मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार अपने कार्यकाल के सातवें वर्ष में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की एक के बाद एक सामने आ रही रिपोर्ट में तीखी आलोचना का सामना कर रही थी और नीतिगत पंगुता की ओर बढ़ रही थी। कार्यकाल के लगभग उसी दौर में नरेंद्र मोदी की सरकार एकदम उलट नजर आ रही है। मोदी सरकार को देखकर यही लग रहा है कि वह अपनी छाप छोडऩे के लिए व्यग्र है। स्वतंत्रता दिवस के दिन सरकार ने जो ताजा वादे किए हैं उनमें देश के सभी नागरिकों के लिए एक मेडिकल आईडी कार्ड, 100 लाख करोड़ रुपये का अधोसंरचना कार्यक्रम, तीन वर्षों में देश के सभी गांवों तक ऑप्टिकल फाइबर संचार (हम इस बारे में पहले भी सुन चुके हैं) और तमाम अन्य ऐसी पहलें शामिल हैं जिनको गिनना भी हमें थका सकता है।
एक वर्ष पहले अपनी चुनावी जीत से तरोताजा मोदी ने जल जीवन अभियान (पांच वर्ष में सभी ग्रामीण घरों में नल का पानी) की घोषणा की थी। उन्होंने यह घोषणा भी की थी कि पांच वर्ष के भीतर देश की अर्थव्यवस्था को 5 लाख करोड़ डॉलर का आकार दिया जाएगा। उससे पहले चुनाव प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने किसानों के लिए नकद भुगतान योजना और नि:शुल्क चिकित्सा बीमा योजना की शुरुआत की थी। इसके अलावा भी तमाम अन्य घोषणाएं की गईं। मिसाल के तौर पर कोयला खनन का निजीकरण, नई शिक्षा नीति, व्यक्तिगत स्तर पर और कंपनियों के लिए कम कर दर और एक नया कर घोषणापत्र पेश किया गया। आत्मनिर्भरता के क्रम में आयात प्रतिस्थापन किया गया और अब उसके समांतर निर्यात पर जोर है। एक के बाद एक होने वाली इन घोषणाओं के साथ निरंतरता बनाए रखना कठिन है, उनकी लागत का अनुमान लगाना तो दूर है।
इस बात में किसी को संदेह नहीं होगा कि इस सरकार की महत्त्वाकांक्षाएं बहुत ऊंची हैं। खासतौर पर यह ध्यान में रखते हुए कि यह ऐतिहासिक निर्णयों में व्यस्त रही है। जम्मू कश्मीर का दर्जा बदलना, नागरिकता पर एक विवादित कानून पारित करना ऐसी ही घटनाएं हैं। परंतु इन कदमों के साथ-साथ अर्थव्यवस्था और देश की तात्कालिक आवश्यकताओं से इसकी दूरी भी उतनी ही स्पष्ट है।
तात्कालिक महत्त्व के तीन अहम विषय जिन पर देश प्रधानमंत्री को सुनना चाहता है, उन पर खामोशी जारी है। चीन की हालिया हरकत के बाद रक्षा व्यय बढ़ाने की आवश्यकता है लेकिन इस बारे में कुछ नहीं कहा गया, कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बाद देश नए मामलों का नया वैश्विक केंद्र बना है लेकिन स्वास्थ्य व्यय बढ़ाने के मामले में भी कुछ सुनने को नहीं मिला। इस बीच अर्थव्यवस्था की दिक्कतों से निपटने का काम दूसरों पर छोड़ दिया गया है। प्रधानमंत्री रियायती सैनिटरी पैड के बारे में बात करते हैं लेकिन उपरोक्त बातों पर खामोश रहते हैं। यह अजीब तो है।
इसका एक रुझान है। मोदी कठिन मसलों को यूं ही छोड़ देते हैं। जब वह उनके बारे में बात करते हैं तो या तो उन्हें नकारते हैं (सीमा के हालात की तरह) या ऐसी सफलताओं को रेखांकित करते हैं जो दरअसल एक व्यापक गंभीर समस्या का महज एक पहलू होती हैं (हमने कोविड संकट में ऐसा देखा)। इसके साथ ही वह सकारात्मक घोषणाओं का एक सिलसिला चलाते हैं जो उन्हें आम नागरिकों को होने वाले लाभ, व्यापक विकास लक्ष्य हासिल करने से जोड़ती हैं और सरकार के प्रभावी नेतृत्व को दर्शाती हैं। इस क्रम में कई बार शर्मिंदगी का सबब बन चुके पुराने मसलों की अनदेखी की जाती है। मसलन अच्छे दिनों का वादा, दो अंकों की आर्थिक वृद्धि और पांच लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था आदि को भुला दिया गया है और अब आत्मनिर्भरता जैसे नए लक्ष्यों की बात हो रही है।
यह एक अच्छी राजनीतिक रणनीति है। मीडिया के साथ सार्थक संवाद के अभाव में प्रभावशाली वाक कला और आयोजन प्रबंधन के जरिये काम चला लेना आसान है। धीमी आर्थिक वृद्धि के कारण आगामी दशक के सीमित संसाधनों को देखते हुए नई हकीकतों से निपटने की मध्यम अवधि की आर्थिक नीति अस्पष्ट है। विश्व बैंक का कहना है कि सार्वजनिक ऋण अब से दो वर्ष बाद वांछित स्तर से 50 फीसदी अधिक हो सकता है। उसे नियंत्रित रखने के लिए या ऋण जोखिम घटाने के लिए राजकोषीय नीति को सीमित करना होगा। कभी न कभी मौजूदा पूर्वानुमान और खर्चीली योजनाओं केबीच की विसंगति को दूर करना ही होगा।