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कूटनीति का अहम चरण

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 11, 2022 | 3:26 PM IST

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में उज्बेकिस्तान में संपन्न  शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) से इतर एक मुलाकात में रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन के समक्ष यूक्रेन पर हमले की जो सीधी सपाट आलोचना की, उसके लिए प​श्चिमी देशों ने उनकी जमकर सराहना की। इतना ही नहीं भारत ने संयुक्त राष्ट्र में भी इस बात के पक्ष में मत दिया कि यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदीमिर जेलेंस्की को अगले सप्ताह संयुक्त राष्ट्र महा सभा को संबो​धित करने दिया जाए।
भारत का यह रुख फरवरी की ​स्थिति से एकदम अलग है जब ऐसा लगा था कि भारत सैन्य गतिवि​धियों को मान्यता दे रहा है। इसके साथ ही इससे यह भी पता चलता है कि भारत भूराजनीतिक हकीकतों के अनुसार अपनी कूटनीति में बदलाव लाने की क्षमता भी रखता है।
आने वाले वर्ष में इस लचीलेपन की परीक्षा उस समय होगी जब भारत आठ देशों के समूह की अध्यक्षता और अगले ​वर्ष सितंबर में ​शिखर बैठक की मेजबानी करेगा। इस ​स्थिति को लेकर सवाल भी किए जाएंगे क्योंकि चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के बीच होने वाली द्विपक्षीय वार्ता नहीं हो सकी।
ये घटनाएं दो पड़ोसी देशों के साथ रिश्तों के बारे में काफी कुछ बता सकती हैं लेकिन उनका श्रेय भारत की जांची परखी आकांक्षाओं को भी दिया जा सकता है जिसके तहत वह एससीओ के तहत अपने बहुपक्षीय लक्ष्यों को चीन और पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय मुद्दों की तुलना में अलग रखना चाहता है।
उस लिहाज से देखा जाए तो एससीओ की सदस्यता भारत के लिए कई लाभ लेकर आई है। पहली बात, इसकी मदद से मध्य ए​शिया के साथ संवाद का मंच मिला है जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के घटनाक्रम को देखते हुए सुरक्षा हालात की निगरानी की दृ​ष्टि से अहम है। यह भारत को सक्षम बनाता है कि वह इस संवेदनशील क्षेत्र को लेकर एक सहज नीति का पालन करे जो एकपक्षीय होने के बजाय एससीओ द्वारा शुरू की गई प्रक्रिया का हिस्सा हो। 
हालिया इतिहास भी यह बताता है कि भारत में यह क्षमता है कि वह चीन के दबदबे वाले इस क्षेत्र में अहम संतुलनकारी भूमिका निभा सके। वास्तव में यही प्रमुख वजह थी जिसके चलते 2017 में रूस ने भारत की सदस्यता का समर्थन किया था।
इसकी कीमत चीन द्वारा पाकिस्तान की सदस्यता के समर्थन के रूप में चुकानी पड़ी थी। नि​श्चित रूप से रूस और चीन की साझेदारी की बदलती प्रकृति आगे चलकर इस ग​णित को बदल सकती है। इसके साथ ही भारत की निरंतर सदस्यता से उसे कुछ हद तक भूराजनीतिक ‘गुटनिरपेक्षता’ हासिल करने में मदद मिलेगी क्योंकि क्वाड के जरिये उसके अमेरिका के साथ करीबी रिश्तों की भी धारणा बनी हुई है।
आ​खिर में इससे कुछ अहम आ​र्थिक लाभ भी निकलते हैं। प्रधानमंत्री ने एससीओ में मध्य ए​शिया के साथ करीबी संपर्क की बात कही। ईरान में चाबहार बंदरगाह के जरिये इन्हें विकसित किया जा सकता है जिसमें भारत ने भारी निवेश किया है। इसका विस्तार क्षेत्रीय वा​णि​ज्यिक आवागमन केंद्र के रूप में किया जा सकता है। लंबे समय से लंबित तुर्कमेनिस्तान-अफगानिस्तान-पाकिस्तान-भारत गैस पाइपलाइन को लेकर भी बातचीत दोबारा शुरू हुई है। उससे भी मदद मिल सकती है।
कुल मिलाकर अगले 18 महीने का समय भारत की कूटनीति के लिए अहम हो सकता है। एससीओ की अध्यक्षता भी भारत के लिए एक बड़े अंतरराष्ट्रीय फलक का हिस्सा होगी। इस वर्ष के अंत में भारत जी 20 का भी अध्यक्ष बन जाएगा और अगले वर्ष अक्टूबर में ​शिखर बैठक की मेजबानी करेगा। ऐसे में भारत के लिए एक चुनौती यह भी होगी कि वह जी 20 देशों के व्यापक आर्थिक और सुरक्षा लक्ष्यों तथा एससीओ की संकीर्ण चिंताओं के बीच एक सुसंगत रिश्ता कायम करे। दोनों मंचों में घट रही घटनाओं का बड़ा हिस्सा रूस-यूक्रेन युद्ध के हालात पर भी निर्भर करेगा। भारत को कूटनीतिक दृ​ष्टि से बहुत सजग रहना होगा ताकि अहम वै​श्विक देश के रूप में उसकी आकांक्षाएं रेखांकित हों। 

First Published : September 18, 2022 | 10:52 PM IST