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स्टार्टअप में मंदी

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 5:41 PM IST

गत वर्ष लगभग इसी समय हमारे देश में यूनिकॉर्न (ऐसी तकनीक आधारित स्टार्टअप जिनका मूल्यांकन एक अरब डॉलर या उससे अ​धिक हो) तेजी से उभर रही थीं। इस वर्ष के आरंभ तक स्टार्टअप में शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने की होड़ भी असाधारण रूप से तेज थी। अंतरराष्ट्रीय निवेशकों से नयी पूंजी जुटाना इंटरनेट उद्यमियों के लिए काफी आसान काम था। बहरहाल, बीते कुछ महीनों में हालात में तेजी से बदलाव आया है और अब इस बात का आकलन करने का उपयुक्त समय है कि क्या स्टार्टअप भारत की विकास गाथा का इंजन हैं या नहीं। चूंकि अ​धिकांश स्टार्टअप वेंचर कैपिटल पर निर्भर करती हैं इसलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाली उथलपुथल माहौल को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। यह बात इस सदी के आरंभ में डॉटकॉम का बुलबुला फूटने और 2008 के वित्तीय संकट के मामले में भी कही जा सकती है। समग्र तौर पर देखा जाए तो मौजूदा संकट जो अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियों के शेयरों में गिरावट, बढ़ती ब्याज दरों, चीन संकट और रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से उत्पन्न हुआ है वह शायद 2001 के डॉटकॉम संकट से अ​धिक बड़ा न हो लेकिन स्टार्टअप के लिए अनि​श्चितता तेजी से बढ़ी है।
बीते कुछ समय से फूड डिलिवरी से लेकर एडटेक और फिनटेक तक तमाम क्षेत्रों की स्टार्टअप में छंटनी की खबरें लगातार सामने आ रही हैं। जबकि अतीत में ये क्षेत्र भारी मूल्यांकन पर फंड जुटाने और यूनिकॉर्न  की बढ़ती तादाद की वजह से चर्चा में रहते आए हैं। निवेश फंस रहा है, सौदे प्रभावित हो रहे हैं, सूचीबद्धता का मामला ढीला है, सैकड़ों और हजारों की तादाद में लोगों की छंटनी हो रही है और वेंचर कैपिटल फर्मों के बोर्ड रूम में चिंता की लहर है। यह इस क्षेत्र की नयी हकीकत है। यह वह क्षेत्र है जो लंबे समय तक मुनाफे को अवहेलना की दृ​ष्टि से देखता रहा है और खर्च को लेकर लापरवाह रहा है। वै​श्विक उदाहरण बताते हैं कि जो कंपनियां आत्मनिर्भर हैं, जहां कर्मचारियों की तादाद बहुत ज्यादा नहीं है और जिनकी बैलेंस शीट मजबूत है, उनके मौजूदा संकट से निपटने की उतनी ही अ​धिक संभावना है। भारत की स्टार्टअप को भी इसका अनुसरण करना चाहिए।
अब तक लंबे नुकसान की परंपरा रही है जो आगे काम नहीं आएगी। स्टार्टअप पूंजी समृद्ध निवेशकों से फंड जुटाना जारी रखेंगी क्योंकि हजारों स्टार्टअप ने यही तरीका अपनाकर एक तरह के कुटीर उद्योग को सिलिकन वैली के आसपास इंटरनेट आधारित अर्थव्यवस्था में बदला है। अगर स्टार्टअप को विकास का वाहक बनना है तो उन्हें अपनी राह बदलनी होगी। स्टार्टअप के लिए यह आवश्यक है कि वे कुछ यूरोपीय स्टार्टअप की तरह आत्मनिर्भर बनें और मुद्रा भंडार तैयार करें। उन यूरोपीय स्टार्टअप को शायद अब उस अमेरिकी ​वेंचर कैपिटल व्यवस्था पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा जिसकी हालत खराब है। भारतीय स्टार्टअप की सहायता के लिए स्थानीय निवेशकों को बढ़ावा देना भी अच्छा विकल्प होगा।
ट्रैक्सन जियो की तिमाही रिपोर्ट के ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारतीय स्टार्टअप ने अप्रैल से जून 2022 के बीच 6.9 अरब डॉलर की रा​शि जुटाई जो पिछली तिमाही के 10.3 अरब डॉलर से 33 प्रतिशत कम थी। सालाना आधार पर जुटाया जाने वाला फंड भी घटा। इन बातों से लगता है कि वृहद आ​र्थिक हालात तथा भूराजनीतिक परि​स्थितियों के कारण स्टार्टअप को लेकर निवेशकों का आत्मविश्वास काफी कम हुआ है। जिंस कीमतों से लेकर मुद्रास्फीति और उच्च ब्याज दरों तक हर चीज माहौल पर असर डाल रही है। यह सिलसिला कुछ समय तक जारी रह सकता है। विश्लेषकों का मानना है कि निवेशक उन स्टार्टअप पर दांव लगाएंगे जिनमें दीर्घकालिक संभावनाएं हैं। ऐसे में नवाचार ही किसी भी स्टार्टअप कारोबार के मूल्यांकन के मूल में होगा।

First Published : July 10, 2022 | 11:44 PM IST