यदि हम देश को राष्ट्रीय शंकालु राज्य कहें तो क्या माना जाएगा कि हमारा दिमाग खराब है? यह जुमला आपको गूगल पर नहीं मिलेगा। यह पाकिस्तान और चीन जैसा नहीं है जिन्हें हम ‘राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य’ कहते हैं। ये वे देश हैं जहां सेना और पार्टी क्रमश: राज्य की क्षेत्रीय और नागरिकों की वैचारिक सीमाओं की निगरानी करते हैं।
मैं प्राय: ऐसे लेख लिखता हूं जिनमें बताया जाता है कि भारत या पास पड़ोस के देश किस दिशा में बढ़ रहे हैं। एक दफा ऐसे ही आलेख के लिए मैं पाकिस्तान के सफर पर था। ऐसे तमाम प्रमाण मिल रहे थे जिनसे यह साबित हो रहा था कि पाकिस्तान उपमहाद्वीप में राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य के रूप में ढल रहा है। परंतु मुझे निर्णायक प्रमाण चाहिए थे। मुझे उर्दू न जानने का भी नुकसान हो रहा था लेकिन तलाशने पर चीजें मिल ही जाती हैं। मुझे जो चाहिए था वह तब मिला जब मैं वाघा सीमा पर पासपोर्ट पर वापसी का ठप्पा लगवा रहा था। दरअसल आव्रजन खिड़की के ऊपर लगे सूचना पट पर लिखा था: हम सबका सम्मान करते हैं, हम सब पर संदेह करते हैं। मैंने वहां तैनात एक पुलिसकर्मी से बातचीत करनी शुरू की जबकि दूसरे पुलिसकर्मी ने मेरे आईपैड में तस्वीरों की जांच करनी शुरू कर दी कि कहीं उसमें कुछ आपत्तिजनक तो नहीं है। मुझे विनम्रतापूर्वक बताया गया कि उन्हें अपनी और मेरी सुरक्षा के लिए अतिरिक्त शंकालु होना पड़ता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य सबको शक की नजर से देखते तो बात समझ में आती है लेकिन लोकतांत्रिक संस्थानों द्वारा संचालित संवैधानिक गणराज्य में ऐसा हो तो? राष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित पिछले आम चुनाव में नरेंद्र मोदी के भारी बहुमत से सत्ता में लौटने के बाद गत जुलाई में मैंने एक आलेख लिखा था कि वह सुरक्षा के मुद्दे पर केंद्रित भले रहें लेकिन वह भारत को राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य में नहीं बदलने देंगे। हम जानते हैं कि इसका पाकिस्तान पर क्या असर हुआ? यहां दो सवाल पैदा होते हैं:क्या बाहरी खतरे की आशंका से जूझ रहा देश राष्ट्रीय सुरक्षा राज्य में नहीं बदल जाता? दूसरा क्या भारत कुछ ऐसा बनने की राह पर है जो हम अब तक नहीं जानते? यानी राष्ट्रीय शंकालु राज्य? आइए हममें से अधिकांश लोगों को संदेह का लाभ देते हुए कुछ तथ्यों पर बात करते हैं। यह कहना गलत होगा कि मोदी सरकार आलोचना और आलोचकों से नफरत करने के मामले में विशिष्ट है। दशकों से ऐसी सरकार तलाशना मुश्किल रहा है जिसे आलोचना पसंद हो। जिसने आलोचना पर तीखी प्रतिक्रिया न दी हो। आलोचकों के बारे में हमेशा कहा जाता है कि वे किसी खास उद्देश्य से ऐसा कर रहे हैं। इंदिरा गांधी उन्हें सीआईए के एजेंट बताती थीं, राजीव गांधी के लिए वह विदेशी हाथ था, वाम धड़े के लिए वह कॉर्पोरेट के दलाल थे तो आम और अन्ना आंदोलन ने आलोचकों को भ्रष्ट बताया। आलोचकों को सार्वजनिक रूप से नीचा दिखाने की प्रवृत्ति ने सोशल मीडिया के आगमन के बाद गति पकड़ी। संयोग है कि अन्ना आंदोलन के साथ ही शुरू हुआ।
यह कहना भी सही नहीं होगा कि केवल इस सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) और गैर कानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) अथवा विदेशी दान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) जैसे कड़े कानूनों का इस्तेमाल किया है। ये कानून कांग्रेस सरकारों के दौर में बने और मजबूत हुए। इनका उपयोग-दुरपयोग सभी ने किया।
यही बात निगरानी पर भी लागू होती है। मोदी सरकार निगरानी के क्षेत्र में जिस मशीनरी और तकनीक का इस्तेमाल कर रही है वह संप्रग की देन है। अमेरिका में 9/11 और भारत में 26/11 के हमलों के बाद विभिन्न एजेंसियों को ये अधिकार सौंपे गए। इनमें एनटीआरओ शामिल है। उसी दौर में गृह और रक्षा मंत्रालय से इतर खुफिया ब्यूरो और रॉ को फोन टैपिंग का अधिकार दिया गया और वित्त मंत्रालय इसका प्रमुख केंद्र बना। राडिया टेप याद कीजिए।
आखिर सामान्य तौर पर कितने लोग आपसे लैंड लाइन या मोबाइल पर संपर्क करते हैं? कुछ समय पहले तक व्हाट्सऐप चलन में था लेकिन इजरायली निगरानी एजेंसी के खुलासों के बाद भारत में इसे तथा इसकी मूल कंपनी फेसबुक को लेकर संदेह उभरे। यह अजीब होगा कि ढेर सारे राजनेता, सत्ताधारी दल के नेता और नौकरशाह टेलीग्राम (जो शायद अब विश्वसनीयता गंवा रहा), सिग्रल या ऐसे अन्य ऐप का इस्तेमाल करेंगे। कुल मिलाकर इससे संदेह का माहौल बनता है और इसके लिए शेनहुआ डेटा चोरों को आरोपित नहीं किया जा सकता।
सार्वजनिक बहस में रहने वाले हम जैसे लो इंदिरा गांधी के दौर से ही आलोचना के प्रति सरकार की असहिष्णुता झेलते आए हैं। जनवरी 1984 में जब मैंने तमिल टाइगर्स के प्रशिक्षण शिविरों की खबर लिखी तब उनकी सरकार बेहद नाराज हुई और इंडिया टुडे (जहां मैं उस समय काम करता था) को देश विरोधी पत्रिका करार दिया। एक वर्ष पहले जब मैंने इस पत्रिका में असम के नेल्ली नरसंहार की एक सचित्र रपट लिखी थी तब भी यही कहा गया था क्योंकि उस वक्त दिल्ली में निर्गुट शिखर बैठक चल रही थी।
मैंने सरकार, राजनीति और सार्वजनिक बहस में विभिन्न लोगों से पूछा कि क्या हालात तब से अलग हैं तो जवाब मिला कि पहले आपको पता होता था कि सत्ता प्रतिष्ठान में कौन कुछ समय के लिए आपसे बातचीत बंद कर देगा या मदद नहीं करेगा। या फिर शायद फोन करके शिकायत करेगा।
फिर सन 2010 के बाद का दौर आया जब अन्ना आंदोलन के समय सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा किया जाने लगा। इसके बाद बहिष्कार और पहुंच रोकने की घटनाएं हुईं। परंतु यह चिंता तब भी नहीं थी कि सरकार आपके खिलाफ मुकदमे करेगी। अब हालात बदल गए हैं। आम आदमी पार्टी के राज्य सभा सदस्य संजय सिंह से पूछिए। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार की आलोचना में कुछ बयान दिए और उन पर देशद्रोह का आरोप लगा दिया गया। एक लोकतांत्रिक देश में ऐसे मामले में आप अदालत के सिवा कहा जाएंगे? अदालत अपना वक्त लेगी। एक तो इसलिए कि यह पूरी प्रक्रिया अपने आप में दंड है और दूसरा यह कि एक हद तक वे भी सब पर शक करने की मानसिकता से ग्रस्त हैं। इसका परिणाम यह कि निर्दोष सिद्ध होने तक आप एक तरह से दंडित रहते हैं। इसके अलावा मीडिया ट्रायल और साजिश के आरोप अपनी जगह हैं। देखिए कैसे सीबीआई द्वारा प्रमाण न होने की बात कहने के बावजूद कैसे न्यायाधीश का इस बात पर जोर है कि अरुण शौरी पर वाजपेयी सरकार के कार्यकाल के विनिवेश के मामले में भ्रष्टाचार का मुकदमा चले।
सर्वोच्च न्यायालय आए दिन निजता के अधिकार पर निर्णय देकर या मीडिया ट्रायल की आलोचना करके हमेंं तोहफे देता ही रहता है लेकिन संस्थागत तौर पर क्या उच्च न्यायपालिका के पास यह अधिकार है वह इन बातों को आगे ले जा सके? न्यायपालिका में इस पर बहस रोक पाना चाहिए। खासतौर पर तब जबकि न्यायधीशों की वरिष्ठता और उनके परिजन या के खिलाफ गंभीर मामलोंं के बीच स्पष्ट रिश्ता दिखता है। सब पर शक करो और सब को ठीक करो। यह सोच सत्ता प्रतिष्ठान के शीर्ष पर है और नीचे तक फैल रही है। यह केवल भाजपा तक सीमित नहीं है। यही कारण है कि उद्धव ठाकरे अपने आलोचकों के खिलाफ हरसंभव कानून का प्रयोग कर रहे हैं।
वाई एस जगन मोहन रेड्डी अपने पूर्ववर्तियों और न्यायपालिका के कुछ लोगों के खिलाफ कदम उठाते हैं और अशोक गहलोत ने अपनी ही पार्टी के असंतुष्टों के खिलाफ देशद्रोह का इल्जाम लगा दिया। इसके बाद सबके लिए राह खुली है। महेश भट्ट के साथ रिया चक्रवर्ती की बातचीत को मीडिया चैनलों पर षडयंत्रकारी संगीत के साथ पेश किया जाता है। लोग चिंतित हैं कि यह किसी के साथ भी हो सकता है। फिर भय परवान चढऩे लगता है कि किसी को भी, कहीं भी, किसी भी मामले में फंसाया जा सकता है। यदि ऐसा हो गया तो न्याय पाने में आधी जिंदगी खप जाएगी।
इन बातों ने हमें एक दूसरे के प्रति शंकालु बना दिया है। कुछ लोगों को शायद राष्ट्रीय शंकालु राज्य वाली बात ज्यादा नाटकीय लगे। आप इसे राष्ट्रीय शंकालु समाज कर सकते हैं या शायद दोनों नहीं। मैं तो बस इस पर बहस चाहता हूं।