भारत में कई दशकों से 1 करोड़ रुपये की रकम को रिटायरमेंट का एक जादुई आंकड़ा माना जाता रहा है। हर कमाने वाले व्यक्ति के मन में यह बात घर कर चुकी थी कि अगर जीवन में एक बार 1 करोड़ रुपये का बैंक बैलेंस या इन्वेस्टमेंट बन गया, तो बुढ़ापे की जिंदगी आराम से कट जाएगी। लेकिन बदलती अर्थव्यवस्था, तेजी से बढ़ती महंगाई और मेडिकल खर्चों के दौर में फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह 1 करोड़ रुपये का बेंचमार्क अब अब पहले जितना पर्याप्त या व्यावहारिक नहीं रह गया है।
आज के समय में रिटायरमेंट की प्लानिंग सिर्फ किसी एक तय रकम के भरोसे नहीं की जा सकती। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि देश के प्रमुख एसेट मैनेजर्स और फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स इस बारे में क्या राय रखते हैं और क्यों अब हर व्यक्ति को अपनी रिटायरमेंट की प्लानिंग नए सिरे से तैयार करने की जरूरत है।
₹1 करोड़ का आंकड़ा अब पुराना क्यों पड़ गया?
करीब 15 से 20 साल पहले रिटायरमेंट के लिए 1 करोड़ रुपये का लक्ष्य लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हो गया था। गोल आंकड़े लोगों को आसानी से याद रह जाते हैं, इसलिए यह सोच भी तेजी से आम हो गई। हालांकि, नुवामा वेल्थ मैनेजमेंट के प्रेसिडेंट और हेड राहुल जैन का कहना है कि आज के समय में यह बेंचमार्क लोगों को सिर्फ झूठी तसल्ली देता है।
राहुल जैन के मुताबिक, भारत में सामान्य महंगाई भले ही 5 से 6 प्रतिशत के आसपास हो, लेकिन हेल्थकेयर से जुड़ी महंगाई 12 से 14 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यानी इलाज का खर्च सामान्य महंगाई के मुकाबले करीब दोगुनी से तिगुनी रफ्तार से बढ़ रहा है। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद अगर कोई गंभीर बीमारी या मेडिकल इमरजेंसी आ जाए, तो जीवनभर की जमा पूंजी भी कम समय में खत्म हो सकती है।
इसके अलावा, लोगों की औसत उम्र भी पहले के मुकाबले बढ़ गई है। पहले रिटायरमेंट के बाद लोग 10 से 15 साल तक जीने का अनुमान लगाते थे, लेकिन अब 60 साल की उम्र में रिटायर होने वाला व्यक्ति आसानी से 80 से 85 साल या उससे भी अधिक उम्र तक जी सकता है।
इस मुद्दे पर Dezerv के को-फाउंडर संदीप जेठवानी का कहना है कि बड़े शहरों में रहने वाले मध्य और उच्च वर्ग के परिवारों के लिए 1 करोड़ रुपये की अहमियत अब काफी कम हो गई है। उनके मुताबिक, अगर किसी परिवार का मासिक खर्च 2 लाख रुपये है, तो रिटायरमेंट के बाद 1 करोड़ रुपये का कॉर्पस उनके करीब एक साल के खर्च के लिए भी पर्याप्त नहीं होगा।
जेठवानी के मुताबिक, अमीर और बड़े शहरों में रहने वाले परिवारों का लाइफस्टाइल खर्च हर साल करीब 9 प्रतिशत की दर से बढ़ता है। इस हिसाब से करीब हर 8 साल में उनके रोजमर्रा के खर्च लगभग दोगुने हो जाते हैं। ऐसे में 20 से 30 साल लंबे रिटायरमेंट के लिए पुराने हिसाब-किताब पर भरोसा करना नुकसानदायक साबित हो सकता है।
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रिटायरमेंट कॉर्पस का हिसाब लगाने का सही तरीका क्या है?
फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का कहना है कि रिटायरमेंट प्लानिंग के लिए कोई एक तय फॉर्मूला या ‘थम्ब रूल’ नहीं हो सकता, क्योंकि हर व्यक्ति की जरूरतें और आर्थिक स्थिति अलग होती हैं।
आनंद राठी वेल्थ के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर शुभेंदु हरिचंदन का कहना है कि रिटायरमेंट के लिए कोई भी लक्ष्य बिना सोचे-समझे तय नहीं करना चाहिए। उनके मुताबिक, सबसे पहले यह हिसाब लगाना चाहिए कि रिटायरमेंट के बाद हर महीने कितने पैसों की जरूरत होगी। इसके बाद उसी के आधार पर यह तय करना चाहिए कि रिटायरमेंट तक कुल कितना कॉर्पस तैयार करना है।
हरिचंदन के मुताबिक, रिटायरमेंट की योजना बनाते समय हर व्यक्ति को अपनी जीवनशैली, जिस शहर में वह रहता है वहां का खर्च, भविष्य में होने वाले मेडिकल खर्च, रिटायरमेंट की उम्र, परिवार की मेडिकल हिस्ट्री और बच्चों से जुड़ी जिम्मेदारियों जैसे पहलुओं को ध्यान में रखना चाहिए।
इस बात को आसान तरीके से समझाते हुए Wise Finserv ग्रुप के CEO और CIO अजय कुमार यादव एक उदाहरण देते हैं। उनके मुताबिक, अगर आज 40 साल का कोई व्यक्ति हर महीने 1 लाख रुपये खर्च करता है और 60 साल की उम्र में रिटायर होने की योजना बना रहा है, तो उसे अपनी रिटायरमेंट की जरूरतों का हिसाब उसी आधार पर लगाना चाहिए।
अजय कुमार यादव के मुताबिक:
- अगर रिटायरमेंट से पहले महंगाई की औसत दर 6 प्रतिशत मानी जाए, तो 40 साल का वह व्यक्ति 20 साल बाद यानी 60 साल की उम्र में अपनी मौजूदा जीवनशैली बनाए रखने के लिए हर महीने करीब 3.21 लाख रुपये या सालाना 38.49 लाख रुपये की जरूरत होगी।
- अगर रिटायरमेंट के बाद निवेश पर 7 प्रतिशत का रिटर्न मिले और महंगाई की दर 5 प्रतिशत रहे, यानी वास्तविक (रियल) रिटर्न करीब 2 प्रतिशत हो, तो 90 साल की उम्र तक के 30 साल के रिटायरमेंट खर्च के लिए उस व्यक्ति के पास 60 साल की उम्र में करीब 8.68 करोड़ रुपये का कॉर्पस होना चाहिए।
- अगर फाइनेंशियल प्लानिंग में इस्तेमाल होने वाले सामान्य 30X नियम को आधार माना जाए, यानी रिटायरमेंट के पहले साल के कुल खर्च का 30 गुना कॉर्पस तैयार किया जाए, तो इस उदाहरण में जरूरी पैसा बढ़कर करीब 11.55 करोड़ रुपये हो जाता है।
यादव के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति 60 साल की उम्र में 1 करोड़ रुपये के कॉर्पस के साथ रिटायर होता है और उसे हर महीने 1 लाख रुपये की जरूरत पड़ती है, तो महंगाई को समायोजित करने के बाद 2 प्रतिशत के वास्तविक रिटर्न के आधार पर उसका यह पूरा फंड करीब 9.1 साल में खत्म हो सकता है।
रिटायरमेंट के बाद कैसा होना चाहिए पोर्टफोलियो?
एक्सपर्ट्स का कहना है कि रिटायरमेंट के बाद पूरी रकम सिर्फ बैंक FD या सुरक्षित सरकारी योजनाओं में निवेश करना सही रणनीति नहीं है। ऐसा करने पर निवेश से मिलने वाला रिटर्न महंगाई की रफ्तार से पीछे रह सकता है। इसलिए वे सलाह देते हैं कि रिटायरमेंट के पैसे को अलग-अलग हिस्सों यानी ‘बकेट’ में बांटकर निवेश किया जाए।
अजय कुमार यादव और शुभेंदु हरिचंदन के मुताबिक, रिटायरमेंट पोर्टफोलियो को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा जा सकता है:
- रेगुलर इनकम बकेट (सुरक्षा और दैनिक खर्च): इस हिस्से का उद्देश्य रोजमर्रा के खर्चों के लिए नियमित आय सुनिश्चित करना है। इस रकम को SCSS, RBI फ्लोटिंग रेट बॉन्ड्स, पोस्ट ऑफिस की योजनाओं और डेट फंड्स में रखा जा सकता है। शुभेंदु हरिचंदन के मुताबिक, कम से कम एक साल के खर्च के बराबर का पैसा FD या लिक्विड फंड जैसे पूरी तरह आसान विकल्पों में रखनी चाहिए।
- सपोर्ट बकेट (मध्यम अवधि और बैकअप): यह हिस्सा पोर्टफोलियो को स्थिरता और संतुलित बढ़त देने का काम करता है। इसमें बैलेंस्ड एडवांटेज फंड्स, मल्टी एसेट एलोकेशन और कंजर्वेटिव हाइब्रिड फंड्स जैसे विकल्प शामिल किए जा सकते हैं। जरूरत पड़ने पर इस हिस्से से SWP के जरिए पैसा निकाला जा सकता है।
- ग्रोथ बकेट (लंबी अवधि की बढ़त): रिटायरमेंट के बाद भी महंगाई से मुकाबला करने के लिए पोर्टफोलियो का एक हिस्सा फ्लेक्सी कैप या मल्टी कैप जैसे इक्विटी फंड्स में निवेशित रखना चाहिए, ताकि लंबे समय में पूंजी बढ़ती रहे।
जेठवानी के मुताबिक, रिटायरमेंट के दिन ही पूरी रकम निकालकर सुरक्षित डेट एसेट्स में निवेश कर देना एक बड़ी गलती हो सकती है। उनके मुताबिक, 30 साल जैसे लंबे समय में महंगाई एक बड़ा जोखिम बन सकती है। अगर कोई व्यक्ति शेयर बाजार के डर से पूरी तरह कम जोखिम वाले निवेश को अपना लेता है, तो लंबे समय में उसके पैसे खत्म होने का खतरा बढ़ सकता है।
भारतीय निवेशक अक्सर कौन सी बड़ी गलतियां करते हैं?
रिटायरमेंट प्लानिंग में भारतीय निवेशकों की गलतियों को लेकर सभी एक्सपर्ट्स की राय लगभग एक जैसी है। उनका मानना है कि लोग अक्सर कुछ आम गलतियां करते हैं, जिनसे भविष्य की आर्थिक योजनाएं प्रभावित हो सकती है।
- मेडिकल महंगाई का कम आकलन: ज्यादातर लोग रिटायरमेंट प्लानिंग में 5-6 प्रतिशत सामान्य महंगाई को ही ध्यान में रखते हैं, जबकि हेल्थकेयर खर्चों में 12-14 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी को नजरअंदाज कर देते हैं।
- एक तय आंकड़े पर निर्भर रहना: कई लोग पुराने 1 करोड़ या 2 करोड़ रुपये जैसे गोल आंकड़ों को ही रिटायरमेंट का लक्ष्य मान लेते हैं, जबकि इसे अपनी वास्तविक जरूरतों और खर्चों के हिसाब से तय करना चाहिए।
- SIP को ही पूरी योजना मान लेना: राहुल जैन के मुताबिक, सिर्फ SIP शुरू कर देना ही पूरी रिटायरमेंट प्लानिंग नहीं होती। SIP बचत की अच्छी आदत जरूर है, लेकिन अगर निवेश की राशि और एसेट एलोकेशन सही नहीं है, तो यह तय लक्ष्य तक पहुंचने में मददगार नहीं होगी।
- सैलरी बढ़ने पर निवेश न बढ़ाना: कई लोग आय बढ़ने के बाद भी पुरानी SIP ही जारी रखते हैं और समय-समय पर अपने निवेश पोर्टफोलियो की समीक्षा नहीं करते।
- टैक्स और जीवनसाथी की लंबी उम्र को नजरअंदाज करना: कई लोग रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली आय पर लगने वाले टैक्स को अपनी योजना में शामिल नहीं करते। इसके अलावा, महिलाएं आमतौर पर पुरुषों से अधिक समय तक जीवित रहती हैं, इसलिए जीवनसाथी के लिए अलग सुरक्षा फंड की व्यवस्था करना भी जरूरी है।
- रहने वाले घर को रिटायरमेंट फंड मानना: अजय कुमार यादव के मुताबिक, जिस घर में व्यक्ति खुद रहता है, उसे रिटायरमेंट कॉर्पस का हिस्सा नहीं मानना चाहिए, क्योंकि वह नियमित आय या कैश-फ्लो नहीं देता।
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30, 40 और 50 की उम्र में क्या रणनीति अपनाएं?
रिटायरमेंट की योजना हर उम्र के हिसाब से अलग होनी चाहिए। एक्सपर्ट्स ने अलग-अलग आयु वर्ग के लोगों के लिए कुछ जरूरी रणनीतियां बताई हैं:
30 का दशक (30s): समय और कंपाउंडिंग की ताकत
- राहुल जैन और शुभेंदु हरिचंदन के मुताबिक, 30 की उम्र में निवेशकों के पास सबसे बड़ा फायदा समय का होता है। इस दौर में पोर्टफोलियो का करीब 80 प्रतिशत हिस्सा इक्विटी में रखा जा सकता है, ताकि लंबे समय में कंपाउंडिंग का फायदा मिल सके।
- जेठवानी के मुताबिक, 30 की उम्र में निवेश शुरू करने वालों को Step-up SIP का फायदा उठाना चाहिए। उदाहरण के तौर पर, 30 साल की उम्र में अगर कोई व्यक्ति 20,000 रुपये प्रति माह की SIP करता है और उसे 12 प्रतिशत रिटर्न मिलता है, तो 60 साल तक यह करीब 7 करोड़ रुपये का फंड बना सकती है। वहीं, अगर हर साल SIP राशि में 10 प्रतिशत की बढ़ोतरी की जाए, तो यही कॉर्पस बढ़कर करीब 17.5 करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है।
- इस उम्र में ही पर्याप्त हेल्थ इंश्योरेंस कवर लेना बेहतर होता है, क्योंकि 50 साल की उम्र के बाद मेडिकल इंश्योरेंस लेना महंगा हो सकता है और इसमें कई मुश्किलें भी आ सकती हैं।
40 का दशक (40s): वास्तविकता और सुधार का समय
- राहुल जैन के मुताबिक, 40 की उम्र में अनुमान के बजाय वास्तविक आंकड़ों के आधार पर रिटायरमेंट प्लानिंग करनी चाहिए। इस समय अपने मौजूदा खर्चों और भविष्य में जरूरी कॉर्पस के बीच के अंतर को पहचानना जरूरी है।
- अजय कुमार यादव के मुताबिक, 40 की उम्र में बच्चों की पढ़ाई, होम लोन और दूसरी आर्थिक जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। इसके बावजूद रिटायरमेंट फंड के लिए अलग से निवेश करना जरूरी है।
- जेठवानी के मुताबिक, अगर कोई व्यक्ति 40 साल की उम्र में 7 करोड़ रुपये का रिटायरमेंट कॉर्पस बनाना चाहता है, तो 10 प्रतिशत Step-up SIP की मदद से वह करीब 35,000 रुपये प्रति माह से निवेश की शुरुआत कर अपने लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
50 का दशक (50s): सुरक्षा और यथार्थवादी सोच
- राहुल जैन और अजय कुमार यादव के मुताबिक, 50 की उम्र में अगर रिटायरमेंट फंड में कमी रह गई है, तो उसे पूरा करने के लिए स्मॉलकैप या बहुत ज्यादा जोखिम वाले निवेश विकल्पों का सहारा नहीं लेना चाहिए। ऐसा करना भविष्य में बड़ा नुकसान पहुंचा सकता है।
- इस उम्र में बचत की दर बढ़ाने, ज्यादा ब्याज वाले कर्जों को खत्म करने और जरूरत पड़ने पर 2-3 साल तक अतिरिक्त काम करने जैसे विकल्पों पर विचार करना फायदेमंद हो सकता है।
- रिटायरमेंट से करीब 5 साल पहले ही लिक्विडिटी और नियमित आय की योजना तैयार कर लेनी चाहिए। तीन अलग-अलग हिस्सों में पैसों को बांटना बेहतर होता है, ताकि बाजार में उतार-चढ़ाव का असर रोजमर्रा के खर्चों पर न पड़े।
First Published - August 4, 2026 | 6:39 PM IST
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