वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही के लिए सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी के आंकड़ों पर सहमति नहीं बन पा रही है। इन आंकड़ों में 7.8 फीसदी की वृद्धि दर्शाई गई है। इन आंकड़ों को लेकर विवाद पैदा हो गया है और यह दावा भी किया जा रहा है कि जीडीपी वृद्धि वास्तव में 3 फीसदी से भी कम रही।
यह एक नई श्रृंखला है। इसका आधार वर्ष 2011-12 के बजाय 2022-23 कर दिया गया है। पद्धतियों में और भी बदलाव किए गए हैं। वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही के प्रारंभिक अनुमान अगस्त 2025 में पुरानी श्रृंखला के अधीन जारी किए गए थे और उनमें जीडीपी वृद्धि 7.8 फीसदी रहने का अनुमान जताया गया था। नई श्रृंखला के तहत उसे संशोधित करके 6.9 फीसदी कर दिया गया है। यही इकलौता संशोधन नहीं था।
वित्त वर्ष 12 के बजाय वित्त वर्ष 23 को आधार बनाए जाने के बाद वित्त वर्ष 24 की जीडीपी वृद्धि को संशोधित किया गया और उसे 9.2 फीसदी से कम करके 7.2 फीसदी कर दिया गया। वित्त वर्ष 24 की तुलना में वित्त वर्ष 25 की वृद्धि के अनुमान को 6.5 फीसदी से बढ़ाकर 7.1 फीसदी कर दिया गया। इसी तरह, वित्त वर्ष 26 की नॉमिनल वृद्धि दर में 3 फीसदी से अधिक कमी की गई।
वित्त वर्ष 26 की तुलना में वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में नॉमिनल वृद्धि 10.3 फीसदी रही। जीडीपी डिफ्लेटर लागू करने के बाद वास्तविक जीडीपी वृद्धि 7.8 फीसदी आंकी गई। जीडीपी डिफ्लेटर एक ऐसा सूचकांक है जो बताता है कि किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के सामान्य मूल्य स्तर में कितना बदलाव हुआ है। इसलिए डिफ्लेटर लगभग 2.3 फीसदी रहा। यह दर कम प्रतीत होती है। अप्रैल-जून 2026 के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) लगभग 4 फीसदी या उससे अधिक रहा जबकि थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) 9 फीसदी से ऊपर रहा।
दोनों सूचकांकों की वस्तु सूचियां और भार अलग-अलग हैं। लेकिन डब्ल्यूपीआई में परिलक्षित कच्चे माल की लागत तैयार वस्तुओं की लागत की तुलना में अधिक तेजी से बढ़ी। प्रमुख पद्धतिगत बदलाव को देखते हुए इससे एक विसंगति पैदा होती है। भारत अब दोहरी-डिफ्लेशन पद्धति का इस्तेमाल कर रहा है जिसमें अंतिम उत्पाद मसलन एक मोबाइल फोन को डिफ्लेट किया जाता है और उसके घटकों यानी इलेक्ट्रॉनिक्स, कांच आदि को भी अलग-अलग डिफ्लेट किया जाता है। पहले केवल अंतिम उत्पाद को ही डिफ्लेट किया जाता था। यहां डिफ्लेट से तात्पर्य कीमतों में हुई वृद्धि के असर को हटाना है।
जब कच्चे माल की लागत किसी अंतिम वस्तु की लागत से अधिक तेजी से बढ़ती है तो दोहरी डिफ्लेशन पद्धति एक विरोधाभासी स्थिति पैदा कर सकती है। विनिर्माण क्षेत्र का डिफ्लेटर ऋणात्मक हो सकता है भले ही हर चीज महंगी हो रही हो! संयोग से यह बात कॉरपोरेट प्रबंधन की टिप्पणियों से भी मेल खाती है जिनमें वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही के दौरान मार्जिन पर दबाव का बार-बार उल्लेख किया गया है। वास्तव में कंपनियां कच्चे माल की बढ़ती लागत को पूरी तरह ग्राहकों पर नहीं डाल पाई हैं।
वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र का सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) मौजूदा कीमतों पर 7.7 फीसदी और स्थिर कीमतों पर 9.2 फीसदी बढ़ा, जो देखने में अजीब लगता है। इसलिए विनिर्माण क्षेत्र का डिफ्लेटर लगभग 1.4 फीसदी ऋणात्मक रहा। इसने ईरान युद्ध के कारण जिंस कीमतों में आई तेज बढ़ोतरी के असर को छिपा दिया। अगर एकल-डिफ्लेशन पद्धति का इस्तेमाल किया जाता तो विनिर्माण क्षेत्र सिकुड़ रहा होता और बताई गई जीडीपी वृद्धि भी कम होती।
नई श्रृंखला, नई पद्धति और इन विरोधाभासों को देखते हुए ली कछ्यांग सूचकांक को लागू करना उपयोगी होगा। दिवंगत चीनी प्रधानमंत्री ली कछ्यांग आर्थिक गतिविधियों से मजबूत संबंध रखने वाले तीन संकेतकों पर नजर रखते थे और जीडीपी के आंकड़ों को प्राथमिकता नहीं देते थे। इनमें से एक है बिजली की खपत। वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही में बिजली की खपत सालाना 1.5 फीसदी घट गई थी। यह असाधारण गिरावट थी जिसका स्तर कोविड लॉकडाउन के बाद से देखने को नहीं मिला था। बिजली की कम मांग का कारण बहुत अधिक बारिश को बताया गया जिससे कूलिंग यानी एयर कंडीशनिंग की जरूरत कम हो गई थी।
वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में बिजली की खपत सालाना 8.4 फीसदी बढ़ी हालांकि यह वृद्धि पिछले साल के बेहद निचले आधार पर हुई। वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में बारिश सामान्य से कम रही। इससे कूलिंग की जरूरत बढ़ी। हालांकि बिजली की खपत में कूलिंग की मांग का कितना योगदान रहा इस पर आसानी से उपलब्ध कोई अध्ययन नहीं है। परंतु अगर हम कूलिंग की बढ़ी हुई मांग के लिए उदारतापूर्वक कुछ हिस्सा मान भी लें और पिछले साल के निचले आधार को भी ध्यान में रखें तो बिजली की खपत के आंकड़े आर्थिक वृद्धि की कहानी का समर्थन करते हैं।
ली कछ्यांग का दूसरा संकेतक माल ढुलाई की मात्रा है। वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही में रेलवे की माल ढुलाई की मात्रा सालाना 2 फीसदी बढ़ी जबकि वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में यह वृद्धि 1.46 फीसदी रही। दोनों आंकड़े तेजी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था के लिहाज से अपेक्षा से कम हैं। लेकिन वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में बंदरगाहों पर माल यातायात लगभग 9 फीसदी की दर से बढ़ा जबकि वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही में आधार भी ऊंचा था। क्या रेलवे ने माल ढुलाई में अपनी हिस्सेदारी खो दी है?
तीसरा संकेतक है बैंक ऋण। वित्त वर्ष 26 की पहली तिमाही में बैंक ऋण सालाना 9.5 फीसदी बढ़ा था। वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में बैंक ऋण 20 फीसदी बढ़ा। हालांकि, रिपोर्टिंग मानकों में बदलाव हुए थे। समान आधार पर तुलना करें तो वित्त वर्ष 27 की पहली तिमाही में बैंक ऋण का विस्तार करीब 18-19 फीसदी रहा। यह फिर भी महत्त्वपूर्ण वृद्धि है और आर्थिक वृद्धि की कहानी का समर्थन करती है।
यह बात सहज रूप से समझ में नहीं आती कि जब महंगाई ऊंची हो तो डिफ्लेटर ऋणात्मक हो। लेकिन इसका उलटा भी उतना ही असामान्य होगा। जब भी कच्चे तेल, गैस और अन्य कमोडिटी की कीमतें गिरेंगी तो मूल्य सूचकांक नीचे आएंगे, लेकिन अगर अंतिम वस्तुओं में महंगाई इनपुट की तुलना में अधिक रही तो डिफ्लेटर में तेज उछाल आ सकती है।
इस पद्धति को सहज रूप से समझने में अभी कुछ समय लगेगा। इसलिए ली कछ्यांग के दृष्टिकोण पर कुछ अधिक गंभीरता से ध्यान देना और शायद तेज गति से बदलने वाले आर्थिक संकेतकों की सूची को और विस्तृत करने की कोशिश करना उपयोगी हो सकता है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)