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Editorial: बदलते वैश्विक व्यापार में भारत को अपनाना होगा व्यावहारिक और सक्रिय रुख

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अमेरिका की वर्तमान नीतिगत सोच और पिछले दशक में डब्ल्यूटीओ के प्रति उसके रवैये को देखते हुए, यह देखना बाकी है कि बहुपक्षीय मंच व्यापार एजेंडे को किस हद तक आगे बढ़ा सकता है

Last Updated- March 18, 2026 | 10:00 PM IST
WTO Reforms

विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) का 14वां मंत्री स्तरीय सम्मेलन 26 से 29 मार्च तक कैमरून के याउंडे शहर में होने जा रहा है। यह सम्मेलन अत्यंत अहम समय में हो रहा है। उम्मीद की जा रही है कि इसमें दुनिया भर के व्यापार मंत्री बहुपक्षीय व्यापार व्यवस्था के सामने उत्पन्न चुनौतियों और अवसरों के बारे में चर्चा करेंगे और भविष्य का एजेंडा निर्धारित करेंगे।

गत वर्ष दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को पूरी तरह उलट-पुलट दिया। उसने स्थापित व्यापार सिद्धांतों की बिल्कुल परवाह नहीं की। अमेरिका की वर्तमान नीतिगत सोच और पिछले दशक में डब्ल्यूटीओ के प्रति उसके रवैये को देखते हुए, यह देखना बाकी है कि बहुपक्षीय मंच व्यापार एजेंडे को किस हद तक आगे बढ़ा सकता है। भू-राजनीति भी व्यापार के लिए एक बड़ा जोखिम बन गई है।

जैसा कि इस समाचार पत्र में हाल ही में प्रकाशित किया गया, इस सम्मेलन में भारत का रुख यह होना चाहिए कि डब्ल्यूटीओ के बुनियादी रुख में कोई बदलाव नहीं आने देना है। इनमें कई मुद्दे शामिल हैं। उदाहरण के लिए मंच पर सर्वसम्मति-आधारित निर्णय तैयार करना और व्यापारिक साझेदारों द्वारा गैर-भेदभावपूर्ण शुल्क का उपचार।

इसके अलावा, नए मुद्दे जोड़ने से पहले लंबित मामलों को हल किया जाना चाहिए। यह स्थिति समझ में आती है। हालांकि, यह भी ध्यान देने योग्य है कि वर्षों से डब्ल्यूटीओ में बहुत कम प्रगति हुई है। हाल के दशकों में वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (जीवीसी) के उभरने के साथ वैश्विक व्यापार की प्रकृति बदल गई है।

सर्वसम्मति-आधारित निर्णय निर्माण प्रक्रिया इस बदलाव के साथ तालमेल नहीं बैठा पाई है। परिणामस्वरूप, विभिन्न देशों ने मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) की ओर रुख किया है, जो नियमों के मुताबिक हैं ताकि गहन एकीकरण हो सके और जीवीसी-आधारित व्यापार को सुगम बनाया जा सके।

एफटीए की शर्तें केवल भाग लेने वाले देशों तक सीमित रहती हैं, जबकि बहुपक्षीय वार्ताओं के परिणाम सर्वसम्मति से डब्ल्यूटीओ की नियम-पुस्तिका में शामिल किए जा सकते हैं। ऐसा ही एक मुद्दा है विकास के लिए निवेश सुविधा समझौते का एकीकरण। इसका उद्देश्य निवेश को सुगम बनाना है, जिसमें पारदर्शिता, प्रशासनिक प्रक्रियाओं और नियमों का सरलीकरण, तथा नियामक क्षमता में सुधार जैसे मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है।

इस समझौते को डब्ल्यूटीओ के 166 में से 128 सदस्य देशों का समर्थन प्राप्त है। इनमें विकसित और अल्पविकसित देश शामिल हैं। भारत ने इसका विरोध किया है, लेकिन यह समझना कठिन है कि आ​खिर क्यों। भारत को वैसे भी निवेश आकर्षित करने के लिए इन सभी कदमों की आवश्यकता है, जो उच्च दरों पर वृद्धि के लिए बिल्कुल आवश्यक है।

व्यापक आर्थिक प्रबंधन के दृष्टिकोण से भी, भारत को उच्च वृद्धि प्राप्त करने के लिए घरेलू बचत के साथ विदेशी पूंजी की आवश्यकता है। विदेशी पूंजी तकनीक भी लाती है और देश को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं (जीवीसी) में एकीकृत करने में सक्षम बना सकती है।

कैमरून सम्मेलन के लिए एक अन्य अहम तथ्य यह है कि कई ऐसे मुद्दे, जिनमें ई-कॉमर्स सीमा शुल्क स्थगन भी शामिल है, चर्चा के लिए संभावित हैं। भारत को बहुपक्षीय मंचों पर और अपनी व्यापार एवं निवेश नीतियों में व्यापक रूप से एक व्यावहारिक रुख अपनाना चाहिए। पिछले वर्ष के दौरान भारत ने व्यापार के प्रति उल्लेखनीय खुलापन दिखाया है और ब्रिटेन तथा यूरोपीय संघ के साथ समझौते किए हैं।

यद्यपि अमेरिका के साथ समझौते का भविष्य अनिश्चित है, लेकिन प्रारंभिक ढांचा एक व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता था। भारत को इस गति को आगे बढ़ाना चाहिए और स्वयं को वैश्विक व्यापार के लिए खोलना चाहिए। ऐसी खबरें हैं कि भारत व्यापक एवं प्रगतिशील प्रशांत पार साझेदारी समझौते में शामिल होने पर विचार कर रहा है।

भारत को इस संभावना पर सक्रिय रूप से आगे बढ़ना चाहिए। निर्यात विकास का एक प्रमुख स्रोत हो सकता है, जैसा कि पिछले कुछ दशकों में कई देशों ने प्रदर्शित किया है। वैश्विक व्यापार की प्रकृति बदल चुकी है और भारत को शीघ्रता से इसके अनुकूल होना होगा। यह डब्ल्यूटीओ में सुधारों का एक प्रमुख वाहक भी बन सकता है।

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First Published - March 18, 2026 | 9:56 PM IST

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