जब किसी अर्थव्यवस्था को युद्ध या महामारी जैसा कोई झटका लगता है तो मोटे तौर पर यह दो तरीकों से संभल सकती है – या तो कीमतों के जरिये या राज्य द्वारा लगाए गए प्रशासनिक नियंत्रणों से। बाजार अर्थव्यवस्थाएं मुख्य रूप से कीमतों पर निर्भर करती हैं। केंद्र से नियोजित व्यवस्थाएं अफसरशाही द्वारा आवंटन पर निर्भर करता है। यह अंतर मायने रखता है क्योंकि कीमतें देखकर लाखों परिवार और कंपनियां अपने लिए काफी कुछ खुद ही तय कर लेती हैं, जबकि नियंत्रण की व्यवस्था में सरकार तय करती है कि किसे क्या मिलना है और कितने दाम पर मिलना है। दुनिया भर के ऊर्जा बाजारों में इस समय मची उठापटक बता रही है कि यह अंतर मायने क्यों रखता है।
मान लीजिए कि किसी अर्थव्यवस्था में आम तौर पर 100 यूनिट ईंधन की खपत होती है, लेकिन वैश्विक संकट के कारण केवल 80 यूनिट ईंधन ही मिल रहा है। चूंकि आपूर्ति तुरंत नहीं बढ़ सकती, इसलिए मांग को उसी हिसाब से घटना पड़ेगा। इसके केवल दो तरीके हैं: या तो राज्य राशनिंग और नियंत्रण के जरिये मांग घटाए या कीमत बढ़ जाएं और लोग खुद ही तब तक खपत कम रखें, जब तक मांग के बराबर आपूर्ति न होने लगे। दूसरा तरीका अक्सर ज्यादा कारगर और कम दिक्कत भरा होता है। मगर क्यों?
सबसे पहले, दाम दो अहम काम करते हैं: वे जानकारी देते हैं और प्रोत्साहन का ढांचा भी तय करते हैं। बाजार कई तरह से बड़े ओपिनियन पोल की तरह है। फर्क सिर्फ इतना है कि लोग अपनी राय पैसे के जरिये रखते हैं। कीमतें लाखों उपभोक्ताओं, कारोबारों, व्यापारियों और निवेशकों के फैसलों को एक संकेत में बदल देती हैं, जिससे पता चलता है कि चीजों की कमी है या अधिकता है।
जब ईंधन महंगा होता है तो लोग वाहन कम चलाने लगते हैं, बिना जरूरत सफर करना टाल देते हैं या सार्वजनिक परिवहन इस्तेमाल करने लगते हैं। कारोबार भी ऊर्जा का गैर-जरूरी खर्च बंद कर देते हैं या विकल्प तलाशते हैं। उत्पादकों को इसके विपरीत संकेत मिलता है: कीमत ज्यादा होने पर वे आपूर्ति बढ़ाते हैं, माल को कमी वाली जगह ले जाते हैं या विकल्प तलाशते हैं।
विकल्प यह है कि फैसला राज्य करे मगर कई सवाल फिर भी उठते हैं। यदि रसोई गैस की किल्लत हो जाए तो प्राथमिकता किसे दें? घरों को या रेस्तरां को? छोटे ढाबों को प्राथमिकता दें या लक्जरी होटलों को? खाद पर सब्सिडी सभी किसानों को मिले या मुख्यत: छोटे किसानों को?
इन सवालों के जवाब आसान नहीं हैं क्योंकि लाखों परिवारों और कारोबारों की पसंद को कोई भी सरकार पूरी तरह नहीं समझ सकती। कीमतें इस समस्या को ज्यादा कारगर ढंग से हल कर देती हैं क्योंकि लोग कीमतें इस समस्या को बेहतर ढंग से हल करती हैं क्योंकि हालात बदलने पर लोग अपने तौर-तरीके खुद ही बदल लेते हैं। इससे आर्थिक स्वतंत्रता बनी रहती है और यह भी पक्का हो जाता है कि क्या खपाना है, क्या बचाना है या क्या जरूरी है, यह फैसला सीमित जानकारी वाले किसी सरकारी प्राधिकरण के बजाय वे लोग करें, जिन पर सीधा असर पड़ रहा है।
दूसरा, राज्य के दखल से अक्सर अनचाहे परिणाम सामने आते हैं। कृषि उत्पादों के निर्यात पर प्रतिबंध से फसल की कीमतें गिर सकती हैं और किसान उन्हें उगाने से पीछे हट सकते हैं। सोने के आयात पर रोक से इसकी कमी हो सकती है और कालाबाजारी तथा तस्करी शुरू हो सकती है। कीमतों को जानबूझकर नीचे रखना शुरू में ठीक लग सकता है मगर उसका खमियाजा अंत में दूसरी जगह नजर आता है और अक्सर करदाताओं पर बोझ बढ़ जाता है।
पश्चिम एशिया युद्ध शुरू होने के बाद से भारत की सरकारी तेल कंपनियों को लगभग 1 लाख करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है क्योंकि ईंधन की कीमतें बढ़ाई नहीं गईं। अब उपभोक्ताओं को तय करना होगा: या तो कीमत बढ़ने पर आज ईंधन का इस्तेमाल कम कर दें या आगे जाकर 1 लाख करोड़ रुपये से अधिक कर चुकाएं। अधिकतर देशों ने युद्ध के बाद ईंधन महंगा होने दिया है, मलेशिया, पाकिस्तान और फिलिपींस में तो कीमतें 50 फीसदी बढ़ गई हैं। इधर भारत में सोमवार की मूल्यवृद्धि के बाद भी कीमतें बमुश्किल 8 फीसदी बढ़ी हैं।
अंत में राज्य के बार-बार हस्तक्षेप से अनिश्चितता बढ़ती है क्योंकि लोग बाजार के संकेतों पर प्रतिक्रिया करना बंद कर देते हैं और यह भांपने में जुट जाते हैं कि सरकार क्या कदम उठाएगी। कई कारोबार निवेश से जुड़े फैसले टाल देते हैं क्योंकि उन्हें पता ही नहीं होता कि कौन से नए नियंत्रण या प्रतिबंध लग सकते हैं। इससे व्यापक नीति व्यवस्था में भरोसा घटता है।
परिपक्व बाजार वाली अर्थव्यवस्थाओं ने समय के साथ कीमतों पर भरोसा करना सीख लिया है। यूक्रेन पर रूस के हमले के बाद यूरोप ने ऊर्जा कीमतें बढ़ने दीं, जिसके बाद लोगों को इसकी बचत की जरूरत महसूस हुई और मांग घट गई। दुनिया भर से वहां एलएनजी मंगाई गई, जिससे और किल्लत होने से बच गई। अमेरिका ने भी पश्चिम एशिया संकट के दौरान ऐसा ही किया है। वह अपनी जरूरत भर का तेल खुद ही तैयार कर लेता है फिर भी वहां गैसोलीन करीब 45 फीसदी महंगा हो गया है और बाजार को तेल की आपूर्ति ज्यादा कारगर तरीके से करने में मदद मिली है। खुद को ढालने का यह तरीका पारदर्शी होता है और बदला भी जा सकता है। जैसे ही आपूर्ति बढ़ती है, कीमतें अपने आप घट जाती हैं। इससे सामान्य आर्थिक गतिविधियां चलने लगती हैं और राज्य को पेचीदा नियंत्रण तथा प्रतिबंध हटाने की कवायद नहीं करनी पड़ती।
भारत ने भी पिछले कुछ दशकों में धीरे-धीरे यह सीखा है। पहले लोग उम्मीद करते थे कि पेट्रोल, स्टील, हवाई टिकट आदि की कीमतें राज्य ही तय करे। आज अधिकतर लोग मानते हैं कि कीमतें बाजार की स्थिति के हिसाब से बदलती हैं। फिर भी युद्ध जैसे बड़े झटके लगने पर हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। नीति निर्माताओं को अब यह समझने की जरूरत है कि कीमतें तय करने का काम राज्य के मुकाबले बाजार बेहतर कर सकता है। पेट्रोल और डीजल आदि में जहां कीमतें नियंत्रित रहती हैं, वहां आगे चलकर होने वाली मूल्यवृद्धि का ऐलान पहले ही कर देना ज्यादा कारगर हो सकता है ताकि परिवार और कंपनियां उसके हिसाब से खुद को ढाल सकें।
कीमतें समस्या नहीं हैं, बल्कि ये तो झटके सहने में अर्थव्यवस्था की मदद करती हैं। नीति निर्माताओं का काम इन संकेतों को दबाना नहीं है बल्कि कीमतों को अपना काम करते रहने देना और कमजोर लोगों को लक्षित तरीकों से बचाना है।
(लेखिका मुंबई स्थित आईजीआईडीआर में अर्थशास्त्र की एसोसिएट प्रोफेसर हैं। ये उनके निजी विचार हैं)