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भारतीय अर्थव्यवस्था को स्थिर करने के लिए: क्यों मुद्रा अवमूल्यन एक अच्छा विकल्प है

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खुले अर्थतंत्र के स्वचालित स्थिरीकरण को अपनाना हमें एक दीर्घकालिक, स्थिर और सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था देगा। इस विषय में विस्तार से बता रहे हैं अजय शाह

Last Updated- March 20, 2026 | 10:16 PM IST
Economy
इलेस्ट्रेशन- अजय कुमार मोहंती

बीते दो दशकों में पश्चिम एशिया में छिड़ी जंग ने वैश्विक आर्थिक मंदी के हालात तो निर्मित किए ही हैं, साथ ही तेल एवं गैस से जुड़े झटके भी दिए हैं। इस निराशा का प्रसार भारत तक भी हुआ है और इसके चार अलग-अलग माध्यम रहे हैं: गैस की कमी, तेल कीमतों में इजाफा, विदेश से आने वाले धन में कमी और पश्चिम एशिया से निर्यात मांग में कमी।

यह भारत के लिए प्रतिकूल वृहद आर्थिक झटका लाने वाला साबित हो रहा है। आखिर अर्थव्यवस्था इस बाहरी माहौल के साथ किस प्रकार समायोजन करे? स्थिरता किन कारकों से आएगी? कुछ प्रकार की स्थिरता के लिए सरकरी कदमों की आवश्यकता होती है तो वहीं कुछ बिना प्रयास यानी स्वचालित तरीके से तैयार होती हैं। उनके मामले में केवल सरकार को हाशिए से नजर रखने की आवश्यकता होती है।

हमारे लिए इस वैश्विक अव्यवस्था में आर्थिक समायोजन का सबसे बड़ा मार्ग विनिमय दर का अवमूल्यन है। कमजोर रुपया सापेक्ष कीमतों में बदलाव लाता है, जो अर्थव्यवस्था की मदद करता है। इससे आयातित वस्तुओं के दाम बढ़ते हैं। ऊंची कीमतों के कारण भारत के लोग कम आयात करेंगे। वे अपनी खपत में बदलाव करेंगे और भारतीय कंपनियों से अधिक खरीदेंगे, जिससे घरेलू मांग को बल मिलेगा।

बाहरी मोर्चे पर, कमजोर रुपया भारतीय निर्यात को अधिक प्रतिस्पर्धी बनाता है, जिससे विदेशी खरीदार भारत से अधिक खरीदते हैं। इसके अतिरिक्त, उन उत्पादों के लिए जो वैश्विक कीमतों पर व्यापार किए जाते हैं, जैसे स्टील आदि की घरेलू कीमत, वैश्विक कीमत गुणा विनिमय दर से तय होती है। ऐसी कंपनियों के लिए, विनिमय दर का अवमूल्यन सीधे राजस्व में लाभ पहुंचाता है।

यहां यह प्रश्न पूछा जा सकता है कि रुपया भारत के लिए ये सभी अच्छी चीजें तब क्यों करता है जब हमें इसकी सबसे अधिक आवश्यकता होती है। वैश्विक संकट का सामना करते समय रुपया क्यों अवमूल्यित होता है? इसका मुख्य कारण पूंजी प्रवाह में निहित है। जब भारत को प्रतिकूल झटके लगते हैं, तो वैश्विक पूंजी प्रवाह भारत में सस्ते परिसंपत्ति मूल्यांकन की मांग करता है। जोखिम का यह पुनर्मूल्यांकन मुद्रा बाजार पर दबाव उत्पन्न करता है। निवेशक अपने पोर्टफोलियो को समायोजित करते हैं, पूंजी प्रवाह प्रतिक्रिया देता है, और विनिमय दर नीचे की ओर जाती है।

इन कठिन समयों में हम देख रहे हैं कि बाजार अर्थव्यवस्था की पूरी मशीनरी सक्रिय है। पूंजी खाता मुद्रा का अवमूल्यन करता है, और मुद्रा का अवमूल्यन भारत में कंपनियों और नौकरियों को मजबूत करता है। यह एक उल्लेखनीय स्वचालित स्थिरीकरण है। इस तंत्र की सुंदरता यह है कि इसके लिए भारतीय अधिकारियों या नीति-निर्माताओं की किसी कार्रवाई की आवश्यकता नहीं होती। न राज्य क्षमता निर्माण की समस्या है, न नीतिगत त्रुटियों की समस्या। ये सभी अच्छी चीजें स्वतः ही घटित होती हैं। केवल तब ही गलती हो सकती है जब राज्य इन प्राकृतिक बाजार प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करता है। यह वास्तव में देखने योग्य है। यानी मूल्य प्रणाली का शांत संतुलन।

खुले पूंजी खाते और लचीली विनिमय दर का संयोजन हमें यह स्थिरता मुफ्त में देता है। यह एक स्वचालित स्थिरीकरण बन जाता है। अच्छे समय में यह अव्यावहारिक उत्साह को नियंत्रित करता है और बुरे समय में यह संकट को टालता है। भारत में कई लोग पूंजी खाते की खुली व्यवस्था और बाजार-निर्धारित विनिमय दर का विरोध करते हैं। इन दोनों की भारत में व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाने में मूल्यवान योगदान को बेहतर ढंग से समझना मददगार होगा। फिलहाल भारत का प्रदर्शन अच्छा नहीं है और हम विनिमय दर अवमूल्यन से हो रहे लाभ को देख रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप केंद्रीय बैंक बाजार प्रक्रिया में हस्तक्षेप नहीं करता। परंतु अन्य अवसरों पर यह बाजार प्रक्रिया में अलग तरह से हस्तक्षेप करता है। इससे तमाम समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

निजी क्षेत्र को यह अनुमान नहीं होता कि विवेकाधीन और अप्रत्याशित सरकारी हस्तक्षेप कब उसकी अपेक्षाओं को अस्थिर कर देगा और उसके निर्णय लेने की प्रक्रिया को बिगाड़ देगा। जब कंपनियां विनिमय दर व्यवस्था का आकलन नहीं कर पातीं, तो निवेश, क्षमता विस्तार और मुद्रा की हेजिंग से संबंधित उनके विकल्प प्रभावित होते हैं। इसके अलावा, विवेकाधीन हस्तक्षेप में गलतियों और सीमित राज्य क्षमता की समस्याएं होती हैं। बाजार को व्यवस्थित रूप से मात देने और ‘सही’ विनिमय दर तय करने के लिए आवश्यक ज्ञान राज्य तंत्र के पास उपलब्ध नहीं है। यह कहना अच्छा लगता है कि ‘बिल्कुल, अभी विनिमय दर का अवमूल्यन भारत के हित में है, लेकिन हम भविष्य में अपने निर्णय के आधार पर हस्तक्षेप करने का अधिकार सुरक्षित रखते हैं।’ परंतु गहराई से देखें तो यह एक खराब व्यवस्था है।

अर्थशास्त्रियों के पास इस परिदृश्य के लिए एक बड़ा ढांचा है। और वह है एक ‘असंभव त्रयी’। इसका अर्थ है कि कोई भी देश तीन में से केवल दो विशेषताएं ही रख सकता है- अपनी विनिमय दर पर नियंत्रण, मौद्रिक नीति पर नियंत्रण, और पूंजी खाते की खुली व्यवस्था के लाभ। इनमें से कोई भी दो हासिल किए जा सकते हैं लेकिन तीनों नहीं। यदि कोई केंद्रीय बैंक विनिमय दर को नियंत्रित करने की कोशिश करता है जबकि पूंजी स्वतंत्र रूप से प्रवाहित होती है, तो वह घरेलू ब्याज दरों पर नियंत्रण खो देता है।

भारत में हमने एक प्रश्न को स्पष्ट कर लिया है। हम जानते हैं कि हमें अपनी मौद्रिक नीति पर नियंत्रण चाहिए, जिसमें मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित हो। मौद्रिक नीति केवल उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को 4 फीसदी पर स्थिर रखने के उद्देश्य के लिए समर्पित होगी। भारत में हर कोई इस बिंदु को समझ चुका है।
मुद्रास्फीति-लक्ष्य सुधार को पूरा करने के लिए हमें बाकी दो हिस्सों की आवश्यकता है। सरकार को विनिमय दर पर गतिविधियों और पूंजी खाते में हस्तक्षेप से भी पीछे हटना होगा। दोनों तरह के हस्तक्षेप विरोधाभास पैदा करते हैं, कंपनियों से गलतियां करवाते हैं और भारतीय आर्थिक वृद्धि को बाधित करते हैं। खुले अर्थतंत्र के स्वचालित स्थिरीकरण को अपनाना हमें एक दीर्घकालिक, स्थिर और सामंजस्यपूर्ण व्यवस्था देगा, जो भारतीय सफलता को बढ़ावा देने के लिए सबसे उपयुक्त है।


(लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - March 20, 2026 | 10:05 PM IST

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