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नया सिक्योरिटीज कोड अपने वैधानिक उद्देश्य से भटका, निवेशक असुरक्षित हुए

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विधिक उद्देश्य की कमी और खराब शिकायत निवारण ढांचा निवेशकों के भरोसे को कमजोर कर सकते हैं। इस बारे में विस्तार से बता रहे हैं एमएस साहू और सुमित अग्रवाल

Last Updated- April 09, 2026 | 9:28 PM IST
New Securities Code
इलेस्ट्रेशन- बिनय सिन्हा

भारत के प्रतिभूति बाजार अब खुदरा युग में हैं। पहली बार निवेश करने वाले लाखों निवेशक डिजिटल प्लेटफॉर्म्स, म्युचुअल फंड्स और सेवानिवृत्ति संबंधी योजनाओं के जरिये निवेश करते हैं। उनके लिए नियामक ढांचे पर विश्वास कोई अमूर्त अवधारणा नहीं है बल्कि यह वह शर्त है जो भागीदारी को संभव बनाती है। इसलिए, प्रतिभूति बाजार संहिता विधेयक, 2025 को निवेशक संरक्षण के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए।

यह संहिता तीन प्रतिभूति कानूनों को एकल, आधुनिक अधिनियम में समेकित करने का एक महत्त्वाकांक्षी प्रयास है। कई पुराने अधिनियमों को मिलाकर यह विखंडन को कम करने, ओवरलैप को समाप्त करने और नियामक प्रक्रियाओं को सरल बनाने का प्रयास करता है। ये सराहनीय विधायी नीति लक्ष्य हैं। लेकिन ये कानून के वास्तविक उद्देश्यों का स्थान नहीं ले सकते।

जिन अधिनियमों को समाहित किया जा रहा है, उनमें से एक है भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) अधिनियम, 1992, जिसने भारत का पहला आधुनिक नियामक स्थापित किया। इस अधिनियम की प्रस्तावना में इसका उद्देश्य स्पष्ट किया गया था- प्रतिभूतियों में निवेशकों के हितों की रक्षा करना। यह अभिव्यक्ति जानबूझकर की गई थी। इसने यह स्वीकार किया कि निवेशकों का विश्वास, विशेषकर खुदरा निवेशकों का, एक विश्वसनीय प्रतिभूति बाजार के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

हालांकि संहिता सेबी के अधिकार क्षेत्र में निवेशक संरक्षण को बनाए रखती है, लेकिन इसमें इसे अधिनियम के प्रेरक उद्देश्य के रूप में व्यक्त नहीं किया गया है। यह केवल मसौदा शैली का मामला नहीं है। बल्कि यह विधायी जोर में बदलाव है। सार्वजनिक कानून में, विधायी उद्देश्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है। यह व्याख्या का मार्गदर्शन करता है, नियामक विवेक को दिशा देता है, संस्थागत प्राथमिकताओं को आकार देता है और कानून तथा नियामक दोनों का उनके अपेक्षित उद्देश्यों के संदर्भ में सार्थक मूल्यांकन संभव बनाता है। इसकी अनुपस्थिति लोकतांत्रिक जवाबदेही को कठिन बना देती है।

निवेशक संरक्षण को लंबे समय से कानून और वित्तीय शोध दोनों में प्रतिभूति विनियमन का परिभाषित उद्देश्य माना गया है। प्रतिभूति कानून न केवल निवेशकों को धोखाधड़ी और हेरफेर से बचाने के लिए बनाए जाते हैं, बल्कि कभी-कभी उन्हें उनकी अपनी सूचना संबंधी और व्यवहारगत सीमाओं से भी बचाने के लिए भी। इस ढांचे के भीतर, नियामक निवेशकों के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है। समय के साथ, अधिनियम ने सेबी की संस्थागत पहचान को निवेशकों के स्तंभ के रूप में आकार दिया, जिसे इसके टैगलाइन में अभिव्यक्त किया गया: ‘हर निवेशक की ताकत’।

इस संदर्भ में देखें तो संहिता का दसवां अध्याय जो निवेशक शिकायत निवारण ढांचे से संबंधित है, वह कुछ खास बातें सामने लाता है। संहिता में प्रावधान है कि नियामक ‘निवेशक चार्टर’ बना सकता है, ‘शिकायत निवारण तंत्र’ प्रदान कर सकता है, ‘सेवा प्रदाताओं को समान तंत्र स्थापित करने की आवश्यकता’ पर काम कर सकता है, और अपने किसी अधिकारी को ‘लोकपाल’ नामित कर सकता है। डिफॉल्ट करने वाले पक्ष पर केवल यही बाध्यता है कि वह शिकायत प्राप्त होने की पुष्टि करे। समाधान का पूरा बोझ पीड़ित निवेशक पर ही रहता है, जिसे 180 दिनों के भीतर शिकायत को प्रक्रिया से गुजारना होता है।

यदि शिकायत का समाधान नहीं होता है, तो निवेशक लोकपाल के पास जा सकता है। इस चरण में शिकायत एक औपचारिक शिकायत में बदल जाती है। पक्षकार वादी और प्रतिवादी की भूमिका निभाते हैं, कार्यवाही विरोधी हो जाती है, और सेवा में कमी साबित करने का दायित्व निवेशक पर होता है।

यह डिजाइन इस बात की गलत समझ को दर्शाता है कि आधुनिक नियमन कैसे काम करता है। नियामक व्यवस्थाएं सूचना पर आधारित होती हैं, न कि निजी अभियोजन पर। वे पीड़ितों को शक्तिशाली मध्यस्थों के खिलाफ अकेला नहीं छोड़तीं। वर्तमान प्रतिभूति कानूनों के तहत, एक पीड़ित निवेशक शिकायत को नियामक के संज्ञान में लाता है, जिसके बाद नियामक सार्वजनिक हित में एक जांच प्रक्रिया शुरू करता है।

प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002 ने शुरुआत में शिकायत आधारित मॉडल को अपनाया था। परंतु आधुनिक नियमन के साथ उसका तालमेल नहीं होने के कारण संसद ने 2007 में उसमें संशोधन किया। ‘शिकायत’ को ‘सूचना’ से बदलना और कार्यवाही को विरोधी से जांचपरक में स्थानांतरित करना। इसने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग को असमान पक्षों के बीच एक पंच के बजाय सार्वजनिक हित में कार्य करने वाले नियामक में बदल दिया। यह तर्क संस्थागत था, न कि क्षेत्र-विशिष्ट।

संहिता के तहत निवेशक संरक्षण को एक विरोध मंच तक पहुंच के रूप में पुनर्परिभाषित किए जाने का जोखिम है। किसी निवेशक को शिकायत दर्ज करने के लिए लोकपाल उपलब्ध कराना, मूल रूप से, एक दीवानी अदालत स्थापित करने और उपभोक्ता को मुकदमा लड़ने के लिए कहने से बहुत अलग नहीं है। यह विवाद निवारण है, न कि नियामक संरक्षण।

वैश्विक स्तर पर, लोकपाल की वैधता उसकी स्वतंत्रता से आती है। वह है नागरिक और व्यवस्था के बीच एक संस्थागत दूरी। यह वैधता दूरी से प्रवाहित होती है। कार्यकारी नियंत्रण, नियामक पदानुक्रम और संगठनात्मक प्रोत्साहनों से दूरी। संहिता इस दूरी को समाप्त कर देता है क्योंकि यह सेबी को अपने ही किसी अधिकारी को लोकपाल नामित करने की आवश्यकता करता है। यह केवल एक आंतरिक अधिकारी को लोकपाल के रूप में पुन: प्रस्तुत करता है, जो उन्हीं सेवा नियमों, करियर प्रगति और संस्थागत संस्कृति के अधीन रहता है।

यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि निवेशक शिकायतें शायद ही कभी निजी विवाद होती हैं। वे गहरे बाजार विकारों की शुरुआती चेतावनी संकेत होती हैं। गलत बिक्री, प्रकटीकरण विफलताएं, नियामक विलंब, पर्यवेक्षी अंतराल, या मध्यस्थों द्वारा बार-बार अनुपालन न करने को बर्दाश्त करना।

लोकपाल की प्रक्रिया, अपने स्वरूप में, शिकायत-आधारित और पक्षकार-प्रेरित होती है। यद्यपि नियामक का कर्तव्य इससे व्यापक है। वह है व्यक्तिगत शिकायतों के पीछे छिपे कारणों की जांच करना और सार्वजनिक हित में कार्य करना। एक आंतरिक लोकपाल निवेशकों द्वारा अपेक्षित स्वतंत्रता के साथ इस कार्य को करने की संरचनात्मक दृष्टि से उपयुक्त स्थिति में नहीं होता। निवेशक शिकायतों के प्राथमिक उत्तर के रूप में लोकपाल को अपनाना बाजार पर्यवेक्षण को एक सक्रिय नियामक कार्य से बदलकर एक प्रतिक्रियात्मक, विवाद-निवारण अभ्यास में बदलने का जोखिम पैदा करता है।

डिजाइन की चूक केवल वैचारिक संगति तक सीमित नहीं हैं। लोकपाल के पास सेबी के विरुद्ध शिकायतों पर कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। वे अपने आदेशों को स्वयं लागू नहीं कर सकते, जिससे निवेशकों को प्रवर्तन के लिए पुनः सेबी के पास जाना होगा। साथ ही, लोकपाल के आदेश का पालन करना सेबी को समानांतर या बाद की कार्यवाही शुरू करने से नहीं रोकता, जिससे प्रतिवादियों को कई कार्यवाहियों, अपीलों और अनिश्चितता का सामना करना पड़ता है।

निवेशक शिकायत निवारण को, अपने स्वरूप और संचालन में, गैर-विरोधात्मक और नियामक-प्रेरित रहना चाहिए। इसका उद्देश्य कानूनी रूप से असमान पक्षों के बीच विवादों की मध्यस्थता करना नहीं है, बल्कि निवेशकों को राहत का एक सरल, विश्वसनीय और विश्वास-निर्माण मार्ग प्रदान करना है। यदि लोकपाल को बनाए रखना ही है, तो यह संस्था नियामक से स्पष्ट रूप से स्वतंत्र होनी चाहिए और वास्तव में गैर-विरोधात्मक प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।

संहिता के पास सुधार का अवसर है। वह निवेशक संरक्षण को एक स्पष्ट विधायी रूप दे सकती है और लोकपाल को वास्तविक स्वतंत्र संस्था बना सकती है जो किसी भी प्रतिभूति बाजार के लिए सबसे मूल्यवान संपत्ति होगी।


(लेखक विधि व्यवसाय में हैं और बाजार नियामक सेबी में काम कर चुके हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - April 9, 2026 | 9:22 PM IST

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