प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
यह पूरी तरह अक्षमता और संवेदनहीनता का मामला है। यह इतनी बुरी बात है कि अगर पुराने सरकारी इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया का दौर होता तो कुछ लोगों की कुर्सियां चली जातीं।
आर्थिक सुधारों के बाद भारत में बने शायद सबसे बड़े वैश्विक ब्रांड यानी इंडिगो से जुड़े हालिया घटनाक्रम को देखें तो तीन तात्कालिक प्रतिक्रियाएं हो सकती हैं और इन तीनों में थोड़ी हताशा शामिल है।
पहला, इंडिगो के संस्थापक और प्रबंधन जरूर थोड़े कम विचारशील या दंभी होंगे (जैसा कि कुछ लोगों ने कहा) तभी उन्होंने इतनी तेजी से उसका पतन होने दिया। दूसरा, अगर कोई व्यक्ति भारत सरकार और वह भी नरेंद्र मोदी की सरकार से सीधा टकराव ले रहा है, वह भी तब जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन देश में हों, तो जरूर वह व्यक्ति कोई नशा करता होगा।
याद रहे कि वर्ष2020 में डॉनल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के समय शाहीन बाग प्रदर्शन भड़काने के आरोपी आज भी बिना सुनवाई के जेल में बंद हैं। तीसरी बात, जो लोग दशकों से कहते रहे हैं कि सरकार को उनके जीवन में दखलअंदाजी बंद करनी चाहिए, खासकर उन क्षेत्रों में जहां निजी क्षेत्र का प्रदर्शन बेहतर है, वो अब उतनी ही तेजी से इसके उलट बात कर रहे हैं। एक दंभी-ग्राहक विरोधी निजी क्षेत्र की दिग्गज कंपनी द्वारा फैलाई गड़बड़ी से निपटने के लिए माई-बाप सरकार का ही सहारा है। यह एक राष्ट्रीय आपदा है।
आप आसानी से यह मान सकते हैं कि इन तमाम वर्षों में जब निजी विमानन क्षेत्र का विकास हुआ, जिसने जेट और किंगफिशर के पतन को झेला और एयर इंडिया का निजीकरण किया गया, तब पुरानी व्यवस्था के कई लोग सत्ता खोने से खिन्न थे। अब न तो विमान खरीदने थे, न भर्तियों की उदारता थी, न अनुबंध और यहां तक कि उपभोग की वस्तुओं की खरीदी की सुविधा।
भारत सरकार या जिसे मैं हताशा में सरकार-ए-हिंद कहता हूं, उसे कम से कम एक क्षेत्र में पूरी तरह अप्रासांगिक बना दिया गया था। यहां निजी क्षेत्र ने एक बड़ी वैश्विक कामयाबी हासिल की। यहां तक कि दूरसंचार के क्षेत्र में भी कम से कम पुरानी ताकत का कुछ हिस्सा सरकार के पास बना रहा। उदाहरण के लिए स्पेक्ट्रम की बिक्री, एक सक्रिय सरकारी कंपनी यानी बीएसएनएल और वोडाफोन आइडिया में 49 फीसदी हिस्सेदारी। नागर विमानन में हेलीकॉप्टर चार्टर के अलावा कुछ भी सरकारी नहीं दिखता। अधिकांश बड़े हवाई अड्डे निजी हैं और कई अन्य जल्दी ही निजी क्षेत्र के हवाले हो जाएंगे।
अब सरकार वापस दिख रही है लेकिन कैसे? मंत्री महोदय एक टीवी चैनल से दूसरे टीवी चैनल पर नजर आ रहे हैं और इंडिगो की गड़बड़ी को ठीक करने का वादा कर रहे हैं। वे परोक्ष रूप से धमकी दे रहे हैं कि दो लाख करोड़ रुपये या करीब 24 अरब डॉलर मूल्य (हालांकि संकट के बाद इसमें 15 फीसदी गिरावट आई है) की एक सूचीबद्ध कंपनी के प्रबंधन का अधिग्रहण कर लिया जाएगा। ऐसा केवल भारत में ही हो सकता है: एक निजी कंपनी गड़बड़ी करती है, लेकिन चीजें स्पष्ट करने और सवालों के जवाब देने का काम उसका मुख्य कार्यकारी अधिकारी नहीं बल्कि एक मंत्री करता है। मंत्री ने चेतावनी दी कि सीईओ को निकाल दिया जाएगा।
उन्हें विमानन क्षेत्र के नियामक के जरिये तलब किया और बहुप्रचारित ढंग से अपमानित किया। पहले उन्होंने घबराहट में पायलटों की सेवा अवधि के घंटों से संबंधित नियमों को वापस ले लिया, जिन्हें उनका अपना मंत्रालय और नियामक लगभग दो वर्षों तक लागू करने में विफल रहे, और फिर फरवरी 2026 तक उड़ानों में कटौती का आदेश दिया। अब उनका मानना है कि दो कंपनियों का दबदबा ठीक नहीं है, इसलिए उनकी प्राथमिकता पांच एयरलाइंस रखने की है, जिनमें प्रत्येक के पास सौ विमान हों।
भारतीय विमानन क्षेत्र बड़ा नजर आता है और इसमें विकास की संभावनाएं भी हैं। इंडिगो की ही बात करें तो उसने 1400 विमान खरीदने के ऑर्डर दिए हैं। एयर इंडिया ने 570 विमानों और अकासा एयर और स्पाइसजेट ने 200 से अधिक विमानों के ऑर्डर दिए हैं। जब देश में 500 विमानों वाली पांच विमानन कंपनियों की गुंजाइश है तो हम केवल 100-100 विमानों वाली पांच कंपनियों की बात क्यों करें?
हमें इस क्षेत्र में कामयाबी इसलिए मिली क्योंकि व्यवस्था ने एक बार ही सही लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस बात को स्वीकार किया कि कारोबार में सरकार की कोई भूमिका नहीं है। परंतु ठीक उस वक्त जब भारतीय विमानन उद्योग वैश्विक पैमाने पर बढ़ रहा है, प्रभारी मंत्री उसे टुकड़ों में बांटने की बात कर रहे हैं। ऐसा तब जब उनके प्रधानमंत्री और पार्टी प्रमुख चंद्रबाबू नायडू, दोनों बड़े पैमाने पर काम करने में विश्वास रखते हैं।
अब हम देश के सबसे कामयाब क्षेत्रों में से एक में सरकार की वापसी पर लौटते हैं। इंडिगो के मुख्यालय में निर्णय लेने वाले पदों पर सरकारी अधिकारियों की तैनाती का आखिर क्या मतलब हो सकता है?
यह जवाबदेही से मुक्त सूक्ष्म प्रबंधन है। ये अधिकारी नागर विमानन महानिदेशालय नामक उसी नियामक से आते हैं जिसने विमान चालाकों को आराम देने के लिए ऐसे नियम बनाए जिनसे तो यूरोप के देश भी शायद परहेज करें। इतना ही नहीं यह सब करने में उन लोगों की सहमति भी नहीं ली गई जिनका कुछ दांव पर लगा है। निजी विमानन की कामयाबी ने न्यूनतम सरकार की जमीन तैयार की। नागर विमानन सबसे विस्तार योग्य मंत्रालय बना। इंडिगो को भी कई मामलों में दोष दिया जा सकता है लेकिन इसका सबसे बड़ा अपराध है जनता की भारी नाराजगी के बीच सरकार को उद्धारक की भूमिका में आने देना।
यह सरकार ही है जिसने एयर इंडिया और इंडियन एयरलाइंस को एकाधिकार के साथ चलाया और वे बंद होने के कगार पर आ गईं। सरकार जो कई विमान खरीद घोटालों के लिए चर्चा में रही।
इंडिगो ने हालात बिगड़ने दिए और फिर बंकर में छिप गई मानो सबकुछ खुद ठीक हो जाएगा। आखिर वे किस दुनिया में जी रहे हैं? सोशल मीडिया के दौर में जहां हर यात्री के पास अपनी बात कहने का अवसर है, बदकिस्मती को दोष नहीं दिया जा सकता है। यह अक्षमता और असंवेदनशीलता है। यह इतना बुरा है कि अगर सरकारी विमान सेवा का दौर होता तो कुछ लोगों को इसकी कीमत चुकानी पड़ती। विमानन मंत्री तो कब का अपना पद गंवा चुके होते।
इंडिगो नेतृत्व को तो संकट का पहला संकेत मिलते ही पश्चात्ताप और सांत्वना के बोल बोलने थे। लेकिन अगर ग्राहक के पास कोई विकल्प ही नहीं है तो परेशान क्यों होना? मंत्रालय के बारे में वे मानकर चल रहे थे कि उसका इंतजाम कर लिया है। वे भूल गए थे कि सरकार के साथ निपटना कैसीनो में खेलने जैसा है। आप चाहे जितने होशियार हों, आपके पास चाहे जितना पैसा हो, जीत हमेशा उसकी होती है।
पुनश्च: सार्वजनिक उपक्रमों वाले दौर में विमान चालकों की एक हड़ताल के कारण 1993 में माधवराव सिंधिया को नागर विमानन मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा था। हवाई संचालन जारी रखने के लिए उन्होंने विमान कर्मचारियों सहित जहाज लीज पर लिए। इसी दौरान एक रूसी मध्य एशियाई विमान दिल्ली हवाई अड्डे पर घने कोहरे के बीच किसी दूसरे विमान पर लैंड कर गया। सिंधिया ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया। दो दिन बाद मैं सीताराम केसरी के घर गया। उन्होंने कहा था कि सिंधिया अभी युवा, तेजतर्रार,लोकप्रिय और महत्त्वाकांक्षी हैं और वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं लेकिन बन कभी नहीं पाएंगे।
मैंने इसकी वजह पूछी तो उन्होंने कहा कि सिंधिया ने एक हादसे की नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दे दिया। इसके बाद उन्हें अपने इस कदम को भुनाने के लिए संवाददाता सम्मेलन करने चाहिए थे, साक्षात्कार देने चाहिए थे लेकिन वे चुपचाप पहाड़ों पर छुट्टी मनाने चले गए। यह बात अलग है कि केसरी की कल्पना की परीक्षा का अवसर कभी नहीं आया क्योंकि दुर्भाग्यवश 30 सितंबर 2001 को एक विमान हादसे में सिंधिया का निधन हो गया।