देश में सूक्ष्म वित्त का वाणिज्यिक मॉडल बांग्लादेश ग्रामीण बैंक से प्रेरित है और इसे ‘संयुक्त जवाबदेही समूह’ मॉडल कहा जाता है। यह मॉडल महिलाओं पर केंद्रित है जिन्हें समूहों में संगठित किया जाता है ताकि वे बिना किसी जमानत (गिरवी) के ऋण प्राप्त कर सकें और साप्ताहिक या मासिक बैठक में व्यापारिक लेन-देन कर सकें। संचालन के विवरण में बदलाव हुए हैं, लेकिन तीन मुख्य तत्व अब तक बरकरार हैं। यानी लेन-देन की नियमितता, महिलाओं पर ध्यान केंद्रित करना, और असुरक्षित ऋण।
यह मॉडल आपूर्ति प्रेरित था और यह सफल रहा तथा इसका तेजी से विस्तार हुआ। समूह बैठकों ने लेनदेन को एकत्रित किया और असुरक्षित ऋण को परस्पर गारंटी प्रदान की। ऋण की राशि और पुनर्भुगतान की किस्तें सभी उधारकर्ताओं के लिए मानक थीं जिन्हें ‘लीजिये या छोड़ दीजिये’ के आधार पर दिया जाता था। 30-40 महिलाओं के साथ लेनदेन समूह बैठक में 30 मिनट में ही पूरे किए जा सकते थे। ब्याज दरें औसतन सालाना 24 फीसदी से अधिक थीं। परिचालन की लागत नियंत्रण में थी और वृद्धि नए भौगोलिक क्षेत्रों में नए परिवारों की तलाश से आई।
उच्च ब्याज दरों वाला सूक्ष्म वित्त मॉडल कभी भी गरीबी उन्मूलन का मॉडल नहीं था। ये ब्याज दरें कार्यशील पूंजी या ऐसे व्यवसायों के लिए उपयुक्त हैं जिन्हें मामूली निवेश और नियमित नकदी प्रवाह की आवश्यकता होती है। जैसे ही किसी व्यवसाय को बड़े निवेश पूंजी और लंबे पुनर्भुगतान समय की आवश्यकता होती है चक्रवृद्धि प्रभाव ब्याज दरों को बोझिल बना देता है। उदाहरण के लिए यह एक दुधारू पशु को खरीदने के लिए उपयुक्त है लेकिन भूमि, गौशाला और अतिरिक्त श्रम में निवेश के साथ एक छोटा डेरी फार्म स्थापित करने के लिए उपयुक्त नहीं है।
सूक्ष्म वित्त ने गरीब परिवारों में छिपी हुई क्षमता को राह दी, विशेष रूप से जगह और श्रम की अतिरिक्त क्षमता को। पिछले तीन दशकों में इसने इस कार्य का बखूबी किया है। लेकिन परिदृश्य बदल गया है और यह मॉडल अब आक्रामक वृद्धि के लिए काम नहीं कर रहा है।
यह ध्यान देने योग्य है कि सूक्ष्म वित्त में सभी संकट भौगोलिक रहे हैं। जब भी कोई क्षेत्र संतृप्त हुआ यानी ऋण के लाभार्थी और तलाशने की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई तब संकट उत्पन्न हुआ। प्रत्येक संकट के साथ तीन जाने-पहचाने आरोप भी आए। अत्यधिक ब्याज दरें, जबरन वसूली, और बहु-ऋण यानी एक ही लाभार्थी को कई बार ऋण। जब कई ऋणदाता ग्राहकों को हासिल करने की कोशिश करते हैं, लेकिन शर्तों पर प्रतिस्पर्धी नहीं होते तो मांग पक्ष पर दबाव बन जाता है।
बीते सालों में नोटबंदी और महामारी ने मॉडल के मूल संचालन नियमों को तोड़ दिया। नोटबंदी ने समूह दायित्व में विश्वास को तोड़ा क्योंकि आवश्यक सेवाओं के व्यवसाय वाले कुछ परिवार (दूध आपूर्ति और खाने-पीने की दुकानें) दूसरों (ब्यूटी पार्लर आदि) की तुलना में संकट से तेजी से उबरे। सूक्ष्म वित्त संस्थानों ने बिना समूह गारंटी पर जोर दिए जो भी उपलब्ध था उसे वसूल लिया और इससे समूह गारंटी और डिफॉल्ट के प्रति शून्य सहिष्णुता का माहौल नहीं रहा। महामारी ने समूह बैठकों की पवित्रता को भंग किया।
इन संस्थानों ने अपनी पेशकशों में बदलाव किए। समूह गारंटी छोड़ दी और शिक्षा ऋण पेश किए तथा संग्रह में डिजिटल हो गए। यह सब किया गया लेकिन महिलाओं और समूह बैठकों से परे मॉडल की मौलिक पुनर्कल्पना किए बिना। हर संकट में वे नियामक और स्व-नियामक संगठन से सुरक्षा उपायों और क्रेडिट ब्यूरो से बेहतर डेटा की अपेक्षा करते हैं। दूसरी ओर ग्राहक रचनात्मक रहे हैं वे अधिक ऋण पाने के लिए कई पहचान बनाने जैसे कदम उठाते हैं।। शुरू में ये संस्थान ग्राहकों से आगे थे लेकिन अब ग्राहक आगे निकल गए हैं।
नीतिगत प्रतिक्रिया सामूहिक सोच की शिकार रही है। इन हितधारक परामर्शों ने मौजूदा मॉडल को ही मजबूत किया। रिजर्व बैंक द्वारा घरेलू आय का उपयोग सूक्ष्म वित्त को परिभाषित करने और पुनर्भुगतान स्तर तय करने के लिए करना समस्याग्रस्त है क्योंकि जब आय अनौपचारिक स्रोतों से और अस्थिर होती है तो घरेलू आय निर्धारित करना असंभव है और पुनर्भुगतान दायित्व की बाहरी सीमा 50 फीसदी तक तय करना बहुत उदार है।
एक स्वागत योग्य कदम में रिजर्व बैंक ने सूक्ष्म वित्त संस्थानों की परिभाषा बदल दी कि केवल 60 फीसदी ऋण उपरोक्त परिभाषा के अंतर्गत होंगे। शेष 40 फीसदी विविधीकृत किए जा सकते हैं। यह परिभाषा इन संस्थानों की बैलेंस शीट को विविधतापूर्ण बनाने में मदद करती है। हालांकि, सूक्ष्म वित्त संस्थानों का परिचालन मॉडल अपरिवर्तित रहता है, इसलिए वे शेष 40 फीसदी ऋण भी उन्हीं उधारकर्ताओं को और उन्हीं भौगोलिक क्षेत्रों में दे देते हैं जहां उधारकर्ता आय परीक्षण में विफल होते हैं।
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा संशोधित ऋण-गारंटी योजना की घोषणा एक काल्पनिक समस्या का समाधान करती है। तीन दशकों के ट्रैक रिकॉर्ड वाले और सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध कंपनियों के साथ संचालित इस क्षेत्र में ऋण देने के लिए वित्त प्राप्त करना समस्या नहीं होना चाहिए। यदि यह समस्या है तो यह संकेत है कि मांग प्रणाली में दिक्कत है।
सूक्ष्म वित्त संस्थानों की बैलेंस शीट के विविधीकरण के जरिये सूक्ष्म वित्त से ऊपर और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों से नीचे वाले खंड को संबोधित करना चाहिए। यह खंड वित्तीय रूप से साक्षर है लेकिन सार्थक वित्त प्राप्त करने में असमर्थ है। ये सूक्ष्म वित्त उधारकर्ताओं का छोटा उपसमूह है जो बड़े उद्यम की ओर बढ़ रहे हैं और जिन्हें पूंजी निवेश, नकदी प्रवाह का आकलन तथा लंबी अवधि की आवश्यकता होती है। इन्हें कम ब्याज दरों पर वित्त की आवश्यकता होगी, बिना इस शर्त के कि उधारकर्ता समूह बैठकों में शामिल हों। यही ‘मेसो-फाइनेंस’ है और नीति तथा व्यापारिक संरचना को इस खंड की पुनर्कल्पना करनी चाहिए न कि मौजूदा सूक्ष्म वित्त मॉडल को ही बार-बार दोहराना। जहां तक सूक्ष्म वित्त व्यवसाय का सवाल है, स्थिति स्पष्ट है।
यह मॉडल काम करता है लेकिन केवल मध्यम वृद्धि दर पर। वर्तमान मुद्रास्फीति दर और आसन्न आर्थिक संकट के साथ, इसी तरह की समस्याएं फिर से सामने आएंगी। हमारा अनुभव दिखाता है कि गरीब और कमजोर वर्ग तथा अनौपचारिक क्षेत्र सबसे पहले प्रभावित होते हैं और उन्हें गिना भी नहीं जाता।
उनकी पुनर्प्राप्ति धीमी होना तय है। अगला नवाचार बचत की पुनर्कल्पना पर होना चाहिए ताकि बाहरी सहारे के बजाय घरेलू आंतरिक बफर बनाए जा सकें। यह डेटा-आधारित, आपूर्ति-प्रेरित ऋण मॉडलों के लिए भी चेतावनी है। फिनटेक कंपनियों में अगले संकट की आशंका पर भी नजर रखिए। ये कंपनियां भी आपूर्ति-पक्ष की कारोबारी हैं जो ग्राहकों से प्रत्यक्ष संपर्क या संबंध बनाए बिना केवल डेटा के आधार पर ऋण देती हैं।
(लेखक लोक नीति केंद्र, भारतीय प्रबंध संस्थान बेंगलूर के प्रोफेसर हैं)