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GST में सुधारों का अगला दौर जरूरी, दरों से लेकर पेट्रोलियम तक में बदलाव की जरूरत

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जीएसटी की शेष कमियों को दूर करने पर चर्चा अब शुरू होनी चाहिए। इनमें कार्यान्वयन के समय अपनाई गई समझौता-जनित विशेषताएं भी शामिल हैं

Last Updated- August 31, 2026 | 9:56 PM IST
GST
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

एक ऐतिहासिक सुधार के रूप में प्रस्तुत माल एवं सेवा कर (जीएसटी) ने वास्तव में अर्थव्यवस्था को उल्लेखनीय लाभ पहुंचाया है। गत वर्ष सितंबर में उसकी दरों को युक्तिसंगत बनाने की प्रक्रिया ने इस कर की संरचना को और भी बेहतर बना दिया है। वर्ष 2017 में लागू होने के बाद से पिछले नौ वर्षों में यह कर देश के वित्तीय परिदृश्य में अच्छी तरह स्थापित हो चुका है।

इसके बावजूद यह उन अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है जिनके तहत माना जाता रहा था कि यह बहुत अधिक धन जुटाने में कामयाब होगा। इसे लागू करते समय समझौते के रूप में अपनाई गई कुछ खराब बातों को हटाना बेहद कठिन साबित हुआ है। साल 2047 तक विकसित देश का दर्जा हासिल करने का लक्ष्य रखने वाला भारत इन कमियों को अनदेखा नहीं कर सकता और उसे जीएसटी सुधारों को अधिक प्रतिस्पर्धी प्रणाली की ओर ले जाना चाहिए। इसलिए, अगली पीढ़ी के सुधारों पर चर्चा अब शुरू होनी चाहिए।

राजस्व सृजन के मामले में जीएसटी का प्रदर्शन प्रभावशाली नहीं रहा है, लेकिन इस सुधार से अप्रत्यक्ष लाभ उल्लेखनीय रहे हैं। पहला, इसने कई उपभोग करों को सफलतापूर्वक एकीकृत किया है और सरल बनाया है जिससे प्रशासन और अनुपालन लागत दोनों कम हुई हैं। दूसरा, इसने घरेलू व्यापार करों को सामंजस्यपूर्ण बनाने में सफलता पाई है। सुधार ने न केवल केंद्र और राज्यों के बीच अप्रत्यक्ष करों के एक दूसरे पर ओवरलैप यानी आच्छादन को कम किया है बल्कि इससे करों की कीमतें न्यूनतम स्तर तक ले जाने की होड़ और उत्पादक राज्यों से उपभोक्ता राज्यों की ओर करों का निर्यात भी खत्म हुआ है। 

 तीसरा, इसने घरेलू उपभोग कर की संरचना और प्रशासन को सामंजस्यपूर्ण बनाने में मदद की है जिससे पूरे देश में एक समान दर संरचना लागू हुई है। हालांकि प्रत्येक राज्य अलग-अलग कानून और नियम पारित करते रहे हैं फिर भी इन्हें काफी हद तक मानकीकृत किया गया है।

सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय के अनुसार जीएसटी लागू होने के बाद ट्रकों की लंबी दूरी की यात्रा का समय 20 फीसदी कम हो गया है। उतना ही महत्त्वपूर्ण है लागत बचत से होने वाला लाभ जो बेहतर आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन से आया है। यह शाखा कार्यालयों को समाप्त करने से संभव हुआ, जिन्हें पहले माल हस्तांतरण के माध्यम से केंद्रीय बिक्री कर से बचने के लिए स्थापित किया जाता था।

इन लाभों के बावजूद कर में अभी भी कई कमियां हैं जिन्हें जल्द से जल्द दूर करने की आवश्यकता है। इनमें राजस्व उत्पादकता को बेहतर बनाने और शेष विकृतियों को हटाने के उपाय शामिल हैं। गौर करने की बात है कि जब इसे लागू किया गया था तब कर की संरचना वास्तव में राजस्व निरपेक्ष नहीं थी। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) के अनुसार, 2017-18 के अगले महीनों में वास्तविक राजस्व संग्रह जीएसटी में समाहित करों से पिछले वर्ष में प्राप्त राजस्व से 10 फीसदी कम था। 

इसके बाद किए गए बदलावों ने कई वस्तुओं को कम कर दर श्रेणियों में डाल दिया जिससे राजस्व संग्रह और भी कमजोर हुआ। हालांकि उम्मीद थी कि बेहतर अनुपालन मध्यम अवधि में राजस्व बढ़ाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। कर की प्रभावी दर जिसे राजस्व संग्रह और निजी व सरकारी उपभोग के अनुपात के रूप में आंका जाता है, वह महामारी से पहले औसतन लगभग 8.5 फीसदी थी लेकिन 2020-21 में तेजी से घटकर 6.5 फीसदी हो गई। इसके बाद यह बढ़ी लेकिन लगभग स्थिर रही और 9.5 फीसदी से 10.3 फीसदी के संकीर्ण दायरे में उतार-चढ़ाव करती रही। इसके स्वत: लागू होने वाले स्वभाव के कारण अनुपालन में सुधार की जो आशा थी वह पूरी नहीं हुई। 

कर अनुपालन में सुधार न होने का एक बड़ा कारण इसका आंशिक कवरेज है। साल 2005 में इमरान और स्टिग्लिट्ज (जर्नल ऑफ पब्लिक इकनॉमिक्स, वॉल्यूम 89, नंबर 4, पृष्ठ 599-629) ने तर्क दिया था कि विकासशील देशों में मूल्य वर्धित कर (वैट) की शुरुआत राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है क्योंकि इससे अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का विस्तार होता है।

यह तब हो सकता है जब अनौपचारिक क्षेत्र में बने रहने से अपेक्षित लाभ औपचारिक क्षेत्र में शामिल होने से मिलने वाले लाभ से अधिक हों। औपचारिक क्षेत्र में शामिल होने के संभावित लाभ तब कम हो जाते हैं जब कर का कवरेज और उपलब्ध इनपुट टैक्स क्रेडिट आंशिक हो। भारत में छूटें बहुत व्यापक हैं। चार अंकों वाले एचएसएन वर्गीकरण के अंतर्गत 148 वस्तुएं जिनका उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में लगभग 50 प्रतिशत भार है, वे कर से मुक्त हैं।

इसके अलावा जिन करदाताओं का कारोबार 1.5 करोड़ रुपये से कम है, वे इनपुट टैक्स क्रेडिट का लाभ लिए बिना कारोबार पर 1 फीसदी की समग्र दर से कर चुका सकते हैं। पूरे देश की जानकारी की विभिन्न कारोबार सीमा के अनुसार करदाताओं की संख्या और उनके द्वारा चुकाए गए कर का विवरण सार्वजनिक क्षेत्र में उपलब्ध नहीं है लेकिन कर्नाटक में करदाताओं की संख्या का 93 फीसदी है, जबकि उनका हिस्सा कारोबार में केवल 6.5 फीसदी और कर में 12 फीसदी है। इसके अतिरिक्त पेट्रोलियम उत्पाद जो परिवहन में व्यापक रूप से उपयोग किए जाते हैं वे कर आधार से बाहर हैं। इन कारकों ने औपचारिक क्षेत्र में होने के लाभ को कम कर दिया है।

कर की सबसे बड़ी कमी जिसने आधार को कमजोर करने के साथ-साथ गंभीर विकृतियों को भी जन्म दिया है वह है पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी से बाहर रखना और राजस्व कारणों से उन पर अलग उत्पाद शुल्क लगाना। 2024-25 में पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क केंद्र स्तर पर घरेलू उपभोग करों का 22.6 फीसदी था जबकि इन वस्तुओं पर बिक्री कर राज्य स्तर पर घरेलू उपभोग कर का 33 फीसदी था। उच्च दरों पर लगाए गए कैस्केडिंग कर (उत्पादन और वितरण के हर स्तर पर बार-बार लगने वाले कर) परिवहन लागत को बढ़ा देते हैं। चूंकि ये उत्पादन और वितरण में सामान्य कच्चे माल हैं इसलिए प्रतिस्पर्धात्मकता पर इनके प्रतिकूल प्रभाव महत्त्वपूर्ण हैं।

सुधार के रास्ते स्पष्ट हैं। दो मुख्य दरों को हासिल करने के लिए जीएसटी को युक्तिसंगत बनाना एक महत्त्वपूर्ण सुधार है। हालांकि,  मुख्य दरों (5 फीसदी और 18 फीसदी) के बीच 13 अंकों का अंतर गलत वर्गीकरण के लिए बड़ा प्रोत्साहन छोड़ देता है। आदर्श रूप से देखें तो 10  फीसदी की एकल दर की ओर बढ़ना वांछनीय है जो वर्तमान प्रभावी दर के करीब है। यदि राजनीतिक कारणों से अभी ऐसा नहीं किया जा सकता, तो मेरिट दर को 8 फीसदी तक बढ़ाया जा सकता है और सामान्य दर को घटाकर 15 फीसदी तक किया जा सकता है।

कर का दूसरा बड़ा सुधार यह होना चाहिए कि सीमा को लगभग 50 लाख रुपये पर रखा जाए। इससे छोटे कारोबारियों या कंपनियों के बजाय बड़े कारोबारियों अथवा कंपनियों पर ध्यान केंद्रित करना संभव होगा। जिनका कारोबार 50 लाख रुपये से कम है, वे करदाताओं की संख्या का 93 फीसदी हैं, लेकिन कुल टर्नओवर में उनकी हिस्सेदारी 7 फीसदी से भी कम है। 

समान रूप से महत्त्वपूर्ण सुधार यह है कि पेट्रोलियम उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जाए ताकि इनपुट टैक्स क्रेडिट उपलब्ध हो सके। इससे परिवहन क्षेत्र में कर आधार का विस्तार होगा और अर्थव्यवस्था अधिक प्रतिस्पर्धी बनेगी। 

(लेखक तक्षशिला संस्थान में सलाहकार और एनआईपीएफपी के पूर्व निदेशक हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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First Published - August 31, 2026 | 9:56 PM IST

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