5जी सेवाओं के व्यापक लाभ पाने के लिए आवश्यक है कि उच्च गति वाले वायरलेस उप नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाए तथा संसाधनों के स्तर पर साझेदारी का रुख अपनाया जाए। बता रहे हैं
भारतीय दूरसंचार विधेयक के मसौदे की व्याख्या करने वाले एक नोट में बताया गया है कि कैसे स्पेक्ट्रम आत्मा के समान है। अगर इस विचार को नियमन के एकीकृत रुख के साथ आगे बढ़ाया जाए तथा विखंडन से बचते हुए इसकी कार्यात्मकता पर जोर दिया जाए तो सेवाओं का काफी विस्तार हो सकता है क्योंकि लागत में कमी आएगी और विभिन्न चीजों की स्थापना करना आसान होगा। बहरहाल, सच यह है कि बीते एक दशक में नियामकीय माहौल भी बहुत सुसंगत नहीं रहा है।
5जी के साथ भारत के पास एक बार फिर यह अवसर है कि वह संसाधन साझा करने वाले रुख को अपनाएं। कुछ अन्य अधोसंरचनाओं के मामले में हम ऐसा कर चुके हैं। उदाहरण के लिए विमानन सेवाओं की बात करें तो वे वायु मार्ग और हवाई अड्डे साझा करती हैं जबकि वाहन और ट्रांसपोर्टर राजमार्गों और परिवहन सुविधाओं को साझा करते हैं।
इसी प्रकार पोत और नौवहन कंपनियां भी जलमार्ग तथा बंदरगाह साझा करती हैं। इसी प्रकार दूरसंचार के क्षेत्र में अधोसंरचना एवं स्पेक्ट्रम को साझा करने से 5जी के लिए पूंजी का किफायती इस्तेमाल सुनिश्चित हो सकेगा। इसके लिए छोटे सेल वाले एकीकृत नेटवर्क की आवश्यकता है जो 4जी के लिए भी काफी किफायती हैं।
काफी पूंजी निवेश वाले ऐसे बुनियादी ढांचे से सेवा प्रदाताओं और उपयोगकर्ताओं दोनों को लाभ होता है जो अधिकृत परिचालकों को सशुल्क पूरी पहुंच मुहैया कराते हैं।
दूरसंचार क्षेत्र विमानन और परिवहन की तुलना में अधिक विखंडित ढंग से उभरा है। दूरसंचार से इतर ये बाकी के क्षेत्र संसाधनों के किफायती इस्तेमाल के एकीकृत रुख के सिद्धांत के इर्दगिर्द एकजुट हुए हैं। दूरसंचार के इस प्रकार विकसित होने की एक वजह तकनीकी सीमा खासतौर पर बेतार हस्तक्षेप भी रहा है।
एक अन्य वजह विकसित बाजारों का रुख भी रहा है। खासतौर पर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप के बाजार। सन 1990 के दशक के बाद से ही इन बाजारों में विनियमन, निजीकरण, और प्रतिस्पर्धा को लेकर सम्मान का भाव आदि पैदा हुए हैं। इस बीच सोवियत संघ के विघटन ने मुक्त व्यापार के विचार की स्वीकार्यता को बढ़ावा दिया।
बहरहाल सरकारों के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रेरक स्पेक्ट्रम नीलामी से हासिल होने वाली राशि ही रही है। लोगों द्वारा सरकारी संग्रह को सार्वजनिक हित से असंबद्ध तरीके से जोड़े जाने ने इसमें और इजाफा कर दिया। 2000 के दशक में दूरसंचार क्षेत्र के पतन के बाद भी नीलामी को सही माना गया। कई वर्षों के बाद धीरे-धीरे इस क्षेत्र में सुधार हुआ। हालांकि सेवाएं दुनिया भर कमतर मानी जाती रहीं। यही कारण है कि अमेरिका सहित दुनिया भर में ब्रॉडबैंड नीति में हस्तक्षेप किए गए।
बहरहाल, चुनिंदा अपवादों को छोड़ दिया जाए तो संपत्ति के अधिकार की अवधारणा अभी भी स्पेक्ट्रम क्षेत्र में हावी है। यही वजह है कि वैकल्पिक रुखों पर बहुत कम ध्यान दिया जा रहा है जबकि सड़क, रेल, वायु एवं जल मार्गों तथा सुविधाओं को साझा करने को तकनीकी और आर्थिक रूप से व्यावहारिक पाया गया है।
इसके पीछे यही तर्क है कि ऊंची तयशुदा और परिचालन लागत को साझा करके क्षमता के इस्तेमाल का अधिकतम उपयोग किया जा सके। फिर चाहे यह समुदायों के हित में हो या देश के हित में। बेतार तकनीक और उपकरणों की साझेदारी को लेकर भी ऐसी ही ठोस वजह हैं। इस क्षेत्र में व्यापक स्पेक्ट्रम बैंड को छोटे इलाकों में इस्तेमाल किया जा सकता है तथा तकनीकी नवाचार को भी पहले की तुलना में काफी अलग ढंग से अपनाया जा सकता है। परंतु भारत में यह अभी भी बहुत स्वीकार्य नहीं है।
कुछ देशों खासकर उत्तरी यूरोप के देशों में इसका सफल क्रियान्वयन हुआ लेकिन यह ऐसे क्षेत्रों तक सीमित रह सकता है जहां सहयोगात्मक संस्कृति हो। इससे इतर स्थानों पर स्पेक्ट्रम पर साझा पहुंच को लेकर सरकारी नियंत्रण आजमाया गया। मैक्सिको, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका आदि इसके उदाहरण हैं। इनमें से किसी को कामयाबी नहीं मिली।
इसके विपरीत नेटवर्क और स्पेक्ट्रम पर निजी नियंत्रण अमेरिका और भारत समेत कई देशों में आजमाया गया। हालांकि अमेरिका तेजी से स्पेक्ट्रम के द्वितीयक इस्तेमाल और खुली पहुंच की ओर बढ़ रहा है। साझा इस्तेमाल का रुख एक और रास्ता है जहां एक सार्वजनिक संसाधन के रूप में स्पेक्ट्रम तक साझा पहुंच सार्वजनिक बेहतरी के लिए उपयोग की जा सकती है। वैसे ही जैसा कि विमान सेवाएं तथा अन्य अधोसंरचनाएं करती हैं।
सस्ते नेटवर्क के नए उदाहरण: यह बात उन शहरों केलिए जहां 5जी सेवाएं फाइबर ऑप्टिक कनेक्शन के साथ हैं और जिसे ग्रामीण इलाकों तक किबना फाइबर के विस्तारित किया जा सकता है। एक हालिया रिपोर्ट में सरकार की उस योजना के बारे में बताया गया जिसके तहत पटना को शहरों में 5जी की शुरुआत के मॉडल के रूप में पेश करना है।
शहर के मानचित्र को 200 वर्ग मीटर की ग्रिडों में बांटा गया ताकि जरूरी टॉवर संख्या का अनुमान लगाया जा सके। पाया गया कि अच्छी कवरेज के लिए टॉवरों की संख्या को दोगुना करके 3,000 से अधिक करना होगा। इस पर विचार हो रहा हो या नहीं लेकिन सरकार को यकीनन एक किफायती वायरलेस तरीके पर विचार करना होगा जो टावर और फाइबर की तुलना में किफायती हो।
5जी सेवाओं के लिए उपकरण बनाने वाली एक कंपनी के मुताबिक 400 वर्ग किलोमीटर में 10 लाख 5जी उपभोक्ताओं को सेवा देने के लिए तीन किलोमीटर की षटकोणीय सेल्स का इस्तेमाल करना होगा और 60 रेडियो और 50 नोड स्विच के साथ 23 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को कवर करना होगा। इन्हें मौजूदा टॉवर्स, इमारतों आदि पर लगाया जा सकता है।
इसके लिए हमारी 4जी और 5जी नेटवर्क नीतियों में अहम बदलाव की जरूरत होगी। नियमन में निम्न लिखित बदलावों की आवश्यकता है: अधिकृत परिचालकों को वी बैंड (60 गीगाहर्ट्ज) तथा ई बैंड (70-80 गीगाहर्ट्ज) में बहु गीगाबिट परिवहन की इजाजत दी जाए वह भी वास्तविक उपयोग शुल्क के आधार पर। 2.16 गीगाहर्ट्ज की चैनल विड्थ (फिलहाल ई-बैंड के लिए केवल 250 मेगा हर्ट्ज) और चैनल एकीकरण किया जाए ताकि बहु गीगाबिट प्रवाह क्षमता बन सके। 6 गीगाहर्ट्ज और 60 गीगाहर्ट्ज बैंड में वाई-फाई को इजाजत मिले।
भारत की जरूरत के अनुसार इन बैंड के लिए अमेरिकी नियमन का पालन करें जैसा कि अक्टूबर 2018 में 5 गीगाहर्ट्ज के लिए किया गया।
इन बदलावों को तत्काल लागू किया जाए। तेज मंजूरी और तीव्र कदमों पर जोर देने की जरूरत है क्योंकि पहले ही काफी देरी हो चुकी है।
हमारी जरूरत वी और ई बैंड में उच्च गति वाले वायरलेस के नियमन की है। जैसा कि हमने ऊपर कहा, कम टावरों और फाइबर के इस्तेमाल से लागत और स्थापना की कठिनाई कम की जा सकती है। सरकार को इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए।