वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 1 फरवरी को अपने बजट भाषण में ‘विकसित भारत के लिए बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ी एक उच्च स्तरीय समिति’ बनाने का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य बैंकिंग क्षेत्र की व्यापक समीक्षा करना और इसे भारत के अगले विकास चरण के अनुरूप बनाना है साथ ही वित्तीय स्थिरता, वित्तीय समावेशन और उपभोक्ता संरक्षण को भी सुनिश्चित करना है।
उन्होंने कहा कि इस पहल की पृष्ठभूमि में बैंकों की मजबूत बैलेंसशीट, ऐतिहासिक रूप से अधिक मुनाफा, बेहतर परिसंपत्ति गुणवत्ता और ग्रामीण भारत के 98 फीसदी से अधिक हिस्से तक बैंकिंग पहुंच शामिल है। सीतारमण ने कहा, ‘इस समय, हम इस क्षेत्र में सुधार-आधारित वृद्धि को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक उपायों का भविष्य के लिहाज से मूल्यांकन करने की अच्छी स्थिति में हैं।’
फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि इस समिति में कौन-कौन सदस्य होंगे या इसके कार्यक्षेत्र क्या होंगे। लेकिन अधिकांश लोगों को उम्मीद है कि यह 1991 की नरसिम्हन समिति जैसी भूमिका निभा सकती है जिसने आर्थिक उदारीकरण के दौर में भारत में बैंकिंग सुधारों की दिशा तय की थी। उस समिति ने कई महत्त्वपूर्ण सिफारिशें की थीं जैसे सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर दोहरी निगरानी (भारतीय रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के द्वारा) को खत्म करना, आरक्षित निधि की आवश्यकताओं को कम करना, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के बीच विलय और अधिग्रहण को बढ़ावा देना, ब्याज दरों को मुक्त करना और प्रतिस्पर्धा बढ़ाना।
उस समय बैंकिंग क्षेत्र की दक्षता बढ़ाने के लिए उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण जैसे तीन अहम मुद्दों पर ध्यान दिया गया था क्योंकि उस दौर में बैंकिंग क्षेत्र पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का प्रभुत्व था। अब ऐसे में यह समिति इन क्षेत्रों पर विचार कर सकती है।
सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का विलय: बैंकिंग क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के अगले चरण के विलय की चर्चा होती रही है। वर्ष 2017 से 2020 के बीच सरकार ने कई बड़े विलय किए थे। इस प्रक्रिया की शुरुआत भारतीय स्टेट बैंक में उसके पांच सहयोगी बैंकों और भारतीय महिला बैंक के विलय से हुई थी। इस प्रक्रिया के बाद सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या 27 से घटकर 12 रह गई। इन 12 बैंकों में पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण भारत में कुछ अपेक्षाकृत छोटे बैंक अब भी मौजूद हैं। अब सवाल यह है कि क्या इन्हें बड़े बैंकों में मिला दिया जाए या बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को आपस में मिलाकर और भी बड़े बैंक बनाए जाएं। लेकिन ऐसा करने से वास्तव में क्या लाभ होगा?
भारत के बैंकिंग उद्योग में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का अब भी व्यापक दबदबा है। फिलहाल निजी बैंकों में विदेशी स्वामित्व की सीमा 74 फीसदी और मतदान अधिकार 26 फीसदी तक सीमित है। हालांकि नियामक अब निजी बैंकों में विदेशी निवेशकों की भूमिका को लेकर अपने दृष्टिकोण में बदलाव दिखा रहा है। इसी तर्ज पर सरकारी बैंकों में भी विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है। इनमें सरकार की न्यूनतम हिस्सेदारी 51 फीसदी बनी रह सकती है लेकिन विदेशी हिस्सेदारी को बढ़ाकर 49 फीसदी तक किया जा सकता है जो अभी 20 फीसदी तक सीमित है।
1980 के दशक के अंत से अब तक सरकार ने सरकारी बैंकों में लगभग 4.5 लाख करोड़ रुपये की पूंजी डाली है। आज इन बैंकों की बैलेंसशीट मजबूत है और वे सरकार को अच्छा-खासा लाभांश भी दे रहे हैं। ऐसे में यह सही समय हो सकता है कि सरकारी बैंकों में विदेशी हिस्सेदारी बढ़ाने की अनुमति दी जाए। इससे उन्हें पूंजी के बलबूते अपने कारोबार का विस्तार करने में मदद मिलेगी और सरकार भी अपनी हिस्सेदारी के मूल्य का लाभ उठा सकेगी।
बैंकिंग क्षेत्र में कॉरपोरेट घराने: इस समय भारत के बैंकिंग तंत्र में 12 सरकारी बैंक के अलावा 21 निजी बैंक, 44 विदेशी बैंक, 11 लघु वित्त बैंक, 6 पेमेंट्स बैंक, 2 लोकल एरिया बैंक, 28 क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक और 34 राज्य सहकारी बैंक काम कर रहे हैं। वर्ष 2020 में आरबीआई के एक आंतरिक कार्य समूह ने निजी क्षेत्र के बैंकों की समीक्षा करते हुए बड़े कॉरपोरेट घरानों को बैंकिंग क्षेत्र में प्रवेश देने की सिफारिश की थी, हालांकि इसके लिए कुछ शर्तें भी रखी गईं थीं। लेकिन इस समिति के पांच में से चार सदस्यों ने इस सिफारिश का विरोध किया था।
दिलचस्प बात यह है कि आरबीआई के 2013 के बैंक लाइसेंसिंग नियमों में कॉरपोरेट घरानों के बैंकिंग क्षेत्र में प्रवेश का स्पष्ट विरोध नहीं था। उस समय लगभग दो दर्जन कॉरपोरेट समूहों ने बैंक खोलने के लाइसेंस के लिए आवेदन किया था। लेकिन आरबीआई को उनमें से कोई भी उपयुक्त नहीं लगा। वैश्विक स्तर पर भी इस मुद्दे पर कोई स्पष्ट सहमति नहीं है। वास्तव में भारत को अधिक बैंकों की जरूरत है और बड़े औद्योगिक घरानों के पास पर्याप्त पूंजी होती है जिससे वे इस क्षेत्र में निवेश कर सकते हैं।
डिजिटल बैंक: क्या अब समय आ गया है कि भारत में डिजिटल बैंक को अनुमति दी जाए? वैश्विक स्तर पर डिजिटल बैंकिंग अब केवल मोबाइल ऐप आधारित बैंकिंग तक सीमित नहीं है बल्कि यह पूर्ण वित्तीय तंत्र का रूप ले रही है। ऐसे बैंकों की संचालन लागत कम होती है और वे लेन-देन की लागत तथा समय को घटाकर उपभोक्ताओं की कई समस्याओं का समाधान करते हैं। साथ ही ग्राहकों को डिजिटल माध्यम से आसानी से जोड़ा जा सकता है।
डिजिटल बैंक पारंपरिक बैंकों की तुलना में लगभग एक-तिहाई लागत पर संचालित हो सकते हैं। वे शाखा नेटवर्क के बजाय डेटा-आधारित ऋण वितरण पर निर्भर हैं और ऐसे सुपर-ऐप मुहैया कराते हैं जिनमें बैंकिंग, भुगतान, निवेश और जीवनशैली से जुड़ी सेवाएं, एक ही मंच पर उपलब्ध होती हैं। आने वाले समय में बैंकिंग का अगला चरण आर्टिफिशल इंटेलिजेंस आधारित वित्तीय सेवाओं और रोजमर्रा के ऐप से जुड़े बैंकिंग मंच का होगा। ऐसे में यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत इस बदलाव को नजरअंदाज कर सकता है। वास्तविकता यह है कि अब शायद हमारे पास नियोबैंकों के लिए रास्ता खोलने के अलावा ज्यादा विकल्प नहीं बचता है।
प्राथमिकता क्षेत्र से जुड़े ऋण: बैंकिंग क्षेत्र की समीक्षा के दौरान समिति कई अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर भी विचार कर सकती है। उदाहरण के लिए, प्राथमिकता क्षेत्र ऋण के 40 फीसदी का लक्ष्य पिछले चार दशकों से लगभग नहीं बदला है। अब समय आ गया है कि ऐसे ऋणों से जुड़े उत्पादों, प्रक्रियाओं और प्रोत्साहन व्यवस्था (ग्राहकों और बैंकों दोनों के लिए) की गहराई से समीक्षा की जाए। इससे यह समझा जा सकेगा कि क्या मौजूदा व्यवस्था वास्तव में उन क्षेत्रों तक पूंजी पहुंचा रही है जिनके लिए इसे बनाया गया था, या इसमें सुधार की जरूरत है।
इसी तरह यह भी सवाल उठता है कि बैंकों पर आरक्षित निधियों का बोझ अधिक क्यों होना चाहिए। किसी बैंक के पास यदि 100 रुपये की जमा राशि आती है तब उसे लगभग 3 रुपये आरबीआई के पास नकद आरक्षी अनुपात के रूप में रखना पड़ता है, जिस पर कोई ब्याज नहीं मिलता। इन महत्त्वपूर्ण सवालों के जवाब तलाशने की जिम्मेदारी अब प्रस्तावित उच्च स्तरीय बैंकिंग समिति पर होगी।