आइडिया में भी सरकार की 49 प्रतिशत हिस्सेदारी है। हालांकि सरकार वोडाफोन आइडिया में प्रवर्तक नहीं है मगर हितों के टकराव की आशंका बनी हुई है क्योंकि सरकार ही लाइसेंस देने वाली संस्था है।
कुछ प्रमुख अंतरराष्ट्रीय नियामकों को देखें तो ट्राई के अधिक शक्तियां देने की आवश्यकता बेहतर ढंग से समझी जा सकती है। द फेडरल कम्युनिकेशंस कमीशन ऑफ अमेरिका (1934 में स्थापित), द ऑफिस ऑफ कम्युनिकेशंस ऑर ऑफकॉम ऑफ द यूनाइटेड किंगडम (2003 में स्थापित), ऑस्ट्रेलियन कम्युनिकेशंस ऐंड मीडिया अथॉरिटी (2005 में स्थापित) ही लाइसेंस देने से लेकर स्पेक्ट्रम संभालने तक हर चीज के लिए व्यापक विनियामक और शक्ति केंद्र हैं।
देश का दूरसंचार क्षेत्र 1997 से अब तक काफी बदल चुका है। फरवरी 1997 में जब ट्राई की स्थापना हुई थी तब भारत में कुल 148.8 लाख टेलीफोन ग्राहक थे, जिनमें केवल 3.4 लाख ग्राहक सेल्युलर मोबाइल सेवाओं का उपयोग करते थे। प्रति 100 व्यक्तियों पर केवल 1.5 का दूरसंचार घनत्व था। वर्ष 2026 में टेलीफोन ग्राहकों की संख्या 134 करोड़ हो गई है, जिनमें 129.4 करोड़ मोबाइल फोन का उपयोग करते हैं। लगभग 30 वर्ष में दूरसंचार घनत्व बढ़कर प्रति 100 व्यक्तियों पर 94.02 हो गया है।
ट्राई अधिनियम में पहला संशोधन 2000 में हुआ था, जब प्राधिकरण के नियामकीय और विवाद निपटान कार्यों को अलग किया गया था। उसी समय दूरसंचार विवाद निपटान एवं अपील न्यायाधिकरण (टीडीसैट) की स्थापना हुई थी। दूसरा संशोधन 2014 में उस नियम को बदलने के लिए किया गया था जो ट्राई के पूर्व अध्यक्षों और पूर्णकालिक सदस्यों को भविष्य में सरकारी नौकरी करने से रोकता था।
जब 1997 में इस नियामक प्राधिकरण की स्थापना हुई थी तब से इसके नौ अध्यक्ष रह चुके हैं। दसवें अध्यक्ष की नियुक्ति संभवतः 2027 में होगी मगर उससे पहले ट्राई की शक्तियों की समीक्षा करना अच्छा विचार हो सकता है। शायद ट्राई अधिनियम में तीसरा संशोधन किया जाए?