चीन के साथ लद्दाख में वास्तविक सीमा रेखा पर छिड़े विवाद में क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर यह आरोप बनता है कि वह पहले पीछे हट गए और चीन को भारत का कुछ भूभाग हड़पने दिया? तात्कालिक संदर्भ में तो इसका उत्तर न है क्योंकि सीमा क्षेत्र के बुनियादी ढांचे में तमाम सुधार और सशस्त्र बलों को मजबूती प्रदान किए जाने के बावजूद भारत के पास इतनी क्षमता नहीं है कि वह चीन के सैनिकों को मजबूती से काबिज जगह से पीछे धकेल पाए।
एक बार सेना ने चीन को दखल कर लेने दिया और उसे अग्रिम पंक्ति के सैनिकों को तोपों और हथियारबंद वाहनों की मदद मिल जाने दी तो यह कब्जा काफी हद तक मजबूत हो गया।
हमें जो क्षति हुई वह खुफिया सूचनाओं की नाकामी की वजह से हुई या उस क्षेत्र में भारतीय सेना के सतर्क नहीं होने से, उसमें प्रधानमंत्री के करने के लिए कुछ खास नहीं था। उन्हें असमानता भरे लेनदेन से संतुष्ट होना पड़ा। अगर नेहरू की तरह वह चीनियों को निकाल फेंकने का आदेश देते तो मुश्किल बढ़ जाती क्योंकि चीन अत्यंत शक्तिशाली शत्रु है। मोदी ने जमीनी तथ्यों को लेकर ऐसा रुख अपनाया जो हकीकत के करीब था और साहस पर विवेक को वरीयता देते हुए मुद्दे को फिलहाल हल किया कि (शायद) भारत भविष्य में इसके लिए लडऩे की तैयारी करेगा।
असल समस्या यह है कि मोदी और उनके पूर्ववर्तियों में भी ऐसी प्रतिबद्धता का अभाव रहा है। रक्षा बजट निहायत ही कम हो चुका है। मोदी के अब तक के वित्त मंत्रियों में से दो रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं लेकिन इससे भी कोई खास फर्क नहीं आया। सेना आधिकारिक तौर पर कह चुकी है कि उसके उपकरण पुराने पड़ चुके हैं। बीते एक दशक में नौसेना में 20 से भी कम युद्धपोत और पनडुब्बियां शामिल हुई हैं। इस गति से वह कभी वांछित आकार नहीं प्राप्त कर सकेगी। जहां तक हवाई जंग की बात है तो चीन का हवाई रक्षा तंत्र बेहतर है। उसके पास बेहतर रेंज वाली मिसाइल, बढिय़ा रेडार और चोरी छिपे वार करने में सक्षम लड़ाकू विमान हैं।
हमारी अर्थव्यवस्था का आकार चीन की अर्थव्यवस्था के पांचवें हिस्से के बराबर है। ऐसे में क्षमता में इस कमी की भरपाई कर पाना खासा मुश्किल है लेकिन इस असंतुलन को कम किया जा सकता था और हथियार खरीद कार्यक्रम को और अधिक बेहतर बनाया जा सकता था। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान, जिसकी अर्थव्यवस्था का आकार भारत की अर्थव्यवस्था के नौवें हिस्से के बराबर है, उसके समक्ष भी हमारी रक्षा क्षमता सीमित है। सन 2008 और 2001 में पाकिस्तान के उकसावे के दौरान यह साबित भी हो चुका है। पुलवामा के बाद की गई कार्रवाई में भारत को एक विमान की क्षति हुई जबकि तुलनात्मक रूप से पाकिस्तान का वायुसेना बजट काफी कम है।
संसाधनों की कमी एक वास्तविक समस्या है जिसे नकारा नहीं जा सकता। भारत को रक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य और शिक्षा पर भी और व्यय करना होगा। उसका भौतिक बुनियादी ढांचा (जिसमें परिवहन और संचार शामिल हैं) उन्नत किए जाने की आवश्यकता है। मोदी द्वारा पहले कार्यकाल के आरंभ में पेंशन में इजाफा करने के बजाय पैसे को और अधिक समझदारी के साथ व्यय किया जा सकता था।
रक्षा क्षमता रातोरात नहीं विकसित हो सकती। इस काम में वर्षों लगते हैं। सन 1971 में भले ही जनरल सैम मॉनेक शॉ ने इंदिरा गांधी से कहा था कि वह हमेशा तैयार रहते हैं लेकिन हकीकत यह है कि भारत को युद्ध के लिए तैयार होने में नौ महीने का वक्त लगा था। इस दौरान भी जल्दबाजी में पूर्वी यूरोप जैसी जगहों से पुराने टैंक और अन्य सैन्य उपकरण खरीदने पड़े थे। सन 1962 में नेहरू ने घबराहट में अमेरिका के राष्ट्रपति केनेडी को पत्र लिखकर लड़ाकू विमानों के पूरे बेड़े की मांग की थी। छह दशक बाद भी सरकार हड़बड़ी में ही ऑर्डर कर कर रही है।
अपने पहले कार्यकाल के पहले वर्ष मोदी ने वादा किया था कि कुल रक्षा आपूर्ति में स्वदेशी उपकरणों की हिस्सेदारी 40 फीसदी से बढ़ाकर 70 फीसदी की जाएगी। वह नहीं हो पाया और अब एक बार फिर आत्मनिर्भरता की बात हो रही है। बतौर रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा था कि वह सेवा लायक सुखोई का प्रतिशत सुधार कर बेड़े के 50 फीसदी से 75 फीसदी करेंगे। खबरों के मुताबिक कुछ सुधार हुआ है लेकिन वह काफी कम है। निजी शिपयार्ड और विनिर्माताओं की बात करें तो इस क्षेत्र में भी इंतजार लंबा खिंच रहा है। ज्यादा रक्षा बजट और सशस्त्र बलों वाले चुनिंदा देशों में आयात निर्भरता के मामले में सऊदी अरब के आसपास है। यदि पर्याप्त समय लेकर बदला लेना है तो आयात प्रतिबंधों से परे जाकर लंबे समय से चली आ रही इन कमियों को दूर करना होगा।