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Editorial: कानूनों में बदलाव जरूरी

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इसके अलावा भारत को परमाणु ऊर्जा अधिनियम और सीएलएनडीए में तत्काल संशोधन करना होगा। वित्त मंत्री ने भी 2025-26 के अपने बजट भाषण में इसका उल्लेख किया।

Last Updated- March 31, 2025 | 10:39 PM IST
Rashtra Ki Baat: Not just the deep state but the US State Department is also under attack

भारत और अमेरिका के बीच असैन्य परमाणु समझौते पर हस्ताक्षर के 18 वर्ष बाद आखिरकार एक राह निकलती नजर आई। 26 मार्च को अमेरिका के ऊर्जा विभाग ने भारत को छोटे मॉड्युलर रिएक्टर (एसएमआर) की तकनीक सौंपने के लिए होल्टेक इंटरनैशनल को नियामकीय मंजूरी दे दी। इसके बाद भारतीय-अमेरिकी कृष पी सिंह द्वारा स्थापित होल्टेक 30 से 300 मेगावॉट परमाणु रिएक्टरों के लिए एसएमआर तकनीक साझा कर सकती है। इसे तीन भारतीय कंपनियों- होल्टेक एशिया, टाटा कंसल्टिंग और लार्सन ऐंड टुब्रो के साथ साझा किया जाएगा। इस स्वीकृति को उस समझौते के पक्ष में एक अहम प्रगति माना जा सकता है जिसे परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व अधिनियम (सीएलएनडीए) की एक शर्त ने रोक दिया था। इससे निजी क्षेत्र के साथ परमाणु सहयोग के नए रास्ते भी खुलते हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार के अपने बजट भाषण में 20,000 करोड़ रुपये के परमाणु ऊर्जा मिशन के तहत 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा का लक्ष्य रखा है। इसलिए यह मंजूरी सरकार को मौका देती है कि वह देश में ऊर्जा बदलाव की प्रक्रिया को गति प्रदान करने के लिए कानूनों में कुछ बदलाव करे।

अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम के ’10 सीएफआर पार्ट 810′ निर्यात नियंत्रण नियम के तहत होल्टेक से गठजोड़ की यह मंजूरी इस शर्त के साथ आई है कि भारतीय परमाणु ऊर्जा निगम लिमिटेड (एनपीसीआईएल), एनटीपीसी लिमिटेड और परमाणु ऊर्जा नियामकीय बोर्ड जैसी सरकारी संस्थाओं के साथ हाथ नहीं मिलाया जाएगा। इतना ही नहीं, दी गई जानकारी अमेरिका से इजाजत लिए बगैर किसी अन्य पक्ष या देश के साथ साझा नहीं की जा सकती। मगर भारत ने एसएमआर तकनीक में खासा तजुर्बा रखने वाली तीनों सरकारी संस्थाओं से गठजोड़ नहीं करने का भरोसा अभी तक नहीं दिलाया है। देश में जो चल रहे 22 स्वदेश निर्मित परमाणु रिएक्टरों की क्षमता 220 मेगावॉट तक है। भारत को अपनी पनडुब्बी के लिए 85 मेगावॉट का रिएक्टर बनाने का अनुभव भी है। यह भरोसा दिलाने पर भारत स्वदेशी क्षमता बढ़ा पाएगा।

इसके अलावा भारत को परमाणु ऊर्जा अधिनियम और सीएलएनडीए में तत्काल संशोधन करना होगा। वित्त मंत्री ने भी 2025-26 के अपने बजट भाषण में इसका उल्लेख किया। पहले कानून में संशोधन से परमाणु ऊर्जा उत्पादन में एनपीसीआईएल का एकाधिकार खत्म हो जाएगा और निजी भागीदारों के लिए रास्ते खुलेंगे। सीएलएनडीए के प्रावधान 17(बी) में संशोधन भी उतना ही जरूरी है। सीएलएनडीए की अवधारणा चेर्नोबिल के बाद के अंतरराष्ट्रीय पूरक नागरिक परमाणु दायित्व समझौते पर आधारित है, जिसने सदस्य देशों के सहयोग से कोष तैयार किया था ताकि परमाणु हादसा होने पर राहत वितरण तेजी से किया जा सके। इस कोष का इस्तेमाल तभी कर सकते हैं, जब परिचालक को संभावित नुकसान का कानूनी जवाबदेह बनाया जाए और राहत वितरण का जिम्मेदार भी बनाया जाए।

भारत के कानून में प्रावधान 17(बी) है, जो परमाणु हादसा होने पर आपूर्तिकर्ता को भी जिम्मेदार बनाता है। ऐसा भोपाल गैस कांड के तजुर्बे और परमाणु ऊर्जा संयंत्र चलाने वाले की वित्तीय जवाबदेही से संबंधित अंतरराष्ट्रीय समझौते की गलत व्याख्या के कारण हुआ। इस प्रावधान ने विदेशी परमाणु वेंडरों मसलन जीई-हिताची, वेस्टिंगहाउस और फ्रांस की अरेवा को भारत के परमाणु क्षेत्र में निवेश करने से रोका। संसद में बहुमत के साथ सरकार के पास इन अहम सुधारों को अंजाम देने का पूरा मौका है। यह परमाणु तकनीक को अपनाने के लिए ही जरूरी नहीं है बल्कि जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से भी जरूरी है।

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First Published - March 31, 2025 | 10:31 PM IST

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