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जीवन संभाव्यता की पहेली

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 6:17 PM IST

एक औसत भारतीय की आयु अब बढ़कर 69.7 वर्ष हो गई है। यानी 10 वर्ष पहले की तुलना में उसकी जीवन संभाव्यता में दो वर्ष का सुधार हुआ है। यह खबर वैश्विक स्तर पर उभरती शक्ति की हमारी स्वनिर्मित छवि पर आघात के समान है। जाहिर है एक बड़े कालखंड के आधार पर देखा जाए तो भारत की जीवन संभाव्यता में हुए सुधार को उल्लेखनीय माना जा सकता है क्योंकि आजादी के समय एक औसत भारतीय महज 32 वर्ष तक जीवित रहता था। 75 वर्ष पहले आजाद हुए मुल्क के लिए 70 वर्ष की औसत आयु ठीकठाक है जबकि वैश्विक औसत आयु 72.6 वर्ष की है। 50 वर्ष पहले आजाद हुए नजदीकी पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से तुलना करें तो उसकी औसत आयु 72.1 वर्ष तथा नेपाल की 70 वर्ष है। जीवन संभाव्यता के मामले में हम चीन से भी काफी पीछे हैं। उसकी औसत आयु 76.91 वर्ष है। हालांकि दिल्ली, केरल, जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, पंजाब और महाराष्ट्र में जीवन संभाव्यता वैश्विक औसत से अधिक है लेकिन इनमें से कोई देश चीन से आगे नहीं निकल पाया है।
आर्थिक विकास के एक अहम जनांकीय संकेतक पर इस खराब प्रदर्शन के बीच एक तथ्य यह भी है कि भारतीय शिशुओं, खासकर कन्या शिशुओं में जन्म के समय और शैशवावस्था में बचने की संभावना कम है।

ताजा आंकड़े बताते हैं कि 45 वर्ष की अवधि में जन्म के समय जीवन संभाव्यता और एक या पांच वर्ष की आयु के बीच जीवन संभाव्यता में केवल 20 वर्ष का अंतर आया है। यह धीमी प्रगति भी उत्तर और पूर्वी भारत के निराशाजनक प्रदर्शन को ढक लेती है। उत्तर प्रदेश और छत्तीसगढ़ जीवन संभाव्यता के क्षेत्र में क्रमश: 65.6 वर्ष और 65.3 वर्ष के साथ सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले प्रदेश हैं। वर्ल्ड पॉपुलेशन रिव्यू की शिशु मृत्यु दर की ताजा रैंकिंग में भारत 195 देशों में 138वें स्थान पर है। यहां प्रत्येक 1000 जन्मे बच्चों में से 27.8 की मृत्यु हो जाती है। बांग्लादेश 135वें  तथा नेपाल 132वें स्थान पर है। जबकि चीन 50वें स्थान पर है।

जीवन संभाव्यता और शिशु मृत्यु दर के मामले में भारत के कमजोर प्रदर्शन की वजह है औसत भारतीय, खासकर महिलाओं की चिकित्सा ढांचे तक सहज पहुंच नहीं हो पाना। शहरी और ग्रामीण जीवन संभाव्यता में भी अंतर भी इस बात को उजागर करता है। दोनों के बीच 5 से 8 वर्ष का अंतर देखा जा सकता है।
ये हालात समझ से परे हैं क्योंकि सन 1975 से ही भारत सरकार एक व्यापक कार्यक्रम चला रही है जो छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण पर केंद्रित है। इसके लिए आंगनवाड़ी केंद्रों का एक व्यापक नेटवर्क तैयार किया गया और लगभग हर राज्य ने अपने स्कूलों में मध्याह्न भोजन योजना शुरू की। एकीकृत बाल विकास सेवाओं की शुरुआत की गई जिन्हें दुनिया में अपनी तरह का सबसे बड़ा कार्यक्रम कहा जाता है और इसके तहत भी बच्चों के स्वास्थ्य और पोषण में सुधार आने की बात कही गई। परंतु वर्ष बीतने के साथ ही इनके तथा संबद्ध योजनाओं के लिए बजट आवंटन तथा क्रियान्वयन पर ध्यान दिया जाना कम कर दिया गया। कुछ शोधकर्ताओं का अनुमान है कि आईसीडीएस तथा मध्याह्न भोजन के बजट में 2015-16 के बाद से लगातार कटौती की गई है। अन्य शोधकर्ताओं का कहना है कि इन योजनाओं का ज्यादातर लाभ गरीबों और वंचित वर्ग के बच्चों के बजाय मध्यम और निम्न मध्य वर्ग के बच्चों को मिला है। ताजा आंकड़े बताते हैं कि इस क्षेत्र में सुधार लंबे समय से लंबित है।

First Published : June 14, 2022 | 12:09 AM IST