केंद्र सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की तरफ से कोरोनावायरस के प्रसार के बारे में पूर्वानुमान मॉडल बनाने के लिए जून में गठित वैज्ञानिकों की एक समिति ने कहा है कि भारत में इस वायरस से जनित कोविड-19 महामारी सितंबर में ही अपने चरम पर पहुंच चुकी है। उसने कहा है कि अगर एहतियाती कदम बरकरार रखे जाएं तो अगले साल फरवरी तक महामारी पर काफी हद तक काबू पा लिया जाएगा। वायरस के प्रसार के अपने शीर्ष पर पहुंच जाने की धारणा को सरकारी आंकड़े भी पुष्ट करते नजर आ रहे हैं। प्रतिदिन सामने आने वाले नए संक्रमितों एवं ठीक होने वाले लोगों की संख्या से भी यह बात काफी हद तक सही नजर आ रही है। विशेषज्ञ समिति के मॉडल पर आधारित विश्लेषण से पता चलता है कि मार्च में लगे सख्त लॉकडाउन ने भी वायरस के फैलाव पर काबू पाने में मदद की थी और शहरों से गांवों की तरफ बड़े पैमाने पर हुए प्रवास का वायरस के प्रसार पर कोई प्रतिकूल असर नहीं देखा गया। असल में, मामला यह है कि आर्थिक गतिविधियां बहाल होने के बाद ग्रामीण इलाकों में कोरोनावायरस संक्रमण के मामले बढऩे लगे।
हालांकि इस समिति की नजर में अगले कुछ हफ्ते महामारी पर काबू पाने के लिहाज से काफी अहम हैं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्ष वद्र्धन ने भी कहा है कि भारत को केरल राज्य के उदाहरण से सबक लेना चाहिए। केरल ने कुछ महीने पहले ही वायरस प्रसार पर काफी हद तक काबू पा लिया था लेकिन ओणम त्योहार के लिए लोगों के सार्वजनिक रूप से इक_ा होने के बाद मामले फिर से सामने आने लगे हैं। हर्ष वद्र्धन ने त्योहार के मौके पर लोगों को इक_ा होने देने को केरल सरकार की ‘लापरवाही’ बताया है। सुनने में यह थोड़ा कड़वा लग सकता है लेकिन नतीजे को देखते हुए यह सही भी है। दूसरे राज्यों की सरकारों को भी त्योहार मनाने की अनुमति को लेकर जन-दबाव का सामना करना पड़ा है। गुजरात सरकार ने नवरात्रि समारोह के दौरान गरबा कार्यक्रमों के आयोजन पर रोक लगाई हुई है लेकिन सामुदायिक प्रार्थना एवं अन्य आयोजनों की अनुमति होगी। उत्तर प्रदेश में पहले की तरह रामलीलाओं का मंचन होता रहेगा लेकिन केंद्र सरकार के ‘अनलॉक’ दिशानिर्देशों के अनुरूप आयोजन-स्थल पर केवल 100 दर्शकों की भीड़ ही इक_ा हो सकती है।
पश्चिम बंगाल में भी त्योहारी मौसम में कोविड मामलों के प्रसार पर रोक के लिए कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि पूरे राज्य में स्थापित दुर्गा पूजा पंडालों के भीतर किसी भी आगंतुक को जाने की इजाजत नहीं होगी। दरअसल राज्य सरकारें त्योहारों के मौसम में भीड़ पर काबू पाने के लिए सख्ती बरतने की स्थिति में पैदा होने वाले सामाजिक दुष्प्रभावों को लेकर आशंकित रहती हैं। लेकिन यह समझना भी महत्त्वपूर्ण है कि वायरस संक्रमण के मामले बढऩे के दुष्परिणाम कहीं अधिक बुरे होंगे। आधिकारिक सीरो-सर्वेक्षणों के मुताबिक, देश की आबादी का सात फीसदी से भी कम हिस्सा अब तक इस वायरस की चपेट में आया है। इसका मतलब है कि अगर जरूरी एहतियाती कदम नहीं उठाए गए तो कोविड के मामले बढऩे की पूरी गुंजाइश है। एक बार संक्रमण पर काबू पा लेने के बाद सुस्ती बरतने से मामले फिर से बढऩे के अनुभव से ढिलाई के खतरे उजागर होते हैं। केरल ही नहीं, दुनिया के सबसे धनी एवं संगठित समाजों में शामिल बेल्जियम एवं नीदरलैंड्स में भी इस वायरस के संक्रमण का नया दौर देखने को मिला है। अगर भारत एक बार वायरस संक्रमण के शीर्ष पर पहुंच चुका है तो उसे वक्र के चपटे पथ को ही बनाए रखना होगा। न तो अर्थव्यवस्था और न ही स्वास्थ्य प्रणाली संक्रमण के एक और दौर का सामना कर पाएगी। इस लिहाज से अगले कुछ हफ्ते सरकारी प्रशासनिक एजेंसियों एवं आम जनता दोनों के लिए एक बड़ा परीक्षण साबित होंगे।