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संतुलन साधना मुश्किल

Published by
बीएस संवाददाता
Last Updated- December 14, 2022 | 10:53 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) अर्थव्यवस्था की चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार कड़ी मेहनत कर रहा है। उपभोक्ता महंगाई कई महीनों से केंद्रीय बैंक के लक्षित दायरे से ऊपर बनी हुई है, इसलिए नवगठित मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने नीतिदर दरों को यथावत रखने का सही फैसला किया है। हालांकि शुक्रवार को मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक के बाद आरबीआई ने तरलता सुधारने और बाजार दरों को नीचे लाने के लिए विभिन्न उपायों की घोषणा की। एमपीसी ने मौजूदा महंगाई को अस्थायी तेजी माना और उसका नजरिया था कि इस समय वृद्धि को उबारना ज्यादा जरूरी है। इस नीतिगत फैसले के साथ आया बयान अगस्त की नीतिगत बैठक के बयान से बिल्कुल अलग था। यह संभव है कि उसके नजरिये में बदलाव आर्थिक हालात की समझ बेहतर होने से हुआ हो।

यह स्पष्ट है कि एमपीसी निकट भविष्य में नीतिगत दर में कटौती करने की स्थिति में नहीं होगी। महामारी फैलने के बाद केंद्रीय बैंक के पहले पूर्वानुमान में दर्शाया गया है कि महंगाई अगले वित्त वर्ष की पहली तिमाही में घटकर 4.3 फीसदी पर आ सकती है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में महंगाई 5.4-4.5 फीसदी के दायरे में रहने के आसार हैं।

केंद्रीय बैंक का अनुमान है कि अर्थव्यवस्था को लगातार खोलने से आपूर्ति में अवरोध कम होंगे। हालांकि इस अनुमान में जोखिम भी हो सकते हैं। यह संभव है कि देशव्यापी लॉकडाउन के दौरान बड़ी तादाद में असंगठित क्षेत्र की लघु इकाइयां कारोबार से बाहर हो गई हों और जल्द कारोबार में न लौट पाएं।

केंद्रीय बैंक का अनुमान है कि चालू वर्ष में अर्थव्यवस्था 9.5 फीसदी सिकुड़ेगी। हालांकि कुछ उच्च आवृत्ति संकेतक उत्साहजनक संकेत दिखा रहे हैं। लेकिन यह देखना महत्त्वपूर्ण होगा कि क्या यह सुधार बरकरार रहता है। इस संदर्भ में ऐसा लगता है कि आरबीआई आर्थिक गतिविधियों को सहारा देने के लिए हरसंभव कदम उठाने को तैयार है। उदाहरण के लिए, उसने आवास ऋणों के लिए जोखिम भार को तर्कसंगत बनाया है, जिससे ऋण की दरें कम होने की संभावना है। इसके अलावा आरबीआई ने जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल के लिए एक लाख करोड़ रुपये का लक्षित दीर्घकालिक रीपो परिचालन शुरू किया है, जिसकी अवधि तीन साल तक है। इससे कॉरपोरेट बॉन्ड बाजार में दरें कम करने में मदद मिलेगी। आरबीआई मौद्रिक नीति के रुख के समान आर्थिक प्रणाली में पर्याप्त तरलता बनाए रखेगा और इसने खुले बाजार परिचालन (ओएमओ) का आकार बढ़ाने का फैसला किया है।

इसके अलावा केंद्रीय बैंक ने पहली बार राज्य सरकारों के बॉन्डों में ओएमओ शुरू करने का फैसला किया है। इसका मकसद इस बाजार में तरलता बढ़ाना और चालू वर्ष में सरकारी बॉन्ड खरीदे जाने की क्षमता में सुधार करना है। हालांकि बॉन्ड बाजार ने इन फैसलों का स्वागत किया, लेकिन केंद्रीय बैंक मौजूदा परिस्थितियों में क्या हासिल कर सकता है, उसकी सीमाएं हैं। उदाहरण के लिए अब भी अंतिम कुल सरकारी उधारी में अहम बदलाव आ सकता है। राज्य सरकारों के बॉन्डों में दखल देने के आरबीआई के फैसले से इस खंड में तरलता सुधारने में मदद मिल सकती है, लेकिन कुल उधारी के स्तर पर बड़ा बदलाव नहीं होने के आसार हैं। ऐसे बॉन्डों को खरीदने से सिस्टम में तरलता बढ़ेगी, लेकिन केंद्र सरकार के बॉन्डों में दखल की गुंजाइश कम हो जाएगी। मुद्रा बाजार में आवश्यक दखल से भी तरलता बढ़ेगी। अर्थव्यवस्था में लगातार अत्यधिक तरलता से आरबीआई के महंगाई के अनुमान पर जोखिम पैदा होगा। केंद्रीय बैंक से वृद्धि, महंगाई, सरकारी उधारी और मुद्रा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में बहुत से उद्देश्य पूरे करने की उम्मीद की जा रही है, इसलिए उनमें संतुलन साधना बड़ा मुश्किल होगा।

First Published : October 11, 2020 | 11:11 PM IST