इस सप्ताह केविन वॉर्श के नेतृत्व में हुई पहली फेडरल ओपन मार्केट कमेटी (एफओएमसी) की बैठक ने दुनिया के सबसे महत्त्वपूर्ण केंद्रीय बैंक, अमेरिकी फेडरल रिजर्व के कामकाज में महत्त्वपूर्ण बदलावों की नींव रखी। एफओएमसी ने फेडरल फंड दरों का लक्ष्य दायरा 3.5 से 3.75 फीसदी पर अपरिवर्तित रखा, लेकिन लगभग 130 शब्दों का उसका वक्तव्य सामान्य से काफी छोटा था और इसमें भविष्य के लिए कोई अनुमान नहीं दिया गया।
हालांकि, वक्तव्य में स्पष्ट रूप से कहा गया कि मुद्रास्फीति दर फेड के 2 फीसदी के लक्ष्य की तुलना में अभी भी अधिक है और समिति मूल्य स्थिरता सुनिश्चित करेगी। मौजूदा परिस्थितियों और उच्च मुद्रास्फीति दर को देखते हुए वित्तीय बाजारों को कुछ सख्त रुख की उम्मीद जरूर थी, लेकिन वक्तव्य उम्मीदों से कहीं अधिक सख्त साबित हुआ। बयान के बाद शेयर और बॉन्ड दोनों बाजारों में गिरावट आई।
फेडरल रिजर्व ने अपने आर्थिक अनुमान या तथाकथित डॉट प्लॉट भी जारी किए, जिनमें फेडरल रिजर्व बोर्ड के सदस्यों और फेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्षों के अनुमान शामिल हैं। इससे पता चला कि 18 में से नौ सदस्यों को उम्मीद है कि इस साल नीतिगत दर में कम से कम 25 आधार अंक की वृद्धि होगी। गौरतलब है कि वॉर्श ने अपने अनुमान प्रस्तुत नहीं किए। वर्तमान संरचना के अनुसार नीतिगत दर को लेकर उनके विचार काफी स्पष्ट हैं।
नीति के बाद आयोजित संवाददाता सम्मेलन में वॉर्श ने फेड के संचार, उसकी बैलेंस शीट की संरचना, उसके द्वारा उपयोग किए जाने वाले डेटा स्रोत, उत्पादकता और रोजगार, और मुद्रास्फीति ढांचे का अध्ययन करने के लिए पांच कार्य बलों के गठन की घोषणा भी की। यह सर्वविदित है कि वॉर्श का मानना है कि फेड अधिकारियों को कम संवाद करना चाहिए।
फेड और अन्य केंद्रीय बैंकों के संवाद का स्तर समय के साथ बढ़ा है, विशेष रूप से वैश्विक वित्तीय संकट के बाद से, जिसने नीति निर्माताओं और वित्तीय बाजारों सहित अन्य हितधारकों के बीच सूचना विषमता को कम करने में मदद की है। हालांकि वॉर्श के विचार में नीति निर्माता अपने ही शब्दों के कैदी बन सकते हैं। टास्क फोर्स की सिफारिशें और फेड द्वारा उन्हें लागू करने का तरीका अन्य केंद्रीय बैंकों को प्रभावित कर सकता है, जिसके व्यापक परिणाम हो सकते हैं।
इन बदलावों के अलावा, फेड के बयान और फेड अध्यक्ष के रूप में वार्श की पहली प्रेस कॉन्फ्रेंस से सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह सामने आई कि फेड ने मूल्य स्थिरता और 2 फीसदी मुद्रास्फीति लक्ष्य के प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता जताई है। वार्श ने हमेशा यही कहा है कि मुद्रास्फीति एक विकल्प है, जिसे उन्होंने बुधवार को संवाददाता सम्मेलन में भी दोहराया।
हितधारकों में यह चिंता थी कि वह राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के विचारों के अनुरूप इस मुद्दे पर नरम रुख अपना सकते हैं। हालांकि, उनकी टिप्पणियों से फिलहाल ऐसी आशंकाएं दूर हो जानी चाहिए। आने वाले महीनों में फेड के रुख पर ट्रंप की क्या प्रतिक्रिया होगी, यह देखना दिलचस्प होगा। परिणामों की दृष्टि से, इस वर्ष के अंत में संभावित ब्याज दर वृद्धि से वैश्विक वित्तीय स्थितियां और भी सख्त हो सकती हैं।
कुछ अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अमेरिका में मुद्रास्फीति का दबाव ईरान युद्ध के कारण ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि से कहीं अधिक गहरा है।
यूरोपीय सेंट्रल बैंक और बैंक ऑफ जापान ने हाल के दिनों में ब्याज दरें बढ़ाई हैं। हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच हुए समझौते के कारण निकट भविष्य में वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति कम हो सकती है, लेकिन संभावित रूप से सख्त वित्तीय स्थितियां भारत जैसी अर्थव्यवस्थाओं को प्रतिकूल रूप से प्रभावित कर सकती हैं।
विदेशी मुद्रा जमा आकर्षित करने जैसे हालिया प्रयास अल्पावधि में मददगार साबित हो सकते हैं, लेकिन भारत को स्थिर इक्विटी और ऋण प्रवाह दोनों को आकर्षित करने के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे।