विधानसभा चुनावों के निर्णायक नतीजों के चलते ब्रोकरेज फर्मों ने बाजारों को लेकर मोटे तौर पर सकारात्मक रुख़ अपनाया है। उन्हें उम्मीद है कि नीतियां जारी रहेंगी और राजनीतिक स्थिरता बढ़ेगी। हालांकि वैश्विक चुनौतियां और आर्थिक जोखिम निकट भविष्य के परिदृश्य को धुंधला करते रह सकते हैं।
विश्लेषकों का कहना है कि इस फैसले को अलग-थलग राजनीतिक घटना के तौर पर कम बल्कि केंद्र और अहम राज्यों के बीच मजबूत होते तालमेल के संकेत के तौर पर ज्यादा देखा जा रहा है। यह ऐसी बात है, जो सुधारों और इन्फ़्रास्ट्रक्चर खर्च बनाए रखने में मददगार हो सकती है। दूसरी ओर, निवेशक तेल की कीमतों से लेकर मुद्रा पर पड़ने वाले दबाव को लेकर अब भी सतर्क बने हुए हैं। मोतीलाल ओसवाल ने कहा कि इन नतीजों से सत्ताधारी गठबंधन की नीतियों की दिशा पर भरोसा और मजबूत हुआ है।
ब्रोकरेज फर्म ने कहा, कई राज्यों के चुनावों के नतीजों को बाजार सकारात्मक नजर से देखेगा. इसलिए नहीं कि इनसे प्रगतिशील बदलाव का संदेश मिलता है बल्कि इसलिए कि इनसे नीतियों में निरंतरता की उम्मीद जगती है। सत्ताधारी राजग की स्थिति अब और भी मजबूत हो गई है और 2024 के लोकसभा चुनावों में किसी धक्के को लेकर जो थोड़ी-बहुत आशंकाएं या चिंताएं थीं, वे अब पूरी तरह दूर हो गई हैं।
इन नतीजों का संबंधित राज्यों की आर्थिक विकास दर पर लंबे समय तक असर रहेगा, खासकर पश्चिम बंगाल के लिए, जहां बहुत बड़ा बदलाव हुआ है, जिसका असर आने वाले कई सालों तक दिखेगा। एक बार जब बाजार इन नतीजों को पूरी तरह से समझ लेगा और इनके सकारात्मक असर को अच्छी तरह से भांप लेगा, तो उसका ध्यान तुरंत ही पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध और वित्त वर्ष 2026 की चौथी तिमाही के नतीजों के सीजन जैसी तात्कालिक घटनाओं की ओर मुड़ जाएगा।
अर्थशास्त्रियों ने यह भी बताया कि मजबूत राजनीतिक जनादेश भारत के जोखिम प्रीमियम से जुड़ी चिंताओं को कुछ हद तक कम कर सकता है, खासकर ऐसे समय जब वैश्विक अनिश्चितताएं अभी भी बनी हुई हैं। नोमूरा के अनुसार, यह जनादेश निवेशकों के भरोसे को मजबूती दे सकता है। हालांकि उसने ईंधन की कीमतों से जुड़े संभावित नीतिगत फैसलों को अहम निगरानी योग्य पहलू के तौर पर बताया है।
नोमूरा की मुख्य अर्थशास्त्री (भारत और एशिया – जापान को छोड़कर) सोनल वर्मा ने कहा कि भाजपा की राजनीतिक पकड़ मजबूत होने से भारत का राजनीतिक जोखिम प्रीमियम थोड़ा कम हो सकता है, खासकर ऊर्जा संकट के इस दौर में। अब जब राज्यों के चुनाव खत्म हो गए हैं तो बाजार पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर आशंकित हैं। हालांकि हमारी राय में यह अभी पूरी तरह से तय नहीं है।
घरेलू राजनीति से परे आर्थिक रणनीतिकारों ने इस बात पर जोर दिया कि बाजार वैश्विक घटनाक्रम, विशेष रूप से कच्चे तेल की कीमतों, मुद्रा की चाल और पूंजी की आवक, से काफी हद तक प्रभावित रहते हैं। ग्रुप रिसर्च की वरिष्ठ अर्थशास्त्री और कार्यकारी निदेशक राधिका राव ने कई ऐसे जोखिम कारकों की ओर इशारा किया, जो निकट भविष्य में बाजार की दिशा तय कर सकते हैं।
चुनाव नतीजों के अलावा, बाजार घरेलू खुदरा ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना पर भी नजर रखे हुए हैं क्योंकि ब्रेंट की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। पेट्रोल कीमतें आखिरी बार मार्च 2022 में बढ़ाई गई थीं। इसके बाद मई 2022 में एक्साइज ड्यूटी में कटौती हुई और मार्च 2024 में कीमतों में एक बार और कमी की गई। रुपये की परिसंपत्ति का बाजार अभी भी वैश्विक घटनाक्रमों से जुड़ा है, खासकर अमेरिका-ईरान बातचीत में किसी ठोस प्रगति की कमी और होर्मुज के फिर से खुलने में हो रही देरी के कारण। इस हफ्ते डॉलर-रुपया फिर से 95 के स्तर की ओर बढ़ गया, जिसकी वजह इक्विटी बाजार से लगातार हो रही विदेशी निकासी थी।
खबरों में केंद्रीय बैंक के भीतर चल रही उन चर्चाओं का जिक्र किया गया है, जिनका मकसद विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाना और निवेश आकर्षित करना है। इनमें प्रवासी भारतीयों को निवेश पर सुविधा देना और ऑफशोर बॉन्ड निवेशकों पर लगने वाले विदहोल्डिंग टैक्स को हटाना शामिल है। अल नीनो के जोखिम और ग्रीष्मकालीन मॉनसून पर इसके असर के कारण महंगाई की दोहरी मार भी चिंता का विषय है।