नैनो उत्पादन इकाई के लिए सिंगुर से कदम वापस खींचने की रतन टाटा की धमकी ने पश्चिम बंगाल के औद्योगिक भविष्य को अनिश्चितता में डाल दिया है। टाटा के नैनो कार उत्पादन संयंत्र को एक तरह से राज्य के औद्योगिक पुनरुद्धार के तौर पर देखा जा रहा था और अब अगर कंपनी अपनी परियोजना को वहां से हटा लेती है तो पश्चिम बंगाल की स्थिति ठीक वैसी ही हो जाएगी जो चार दशक पहले थी जब वामपंथी पार्टियां पहली बार सत्ता में आई थीं और उनकी नीतियों की वजह से उद्योगपतियों को राज्य से बाहर रुख करना पड़ा था।
टाटा मोटर्स के खिलाफ मोर्चा संभालने वाली तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी दूसरे सुबोध बनर्जी के तौर पर उभर रही हैं जिन्होंने ‘घेराव’ आंदोलन शुरू किया था जिसकी वजह से राज्य का आर्थिक विकास खासा प्रभावित हुआ था। इससे राज्य के निवासियों को लंबे समय तक रोजगार से वंचित रहना पड़ा था जो आंदोलनों के न होने पर उन्हें मिल सकते थे।
माना कि 1970 के बाद से ही कृषि के मामले में पश्चिम बंगाल ने काफी विकास किया है और इसकी वजह कहीं न कहीं भूमि सुधार के प्रयास भी रहे हैं, पर इसका मतलब यह तो नहीं है कि आधुनिक उद्योगों को बढ़ने से रोका जाए।
सच तो यह है कि अगर औद्योगिक उत्पादन पर नजर डालें तो जिस रफ्तार से देश में विकास हुआ है, राज्य उससे कहीं पीछे है। इसकी एक वजह नए निवेशों का अभाव और समुचित कार्य प्रणाली का न होना भी है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी समेत दूसरी वामपंथी पार्टियों को देर से ही सही, पर इस बात का एहसास हो गया है कि उनकी नीतियों ने राज्य में औद्योगिक विकास का मार्ग अवरुद्ध किया है।
खुद मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य भी इस सच्चाई को समझने लगे हैं। ऐसे में जबकि तमिलनाडु, महाराष्ट्र और उत्तराखंड राज्य एक के बाद एक नई ऑटोमोबाइल परियोजनाओं को हासिल करने में कामयाब हो रहे हैं, अगर सिंगुर परियोजना पश्चिम बंगाल के हाथों से निकलकर किसी और राज्य के पास चली जाती है तो राज्य के औद्योगिक भविष्य पर काले बादल मंडराने लगेंगे।
रतन टाटा की चेतावनी को गंभीरता के साथ लिए जाने की जरूरत है। पिछली दफे भी राजनीतिक उठा पटक के कारण उन्होंने एक परियोजना (बेंगलुरु अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डा प्रस्ताव) से हाथ वापस खींच लिया था।
जमीन मालिकों के 400 एकड़ जमीन को वापस किए जाने को लेकर तृणमूल कांग्रेस ने एक बार फिर आंदोलन छेड़ रखा है। इन जमीन मालिकों ने अपनी जमीन के बदले में सरकार के मुआवजे को लेने से मना कर दिया है। इसी ताजा राजनीतिक विवाद से परेशान होकर टाटा ने सिंगुर से कदम वापस खींचने की धमकी दी है।
तृणमूल इस मसले पर खुद को आत्मविश्वास से लबरेज महसूस कर रही है क्योंकि हाल के पंचायत चुनावों में उसका प्रदर्शन बढ़िया रहा है (सिंगुर की स्थानीय सत्ता उसके हाथों में है)। अगले साल राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं और इसे ध्यान में रखते हुए ममता बनर्जी इस मसले को भुनाने की कोशिश में हैं।
इसी मसले पर नंदीग्राम में सत्तारूढ़ दल को झुकना पड़ा था और उस दौरान किसानों और जनजातियों के पक्ष में हवा बही थी। वामपंथी सरकार भी इस खतरे को समझते हुए मसले को सुलझाने के लिए विकल्प तलाश कर रही है।
पहले वह किसानों को दूसरी जमीन देने के लिए तैयार नहीं थी पर अब वह इसके लिए भी तैयार दिख रही है।