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Editorial: UPI फ्रॉड पर RBI का एक्शन डिजिटल सुरक्षा के लिए जरूरी

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आरबीआई डिजिटल धोखाधड़ी रोकने के लिए यूपीआई लेनदेन में एक घंटे की देरी और प्रमाणीकरण जैसे कड़े सुरक्षा नियम प्रस्तावित कर रहा है, ताकि उपयोगकर्ताओं का पैसा सुरक्षित रहे

Last Updated- April 13, 2026 | 9:22 PM IST
UPI
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

अपनी शुरुआत के एक दशक बाद यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई देश की डिजिटल भुगतान व्यवस्था का अनिवार्य अंग बन चुका है। यह तेज गति से मुद्रा हस्तांतरण से लेकर परस्पर संचालन के जरिये विभिन्न प्लेटफॉर्म और संस्थानों के बीच अबाध गति से लेनदेन सुनिश्चित करता है। 45 करोड़ से अधिक उपयोगकर्ताओं के साथ यह हर माह करीब 22 अरब लेनदेन करता है और मार्च में इस लेनदेन का मूल्य करीब 29.5 लाख करोड़ रुपये रहा। इस प्रकार इसने भारतीयों के लेनदेन के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है। बहरहाल, एक ओर जहां वृद्धि में अब धीमापन आ रहा है वहीं धोखाधड़ी का जोखिम लगातार बढ़ रहा है। 

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार धोखाधड़ी के रिपोर्ट हुए मामले 2021 के 2.6 लाख से बढ़कर 2025 में करीब 28 लाख तक पहुंच गए। इनका सालाना मूल्य 22,000 करोड़ रुपये का स्तर पार कर गया। ध्यान देने वाली बात है कि धोखाधड़ी के 98.5 फीसदी मामले 10,000 रुपये से अधिक मूल्य के थे। इस संदर्भ में हाल ही में रिजर्व बैंक की ओर से जारी परिचर्चा पत्र ‘एक्सप्लोरिंग सेफगार्ड्स इन डिजिटल पेमेंट्स टु कर्ब फ्रॉड्स’ में यह प्रस्ताव रखा गया है कि उच्च मूल्य के नकदी हस्तांतरण में एक घंटे का विलंब किया जाए।

साथ ही, वरिष्ठ नागरिक अगर 50,000 रुपये से अधिक का लेनदेन करें तो किसी विश्वसनीय व्यक्ति द्वारा उसका प्रमाणन किया जाए। कम क्रेडिट टर्नओवर खातों के लिए 25 लाख रुपये वार्षिक प्रवाह सीमा और एक ‘व्हाइटलिस्टिंग’ (चुनिंदा विश्वसनीय चीजों को अनुमति देना बाकी को रोक देना) तंत्र का प्रस्ताव रखा गया है, जिसके तहत भुगतानकर्ता कुछ लेनदेन को अधिकृत कर सकते हैं ताकि वे विलंब को दरकिनार कर सकें। 

रिजर्व बैंक ने यह सही चिह्नित किया है कि धोखाधड़ी की प्रकृति भी बदली है। आज धोखाधड़ी के अधिकांश मामले ऐप्स से होते हैं या अधिकृत पुश भुगतान से होते हैं। उपयोगकर्ताओं के साथ धोखा करके छद्म कॉल, छद्म पहचान या आकस्मिक जरूरत का हवाला देकर उनसे पैसे ले लिए जाते हैं। यूपीआई जैसी रियल टाइम प्रणाली में एक बार पैसा चला जाने के बाद उसकी वसूली करना मुश्किल होता है। यही वजह है कि बचाव और अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है।

उच्च-मूल्य हस्तांतरणों के लिए प्रस्तावित एक घंटे की देरी उपयोगकर्ताओं को लेनदेन पर पुनर्विचार या उसे रद्द करने का एक अवसर दे सकती है, और बैंकों को संदिग्ध गतिविधियों को चिह्नित करने का समय मिल सकता है। सिंगापुर, ब्रिटेन और स्वीडन जैसे देशों के अनुभव से पता चलता है कि ऐसी ‘कूलिंग-ऑफ’ अवधि धोखाधड़ी को कम कर सकती हैं। यह सब नियमित भुगतानों को महत्त्वपूर्ण रूप से प्रभावित किए बिना हो सकता है।

यद्यपि कुछ ढांचागत दिक्कतें बरकरार हैं। लेनदेन में देरी यूपीआई के त्वरित भुगतान के बुनियादी वायदे के विरुद्ध है। बैंकों को भी अलर्ट और धन वापसी आदि की नई प्रणालियों में निवेश करना होगा। इससे लागत और समन्वय की चुनौतियां बढ़ेंगी। धोखाधड़ी करने वाले उपयोगकर्ताओं को ‘व्हाइटलिस्टिंग’ के माध्यम से सुरक्षा उपायों को दरकिनार करने के लिए भी मना सकते हैं। ‘विश्वसनीय व्यक्ति’ द्वारा प्रमाणीकरण भी वास्तविक लेनदेन में देरी कर सकता है। इसलिए इन खामियों को दूर करने में प्रौद्योगिकी महत्त्वपूर्ण होगी।

आर्टिफिशल इंटेलिजेंस आधारित निगरानी, बैंकों के बीच बेहतर डेटा साझा करने और वास्तविक समय में जोखिम का अंकन आदि संदिग्ध रुझानों का पता लेनदेन पूरा होने के पहले लगाने में मदद कर सकते हैं। ऐसे उपाय यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सुरक्षा उपाय व्यापक न होकर लक्षित हों, जिससे दक्षता बनी रहे और सुरक्षा में सुधार हो।

हाल ही में रिजर्व बैंक द्वारा उपभोक्ता-केंद्रित प्रोत्साहन, जैसे कि छोटे मूल्य की धोखाधड़ी के लिए क्षतिपूर्ति तंत्र, जो इस वर्ष जुलाई से लागू होगा, उपभोक्ता विश्वास को भी बढ़ाएगा। खासकर अगर दावों का निपटारा शीघ्रता से किया जाए। अंततः, प्रणाली में विश्वास केवल रोकथाम पर नहीं, बल्कि निष्पक्ष और समय पर निवारण पर भी निर्भर करता है।

फिर भी, उपयोगकर्ताओं, खासकर संवेदनशील वर्गों के हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट सुरक्षा-सीमाएं तय की जा सकती हैं। यद्यपि यह भी महत्त्वपूर्ण होगा कि उपयोगकर्ताओं को ऐसे तंत्र से बाहर निकलने का विकल्प दिया जाए। इस संदर्भ में जागरूकता भी अत्यंत आवश्यक है। यद्यपि रिजर्व बैंक और अन्य एजेंसियों ने प्रयास तेज किए हैं, परंतु धोखाधड़ी का पैमाना और उसका बदलता स्वरूप यह दर्शाता है कि कहीं अधिक सतत और व्यापक डिजिटल साक्षरता पहलों की आवश्यकता है।

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First Published - April 13, 2026 | 9:22 PM IST

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