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Editorial: ट्रंप के ‘टैरिफ वॉर’ के घेरे में भारत, बढ़ सकती है व्यापारिक तकरार

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ट्रंप प्रशासन की नई शुल्क जांचों ने भारतीय निर्यातकों की चिंता बढ़ा दी है। भारत को अब मजबूत आर्थिक तर्कों के साथ अपनी निष्पक्ष व्यापारिक साख साबित करनी होगी

Last Updated- March 15, 2026 | 9:58 PM IST
president donald trump
अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप | फाइल फोटो

अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा शुल्क लगाने के मामले में प्लान बी को अपनाना तय था। पिछले सप्ताह अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने व्यापार अधिनियम की धारा 301 के तहत जांच आरंभ की। ट्रंप ने गत वर्ष आपातकालीन आर्थिक शक्ति अधिनियम के तहत जो तथाकथित जवाबी शुल्क लगाए थे, उन्हें अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में निरस्त कर दिया। परंतु प्रशासन ने तत्काल व्यापार अधिनियम की धारा 122 के तहत 150 दिनों तक के लिए 10 फीसदी शुल्क लगा दिया जिसे बढ़ाकर 15 फीसदी किया जा सकता है। इस प्रकार शुल्क के लिए एक अधिक टिकाऊ तंत्र की आवश्यकता है। शुल्क वृद्धि ट्रंप के आर्थिक एजेंडे का मुख्य हिस्सा हैं।

इसके पीछे बुनियादी तर्क यही है कि अमेरिका के व्यापारिक साझेदार जिनमें करीबी सहयोगी भी शामिल हैं, अमेरिका के प्रति निष्पक्ष नहीं रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप अमेरिका का व्यापार घाटा अधिक है और अधिक शुल्क दरों की मदद से आयात को सीमित करने और अमेरिकी कारोबारों को बढ़ावा देने की उम्मीद है।

यूएसटीआर की पहली जांच की शुरुआत 16 देशों या गुट को लेकर हुई जिनमें भारत शामिल था। यह जांच विनिर्माण क्षेत्र में ढांचागत अतिरिक्त क्षमता और उत्पादन से संबंधित थी जो क​थित रूप से अमेरिकी कारोबारों को विपरीत ढंग से प्रभावित कर रहा था। यूएसटीआर के मुताबिक जिन क्षेत्रों में अमेरिका को नुकसान हो रहा था या जिनमें वह पीछे छूट गया था उनमें एल्युमीनियम, ऑटोमोबाइल्स, बैटरी, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीन टूल्स, स्टील और परिवहन संबंधी उपकरण आदि शामिल थे। यह तर्क दिया गया है कि व्यापारिक साझेदार देशों में अतिरिक्त क्षमता, घरेलू क्षमता बढ़ाने और घरेलू मांग को दबाने वाले हस्तक्षेपों से उत्पन्न हो सकती है।

दूसरी जांच, जो 60 व्यापारिक साझेदारों के खिलाफ शुरू की गई और जो 2024 में अमेरिका के 99 फीसदी से अधिक आयात को शामिल करती है, उन वस्तुओं के आयात को प्रतिबंधित करने से संबंधित है जो बंधुआ मजदूरी से उत्पादित होती हैं। अमेरिकी कानून जबरन श्रम से उत्पादित या निर्मित वस्तुओं के आयात पर प्रतिबंध लगाते हैं।

स्पष्ट है कि इन जांचों के पीछे का विचार शुल्क लगाने के तरीके खोजना है। जो संभवतः जवाबी शुल्क के करीब हों। हालांकि, इस कानून के तहत व्यापार प्रतिनिधि को उन देशों से परामर्श करना भी आवश्यक है जिनकी नीतियां और प्रथाएं जांच के दायरे में हैं। इससे एक और दौर की वार्ता शुरू हो सकती है।

भारत ने पिछले वर्ष कठिन परिस्थितियों के बावजूद अमेरिका के साथ लगातार बातचीत करके अच्छा किया। चूंकि व्यापार समझौता अभी तक अंतिम रूप नहीं ले पाया है, भारत को वार्ता जारी रखनी होगी। नई जांचों के संदर्भ में, भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि वह निर्यात बढ़ाने के लिए अनुचित तरीकों का उपयोग नहीं कर रहा है। वास्तव में, यह कहना कठिन है कि भारत के पास ढांचागत अतिरिक्त विनिर्माण क्षमता है। कई विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के विपरीत, भारत की वृद्धि निर्यात से प्रेरित नहीं है। भारत चालू खाते का घाटा रखता है, जिसका अर्थ है कि वह दुनिया से जितना बेचता है उससे अधिक खरीदता है, और बचत-निवेश अंतर को पाटने के लिए विदेशी बचत पर निर्भर करता है।

भारत का अमेरिका के साथ व्यापार अधिशेष है, लेकिन अर्थशास्त्रियों ने यह भी दिखाया है कि वह श्रम-प्रधान वस्तुओं में अपनी क्षमता से काफी कम प्रदर्शन कर रहा है। इसी तरह, औद्योगिक गतिविधि के स्तर और श्रमिकों की उपलब्धता को देखते हुए, बंधुआ मजदूरी के इस्तेमाल की संभावना कम है। भारत का लोकतंत्र ऐसी प्रथाओं के खिलाफ एक नैसर्गिक सुरक्षा कवच है।

हालांकि, ये जांचें अन्य देशों की प्रथाओं से अधिक अमेरिकी हितों पर केंद्रित लगती हैं। इसलिए यह महत्त्वपूर्ण होगा कि भारत अपना मामला कैसे प्रस्तुत करता है और व्यापार समझौते के माध्यम से व्यापारिक अनिश्चितताओं को कितनी जल्दी दूर किया जाता है। फिर भी, यह देखना दिलचस्प होगा कि चीन के मामले में जांच कैसे आगे बढ़ती है, जहां राज्य वास्तव में क्षमता निर्माण के लिए पूंजी आवंटन को निर्देशित करता है और घरेलू मांग को दबाता है।

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First Published - March 15, 2026 | 9:58 PM IST

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