प्रभावी शासन सुनिश्चित करने के लिए केवल सही नीति ही काफी नहीं है, बल्कि उचित प्रक्रियाओं को अपनाना और उन्हें लागू करना भी जरूरी है। यह एक पुराना सिद्धांत है जिसकी कोई भी सरकार नीति निर्माण और नीतिगत क्रियान्वयन के दौरान अनदेखी नहीं कर सकती। पिछले कुछ सप्ताहों में इसकी प्रासंगिकता और भी स्पष्ट हो गई है क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार इस सिद्धांत के अंतर्निहित मूल्य और शासन के दृष्टिकोण से इसके महत्त्व की अनदेखी करती हुई दिखाई दे रही है। हाल की दो सरकारी नीतियां इस विफलता को बिना किसी संदेह के उजागर करती हैं।
पहली ऐसी नीति सरकार के उस कार्यक्रम से संबंधित है जिसका उद्देश्य पेट्रोल में एथनॉल का मिश्रण बढ़ाना है। पिछले कुछ वर्षों में सरकार इस बात को सुनिश्चित करने में सफल रही है कि खुदरा आउटलेट्स पर बेचे जाने वाले सबसे आम प्रकार के पेट्रोल में लगभग 20 फीसदी एथनॉल का मिश्रण हो। इस कदम ने देश की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता को कम किया है और पेट्रोल को परिष्कृत करने की लागत को नियंत्रित करने में भी मदद की है। खासतौर पर तब जब पश्चिम एशियाई संघर्ष के बाद अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतें बढ़ीं। यह बात और भी महत्त्वपूर्ण है कि ई20 पेट्रोल (जिसमें 20 फीसदी एथनॉल होता है) की शुरुआत ने स्वच्छ ईंधन के अधिक उपयोग में योगदान दिया है।
ई20 पेट्रोल के कई लाभों के बावजूद, नीति लागू करने के दौरान एक समस्या उत्पन्न हुई। एथनॉल मिश्रित पेट्रोल नीति के क्रियान्वयन से सीधे प्रभावित हितधारक पूरी तरह सहमत दिखाई नहीं दिए। पेट्रोल उपभोक्ताओं के पास विकल्प बहुत कम थे और उन्होंने जल्द ही यह महसूस किया कि एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की दक्षता स्पष्ट रूप से घट गई है। यानी व्यावहारिक रूप से वे अपने ईंधन के लिए अधिक भुगतान कर रहे थे। उन्हें उतनी ही दूरी तय करने के लिए अधिक पेट्रोल खरीदना पड़ रहा था जितनी दूरी यात्री कारें बिना एथनॉल वाले समान मात्रा के पेट्रोल से तय करती थीं। कुछ वाहन उपयोगकर्ताओं ने इंजन में गड़बड़ी की शिकायत भी की। एथनॉल मिश्रित पेट्रोल में गड़बड़ी की शिकायतें भी सामने आईं जिसे सरकार ने जोरदार तरीके से खारिज किया। सरकार ने तर्क दिया कि तेल विपणन कंपनियों को बहुत कम संख्या में गड़बड़ी के मामले पता चले और उनका समाधान किया गया।
ऑटोमोबाइल कंपनियां इस बात से अवगत थीं कि पेट्रोल में एथनॉल की हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़ाने के क्या परिणाम होंगे लेकिन जल्द ही उन्होंने महसूस किया कि उन्हें एक स्पष्ट और चरणबद्ध समयसीमा की आवश्यकता है ताकि वे उन कारों के इंजनों को समायोजित कर सकें जिनका उत्पादन करने की योजना वे बना रही थीं।
स्पष्ट प्रश्न यह है कि क्या एथनॉल आधारित पेट्रोल को पूरे देश में लागू करने की समय सारणी बनाने से पहले ऑटोमोबाइल उद्योग को साथ लिया गया। और भी महत्त्वपूर्ण यह है कि एथनॉल मिश्रित पेट्रोल की स्वतंत्र जांच और प्रमाणन की आवश्यकता को अनदेखा कर दिया गया। यदि ब्राजील एक स्वतंत्र संस्था स्थापित कर सकता है जो एथनॉल मिश्रित पेट्रोल को नियंत्रित करती और जांचती है तो भारत, जो आने वाले वर्षों में पेट्रोल में एथनॉल की हिस्सेदारी बढ़ाने की महत्त्वाकांक्षा रखता है, उसे भी ऐसी संस्थागत व्यवस्था स्थापित करनी चाहिए थी।
एथनॉल आधारित पेट्रोल की जांच की जिम्मेदारी उन्हीं तेल विपणन कंपनियों को सौंपना जो इसका उत्पादन करती हैं, हितों का ऐसा टकराव पैदा करता है जिसे टाला जा सकता था।। यह ऐसा था जैसे प्रक्रियाओं का ध्यान रखे बिना नीति लागू की जा रही हो। नीति लागू करने से पहले उचित प्रक्रियाओं की आवश्यकता की अनदेखी का दूसरा उदाहरण है यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) के माध्यम से लेनदेन पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने की सुविचारित और तार्किक पहल। भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 के एक प्रमुख प्रावधान में बदलाव कर एमडीआर को पुनः लागू करने के लिए यूपीआई प्रणाली को सशक्त बनाने में स्वाभाविक रूप से कोई गलत बात नहीं है।
एक त्वरित डिजिटल भुगतान प्रणाली को बनाए रखने और तकनीकी रूप से अद्यतन करने में पर्याप्त लागत आती है। इन लागतों को अनिश्चितकाल तक सरकार या वित्तीय प्रणाली द्वारा सब्सिडी नहीं दी जा सकती। इसलिए जो सरकार ने किया है वह सामान्य प्रक्रिया के अनुरूप ही है। इसके अलावा सरकार ने अब स्पष्ट कर दिया है कि यूपीआई का उपयोग करके दो व्यक्तियों के बीच होने वाले लेनदेन निःशुल्क रहेंगे।
एमडीआर केवल कारोबारी लेनदेन पर लगाया जा सकेगा और यह शुल्क व्यापारी के व्यावसायिक टर्नओवर तथा संभवतः लेनदेन के मूल्य पर निर्भर करेगा। एमडीआर लगाने की इन सीमाओं को यूपीआई और सेवा संचालन समिति (एसएससी) तय करेगी जो नैशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के नेतृत्व में है और यूपीआई जैसी डिजिटल भुगतान प्रणालियों का संचालन करती है।
इसका स्वागत करने का एक और कारण है कि यह यूपीआई प्रणाली में एमडीआर की वापसी को सुगम बनाएगा। डिजिटल भुगतान का विस्तार करने और वित्तीय समावेशन को बेहतर बनाने के प्रयास में, सरकार ने जनवरी 2020 में यूपीआई और रुपे डेबिट कार्ड के माध्यम से व्यक्ति-से-व्यापारी लेनदेन पर एमडीआर को शून्य कर दिया था। सरकार ने बैंकों को उस लागत को वहन करने में मदद के लिए सब्सिडी देना भी शुरू किया (पिछले वर्ष लगभग 2,000 करोड़ रुपये का अनुमान)। अब इस व्यवस्था को वापस लिया जा रहा है। सरकारें शायद ही कभी किसी सब्सिडी योजना को वापस लेती हैं लेकिन यह आश्वस्त करने वाला है कि सरकार ने अब साहस दिखाया है और व्यक्ति-से-व्यापारी लेनदेन पर एमडीआर को पुनः लागू करने की सुविधा दी है, हालांकि कुछ छूटों के साथ।
फिर भी सरकार ने यूपीआई प्रणाली में एमडीआर के उपयोग से जुड़ी एक मौलिक समस्या का समाधान नहीं किया है। एनपीसीआई जिसे संयुक्त रूप से भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय बैंक संघ (आईबीए) ने प्रोत्साहित किया है, वह सामूहिक रूप से कुछ प्रमुख सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के स्वामित्व में है। यद्यपि यह एक गैर लाभकारी कंपनी है लेकिन एनपीसीआई की स्वामित्व संरचना हितों का ऐसा टकराव पैदा करती है जिसे टाला जा सकता है। एनपीसीआई के मालिक बैंक सीधे एमडीआर शुल्क पर लिए गए निर्णय से लाभान्वित होंगे जिसे एनपीसीआई की अध्यक्षता वाली समिति तय करेगी।
क्या हितों के टकराव की ऐसी स्थिति को विधायी बदलाव करते समय टाला जा सकता था? यकीनन समस्या सरकार द्वारा नियमन को अपनाने के तरीके से उत्पन्न होती है। किसी बड़े नीति परिवर्तन को लागू करने से पहले प्रक्रिया का पालन करने के महत्त्व की अनदेखी की गई। ऐसी विफलता नीतियों को लागू करने में टालने योग्य बाधाएं पैदा कर सकती है। खासकर उस समय जब मोदी सरकार आयात शुल्क और द्विपक्षीय निवेश संधियों जैसे क्षेत्रों में बड़े सुधारों की योजना बना रही है। हितधारकों से प्राप्त फीडबैक को शामिल करना नीति परिवर्तन लागू करते समय परिचालन संबंधी समस्याओं को रोकने में मदद कर सकता है। सुधारों के नए दौर को अपनाते समय इस प्रक्रिया की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए।