अगर आप कोई पुरानी प्रॉपर्टी यानी घर या जमीन बेचने का मन बना रहे हैं या हाल ही में बेची है, तो यह खबर आपके लिए बेहद काम की है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड (CBDT) ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए नया कॉस्ट इन्फ्लेशन इंडेक्स यानी CII नंबर जारी कर दिया है। सरकार ने इस बार इसे बढ़ाकर 384 तय किया है, जो पिछले वित्त वर्ष 2025-26 में 376 था। यह नया इंडेक्स 1 अप्रैल 2026 से लागू हो रहा है। आसान शब्दों में कहें तो इस नंबर का इस्तेमाल लोग अपने प्रॉपर्टी की खरीद लागत को महंगाई के हिसाब से बढ़ाकर दिखाने के लिए करते हैं, जिससे उनका कैपिटल गेंस कागजों में कम हो जाता है और उन्हें कम टैक्स देना पड़ता है।
लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि फाइनेंस एक्ट 2024 में हुए बड़े बदलावों के बाद अब इंडेक्सेशन का यह फायदा हर किसी को और हर संपत्ति पर नहीं मिलने वाला है।
कई लोगों के मन में यह सवाल होता है कि आखिर यह इंडेक्स काम कैसे करता है। दरअसल, जब आप सालों पहले खरीदी गई कोई संपत्ति आज के समय में बेचते हैं, तो उसकी पुरानी कीमत आज के हिसाब से काफी कम होती है। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट हर साल महंगाई के असर को ध्यान में रखते हुए एक CII नंबर देता है।
इसके जरिए आपकी प्रॉपर्टी की पुरानी खरीद कीमत को आज के हिसाब से बढ़ा दिया जाता है। जब खरीद की लागत कागजों पर बढ़ जाती है, तो कुल मुनाफा कम दिखता है। मुनाफा कम होने का सीधा मतलब है कि आपको टैक्स भी कम भरना पड़ता है। वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सरकार ने इसे 376 से बढ़ाकर 384 कर दिया है।
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टैक्स एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस नए CII नंबर का फायदा अब बहुत सीमित लोगों को ही मिलेगा। सिंघानिया एंड कंपनी की पार्टनर रितिका नय्यर का कहना है कि बढ़ा हुआ CII नंबर मुख्य रूप से उन भारतीय निवासियों और हिंदू अविभाजित परिवारों (HUFs) के काम आएगा, जो 23 जुलाई 2024 से पहले खरीदी गई जमीन या मकान को बेच रहे हैं।
रितिका नय्यर के मुताबिक, 23 जुलाई 2024 से पहले खरीदी गई प्रॉपर्टी के मामले में टैक्सपेयर्स के पास दो विकल्प हैं। वे या तो बिना इंडेक्सेशन के 12.5 प्रतिशत की दर से टैक्स चुका सकते हैं, या फिर इंडेक्सेशन का फायदा उठाकर 20 प्रतिशत की दर से टैक्स दे सकते हैं।
नया CII नंबर 384 होने की वजह से पुरानी संपत्तियों की खरीद लागत काफी बढ़ जाएगी, जिससे 20 फीसदी वाला विकल्प चुनकर लोग अपना टैक्स काफी हद तक बचा सकते हैं। एक्सपर्ट की सलाह है कि रिटर्न फाइल करने से पहले दोनों तरीकों से टैक्स का हिसाब लगा लेना चाहिए।
नए नियम लागू होने के बाद कई तरह की संपत्तियों और निवेशकों के लिए इंडेक्सेशन का फायदा खत्म कर दिया गया है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर आपने 23 जुलाई 2024 या उसके बाद कोई मकान या जमीन खरीदी है, तो उस पर आपको इंडेक्सेशन का फायदा नहीं मिलेगा।
इसके अलावा, अब सोना, डेट म्यूचुअल फंड और अनलिस्टेड शेयर बेचने पर भी इंडेक्सेशन का फायदा नहीं मिलता। इन निवेशों से होने वाले मुनाफे पर बिना इंडेक्सेशन के सीधे 12.5% टैक्स देना होता है। वहीं, NRI और कॉर्पोरेट टैक्सपेयर्स को भी पुरानी अचल संपत्ति बेचने पर मिलने वाले इंडेक्सेशन के इस फायदे से बाहर कर दिया गया है।
डी.एम. हरीश एंड कंपनी LLP की एडवोकेट मृगाक्षी जोशी का कहना है कि एलिजिबल भारतीय निवासियों और HUF के लिए सही तरीका चुनना बहुत फायदेमंद साबित हो सकता है। उनके अनुसार, एलिजिबल लोग दो तरीकों से टैक्स कैलकुलेट कर सकते हैं:
मृगाक्षी जोशी ने साफ किया कि यह छूट और दोनों में से एक रास्ता चुनने की आजादी केवल भारत में रहने वाले नागरिकों और HUF के लिए है। अगर कोई NRI (Non-Resident) भारत में अपनी जमीन या मकान बेचता है, तो उसे सीधे 12.5 फीसदी ही टैक्स देना होगा, उनके पास इंडेक्सेशन का विकल्प नहीं है। हालांकि, कौन सा विकल्प बेहतर रहेगा, यह बात इस पर निर्भर करेगी कि संपत्ति किस साल खरीदी गई थी, उसकी लागत क्या थी और वह कितने में बिक रही है।
अगर आप सोच रहे हैं कि इंडेक्सेशन लगाकर कागजों पर घाटा (Capital Loss) दिखाकर टैक्स बचा लेंगे, तो ऐसा संभव नहीं है। मृगाक्षी जोशी ने इस पर एक अहम शर्त की ओर इशारा किया है। उन्होंने सचेत किया है कि यदि इंडेक्सेशन लागू करने के बाद कागजों पर आपकी प्रॉपर्टी में नुकसान या घाटा दिखाई देता है, तो उस लॉस को आप आगे के सालों के लिए कैरी फॉरवर्ड नहीं कर सकते और न ही किसी दूसरे कैपिटल गेन के खिलाफ एडजस्ट कर सकते हैं। यानी कागजी नुकसान दिखाकर आप अलग से कोई अतिरिक्त फायदा नहीं उठा पाएंगे।
अक्सर देखा जाता है कि जानकारी के अभाव में लोग टैक्स भरते समय कई तरह की चूक कर बैठते हैं, जिससे बाद में नोटिस आने का डर रहता है। रितिका नय्यर के मुताबिक, सबसे बड़ी गलती उन एसेट्स पर इंडेक्सेशन मांगना है जो नए कानून के तहत अब इसके दायरे में आते ही नहीं हैं।
इसके अलावा, लोग अक्सर 1 अप्रैल 2001 की फेयर मार्केट वैल्यू (FMV) का सही इस्तेमाल करना भूल जाते हैं। कई लोग 20 फीसदी (इंडेक्सेशन के साथ) और 12.5 फीसदी (बिना इंडेक्सेशन) दोनों तरीकों से टैक्स का सही मिलान किए बिना ही रिटर्न भर देते हैं। मकान की मरम्मत और उसकी बेहतरी में हुए खर्च के बिल संभालकर न रखना भी एक बड़ी भूल है। एक्सपर्ट्स की सलाह है कि विवादों और इनकम टैक्स के नोटिस से बचने के लिए रिटर्न फाइल करने से पहले अपने प्रॉपर्टी ट्रांजैक्शन की पूरी जानकारी को AIS (Annual Information Statement) से अच्छी तरह मैच करा लें।