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Middle East Crisis: क्या युद्ध के बीच आपका ट्रैवल इंश्योरेंस काम आएगा? जानें ‘वॉर क्लॉज’ का पूरा सच

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मिडिल ईस्ट तनाव से हजारों उड़ानें रद्द होने के बीच 'वॉर क्लॉज' के कारण ट्रैवल इंश्योरेंस क्लेम फंस रहे हैं। जानें पॉलिसी की शर्तें और यात्रियों के अधिकार

Last Updated- March 04, 2026 | 7:51 AM IST
travel insurance
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

मिडिल ईस्ट (पश्चिम एशिया) में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसी स्थिति ने अंतरराष्ट्रीय हवाई यात्रा को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है। हजारों यात्री अलग-अलग देशों के एयरपोर्ट्स पर फंसे हुए हैं और उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि क्या उनका ट्रैवल इंश्योरेंस इस मुश्किल घड़ी में उनका साथ देगा? हकीकत यह है कि ज्यादातर स्टैंडर्ड ट्रैवल इंश्योरेंस पॉलिसियों में ‘वॉर क्लॉज’ (युद्ध संबंधी शर्त) होता है, जिसकी वजह से युद्ध के कारण हुए नुकसान की भरपाई बीमा कंपनियां नहीं करती हैं।

मौजूदा संकट की वजह से दुनिया भर में अब तक 3,000 से ज्यादा उड़ानें रद्द हो चुकी हैं। भारत की बात करें तो दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े एयरपोर्ट्स से ही करीब 150 से ज्यादा उड़ानें कैंसिल हुई हैं। ऐसे में यात्री होटल के खर्च, खाने-पीने और री-बुकिंग की फीस को लेकर परेशान हैं।

इंश्योरेंस में ‘वॉर क्लॉज’ का पेंच

ज्यादातर ट्रैवल इंश्योरेंस पॉलिसियों के बारीक अक्षरों में यह साफ लिखा होता है कि युद्ध, आक्रमण, विद्रोह या विदेशी दुश्मनों की कार्रवाई से होने वाले नुकसान को कवर नहीं किया जाएगा।

के ट्रैवल इंश्योरेंस हेड मीत कपाड़िया के मुताबिक, अभी पश्चिम एशिया में जो हालात हैं, उन्हें युद्ध जैसी स्थिति माना जा रहा है। ऐसे में ट्रैवल इंश्योरेंस आमतौर पर यात्रा रुकने या युद्ध से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं का खर्च कवर नहीं करता। हां, अगर कोई सामान्य बीमारी या स्वास्थ्य समस्या है और उसका युद्ध से कोई संबंध नहीं है, तो कुछ कंपनियां उसका क्लेम स्वीकार कर सकती हैं।

इसे एक उदाहरण से समझें: अगर खाड़ी देश में रहने वाले किसी भारतीय नागरिक की मृत्यु हार्ट अटैक से होती है और उसका मौजूदा युद्ध से कोई संबंध नहीं है, तो इंश्योरेंस कंपनी उस दावे को स्वीकार कर सकती है, बशर्ते पॉलिसी में उस देश को बाहर न रखा गया हो।

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कब और कैसे मिल सकती है मदद?

भले ही युद्ध की सीधी मार पर बीमा न मिले, लेकिन स्टेवेल हेल्थ (Staywell.Health) के को-फाउंडर अरुण रामचंद्रन का मानना है कि एयरलाइंस के परिचालन संबंधी फैसलों (Operational Decisions) के आधार पर क्लेम मिल सकता है।

सामान्य परिस्थितियों में इंश्योरेंस इन चीजों में मददगार हो सकता है:

  • ट्रिप में देरी: अतिरिक्त ठहरने, खाने और स्थानीय परिवहन का खर्च।
  • कनेक्टिंग फ्लाइट छूटना: पॉलिसी की शर्तों के अनुसार री-बुकिंग में मदद।
  • 24/7 सहायता: नई यात्रा व्यवस्था करने या ग्राउंड को-ऑर्डिनेशन के लिए।
  • इमरजेंसी मेडिकल: विदेश यात्रा के दौरान अचानक बीमारी या दुर्घटना के मामले में निकासी (Evacuation) की सुविधा।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर एयरलाइन अपनी मर्जी से फ्लाइट रद्द करती है या रूट बदलती है, तो इसे एक परिचालन समस्या माना जा सकता है, जिससे यात्रियों को बीमा कवर मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

पॉलिसी लेते समय इन बातों का रखें ध्यान

फिनहाट (Finhaat) के को-फाउंडर और CFO संदीप कटियार ने उन लोगों के लिए कुछ सुझाव दिए हैं जो हाई-रिस्क वाले इलाकों में यात्रा कर रहे हैं या वहां रह रहे हैं:

  1. एक्सक्लूजन (Exclusions) को ध्यान से पढ़ें: यह देखें कि युद्ध, आतंकवाद या हाई-रिस्क जॉब्स को लेकर पॉलिसी में क्या लिखा है।
  2. टेरिटोरियल लिमिट: चेक करें कि क्या आपकी पॉलिसी भारत के बाहर भी मान्य है।
  3. स्पेशल कवर: क्या आपने एक्सीडेंटल डेथ या आतंकवाद के लिए अलग से एड-ऑन लिया है?
  4. रेड फ्लैग पहचानें: अगर पॉलिसी में ‘Acts of War’ या ‘Civil Commotion’ जैसे शब्द लिखे हैं, तो समझ लें कि वहां आपको कवर नहीं मिलेगा।

जो लोग इन संवेदनशील इलाकों में काम कर रहे हैं, उन्हें ऐसी ग्लोबल लाइफ इंश्योरेंस पॉलिसी लेनी चाहिए जो संघर्ष वाले क्षेत्रों को भी कवर करती हो।

एयरलाइंस पर आर्थिक बोझ और लंबी उड़ानें

मिडिल ईस्ट का हवाई क्षेत्र बंद होने से उड़ानों पर सीधा असर पड़ा है। कई फ्लाइट्स अब लंबा रास्ता लेकर जा रही हैं, जिससे यात्रा का समय और किराया दोनों बढ़ सकते हैं।

Air India और IndiGo जैसी एयरलाइंस यात्रियों को टिकट रिफंड या री-बुकिंग की सुविधा तो दे रही हैं, लेकिन होटल, टूर या आगे की यात्रा के खर्च की भरपाई नहीं कर रही हैं।

खतरे वाले इलाकों से बचने के लिए फ्लाइट्स को 2–3 घंटे ज्यादा उड़ान भरनी पड़ रही है। इससे ईंधन की खपत बढ़ रही है और एयरलाइंस का खर्च भी ऊपर जा रहा है। अगर हालात लंबे समय तक ऐसे ही रहे, तो भारतीय एयरलाइंस को भारी राजस्व नुकसान झेलना पड़ सकता है।

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First Published - March 4, 2026 | 7:51 AM IST

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