प्रतिभूति अपील पंचाट (एसएटी) ने एक हालिया निर्णय में पूंजी बाजार नियामक (सेबी) के उस निर्णय को बरकरार रखा जिसमें उसने कहा था कि एक सूचीबद्ध बैंक ने जरूरी खुलासों में देरी की। परंतु पंचाट ने नियामक द्वारा लगाए गए 10 लाख रुपये के जुर्माने को प्रवर्तन में देरी के कारण महज चेतावनी मेंं तब्दील कर दिया। यह मामला अहम मसलों को लेकर अकाट्य स्पष्टता के कारण एकदम अलहदा है।
पंचाट ने अनिवार्य तौर पर इन दलीलों को खारिज कर दिया कि जिनमें कहा गया था कि एक बैंक के प्रवर्तकों के दूसरे बैंक (जिसका आगे विलय होना था) के साथ समझौते के कारण ऐसे खुलासे करना आवश्यक नहीं रह गया था। हालांकि चूंकि कार्रवाई की शुरुआत घटना के एक दशक बाद की गई थी और इसके तहत ही 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया था तो ऐसे में पंचाट ने जुर्माने की जगह चेतावनी भर दी। मामले में विशुद्ध रूप से इतना ही निर्णय हुआ लेकिन पंचाट इन नतीजों पर क्यों पहुंचा इसे समझना अधिक आवश्यक है?
पहले मसले की बात करें तो अपील करने वाले की दलील थी कि एक सूचीबद्ध कंपनी और एक अन्य सूचीबद्ध कंपनी के प्रवर्तकों के बीच समझौते का खुलासा करना आवश्यक नहीं है। यह दलील खारिज कर दी गई। कहा गया कि यह समझौता दो सूचीबद्ध कंपनियोंं के बीच नहीं था और एक पक्ष का प्रतिनिधित्व प्रवर्तकों द्वारा किया जा रहा था न कि उस कंपनी द्वारा जिसका आगे विलय होना था। यह दलील भी दी गई कि यह समझौता एक ऐसा अनुबंध था जहां कुछ खास शर्तें पूरी होने पर ही अनुबंध पूरा होता था और ऐसे में यदि शर्तें पूरी नहीं होतीं तो अनुबंध भी आकार नहीं लेता। उदाहरण के लिए विलय के लिए केंद्रीय बैंक की मंजूरी आवश्यक थी।
इन दलीलों को नकारते हुए पंचाट ने इस बात को लेकर बात स्पष्ट की कि आखिर ऐसी घटनाओं की अहमियत और निश्चितता का निर्धारण किस प्रकार किया जाए। पंचाट ने अपने आदेश में कहा कि निश्चितता जहां किसी अनुबंध मेंं सबसे अहम है लेकिन किसी घटना की अहमियत का निर्धारण तो खुलासे से ही होता है। पंचाट ने निश्चितता का विश्लेषण करते हुए कहा कि समझौते पर बड़े अंशधारकों और अधिग्रहीत बैंक के अधिकारियों ने हस्ताक्षर किए थे। ऐसे में यह नहीं कहा जा सकता है कि उक्त समझौता किसी किस्म का मसौदा था जो हकीकत से संबंधित नहीं था। दिलचस्प बात यह है कि जिस कंपनी के प्रवर्तकों ने समझौते पर हस्ताक्षर किए उन्होंने इसका खुलासा भी किया।
पंचाट ने कहा कि इस समझौते में ऐसे प्रावधान शामिल किए गए जो सुनिश्चित और निर्णयात्मक थे। इसमें शेयरों की अदला-बदली का अनुपात और प्रस्तावित विलय की अहम प्रक्रियात्मक शर्तें भी शामिल हैं। पंचाट ने कहा कि इससे जुड़ी समय सीमा के तथ्य यह संकेत देते हैं कि पेशवर कंपनियां जो सुविचारित और बेहतर क्रियान्वयन के साथ काम करती हैं वे कभी बाध्यकारी समझौतों को लेकर कोई व्यावहारिक अनिश्चितता का तत्त्व हीं छोड़तीं। हालांकि विधिक आधार पर कई बार कठिन परिस्थितियां भी बनती हैं और इन समझौतों के बाध्यकारी होने, अनुबंध की प्रकृति आदि को लेकर सवाल उठ सकते हैं लेकिन वह खुलासा अधिनियम का आधार नहीं है।
ऐसी परिस्थितियों में अगर खुलासे के लिए पूर्ण निश्चितता और कारोबारी कदमों आदि के पूरा होने की प्रतीक्षा करनी पड़े तो खुलासा कानून निष्प्रभावी हो जाएगा। पंचाट ने कहा कि भेदिया कारोबार को रोकने वाले बुनियादी नियम भी तब गलत साबित होंगे। पंचाट के अनुसार खुलासा आधारित नियामकीय व्यवस्था मेंं खुलासे का उद्देश्य और उसकी भावना सहज और स्पष्ट होती है, हर भौतिक और मूल्य की दृष्टि से संवेदनशील घटना या सूचना का खुलासा किया जाए और उस समय भी खुलासा किया जाए जब किसी को किसी तरह का संदेह हो। इसका बारीक कानूनी परीक्षण, छिद्रान्वेषी दलीलों आदि नहीं किया जाएगा।
दूसरे विषय पर पंचाट वही कारण दोहराया जो वह अतीत में कई अन्य फैसलों में दे चुका है। उसने उस तरीक को समझाया जिसके आधार पर यह निर्णय लिया जाता है कि प्रवर्तन प्रक्रिया में होने वाली देरी जुर्माना लगाने या न लगाने का आधार बन सकती है या नहीं। पंचाट के शब्दों में कहें तो, इतना ही नहीं बाजार उल्लंघन के मामलों में नियामक को यथाशीघ्र उपचारात्मक कदम उठाना चाहिए। कम से कम नियामक को जानकारी मिलने के तुरंत बाद ऐसा करना चाहिए ताकि दोषियों को दंडित किया जा सके। ताकि उल्लंघन करने वाले को दंड मिल सके और बाजार प्रतिभागियों में भी कड़ा संदेश जाए।’ इस मामले में आरोप था कि खुलासा करने में एक कारोबारी दिन की देरी की गई लेकिन नियामक ने कारण बताओ नोटिस जारी करने में 2,955 दिन की और प्रथम सूचना रिपोर्ट में 2,130 दिन की देरी की। पंचाट ने कहा कि इतने लंबे अंतराल की अनदेखी नहीं की जा सकती।
सेबी की दलील थी कि देरी की वजह के बारे में उसके समक्ष सुनवाई नहीं हुई थी इसलिए उसे अपीलीय स्तर पर नहीं उठाया जा सका। लेकिन इसे खारिज कर दिया गया। पंचाट ने अपने निर्णय में कहा कि कई बार अनुरोध ऐसे शब्दों मेंं किया जाता है कि शायद उसे कानूनी तरीके से स्पष्ट नहीं किया जा सके। ऐसे मामलों में यह अदालत का काम है कि प्रश्न के निर्धारण के क्रम में उस अनुरोध की महत्ता निर्धारित करे।
पंचाट ने कहा कि अगर उक्त विषय पर बिना उसी भाषा में स्पष्ट किए बहस की जा चुकी है तो यह अपील की वैध वजह होगी। यानी यदि कोई मसलना कानूनी सवाल है और वह समस्या की जड़ तक जाता है तो उसे किसी भी चरण में उठाया जा सकता है। ऐसा कहते हुए पंचाट ने जुर्माना लगाने की जगह चेतावनी देने का निर्णय लिया।