Midcap-Smallcap Funds Investment: मिडकैप और स्मॉलकैप म्युचुअल फंड्स में निवेशकों का भरोसा एक बार फिर लौटता दिख रहा है। एसोसिएशन ऑफ म्युचुअल फंड्स इन इंडिया (AMFI) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, जून में इक्विटी म्युचुअल फंड्स में नेट इनफ्लो 26 फीसदी बढ़ा, जिसमें सबसे बड़ा योगदान मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स का रहा। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या अब इन फंड्स में निवेश बढ़ाने का सही समय है?
जून के दौरान सभी इक्विटी म्युचुअल फंड कैटेगरी में मिडकैप फंड सबसे आगे रहे और इनमें 6,090 करोड़ रुपये का निवेश आया। वहीं, स्मॉलकैप फंड निवेशकों की दूसरी सबसे पसंदीदा कैटेगरी रहे। मासिक आधार पर मिडकैप फंड्स में निवेश 39 फीसदी और स्मॉलकैप फंड्स में 13 फीसदी बढ़ा, जो इन दोनों सेगमेंट में निवेशकों के बढ़ते भरोसे को दर्शाता है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स में निवेशकों की बढ़ती दिलचस्पी की वजह बाजार में बढ़ता भरोसा और कंपनियों की बेहतर कमाई की संभावनाएं हैं। हाल के महीनों में आर्थिक संकेतकों में सुधार, मजबूत घरेलू निवेश, पहले आई गिरावट के बाद आकर्षक वैल्यूएशन और सरकार का मैन्युफैक्चरिंग, इंफ्रास्ट्रक्चर व कैपेक्स पर लगातार जोर निवेशकों का भरोसा बढ़ा रहा है।
मनीफ्रंट के एमडी और सीईओ मोहित गांग ने कहा, “इस साल की शुरुआत में आई बाजार गिरावट के बाद वैल्यूएशन ज्यादा आकर्षक हो गए हैं, जिससे निवेशकों की दिलचस्पी फिर बढ़ी है। मजबूत कॉरपोरेट अर्निंग, SIP के जरिए लगातार घरेलू निवेश, बेहतर आर्थिक संकेतकों और घटती महंगाई ने निवेशकों का भरोसा मजबूत किया है।”
उनके मुताबिक, अब निवेशक बाजार में गिरावट को खरीदारी के अवसर के रूप में देख रहे हैं। वहीं, मैन्युफैक्चरिंग, प्रीमियमाइजेशन, अर्थव्यवस्था के औपचारिक होने और सरकारी पूंजीगत खर्च जैसे फैक्टर भारत की मिड-साइज कंपनियों की लॉन्ग टर्म ग्रोथ को समर्थन दे रहे हैं।
टाटा एसेट मैनेजमेंट के सीनियर फंड मैनेजर चंद्रप्रकाश पडियार ने कहा कि इक्विटी बाजार में रिटर्न का आधार कंपनियों की कमाई, कैश फ्लो और भविष्य की ग्रोथ होती है। पिछले कुछ वर्षों में मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों ने लार्ज कैप के मुकाबले बेहतर अर्निंग ग्रोथ दिखाई है। हालांकि, इनका वैल्यूएशन अभी भी ऊंचा है, लेकिन बेहतर ग्रोथ आउटलुक इसे सपोर्ट करता है।
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एक्सपर्ट्स का मानना है कि मिड और स्मॉलकैप सेगमेंट में वैल्यूएशन पहले के मुकाबले ज्यादा संतुलित जरूर हुए हैं, लेकिन पूरे सेगमेंट को सस्ता नहीं कहा जा सकता। बाजार में आए सुधार के बाद कई मजबूत कंपनियों में निवेश के आकर्षक मौके बने हैं, जबकि कुछ शेयर अब भी प्रीमियम वैल्यूएशन पर ट्रेड कर रहे हैं। ऐसे में निवेशकों को पूरे सेगमेंट पर एक साथ दांव लगाने के बजाय चुनिंदा कंपनियों पर फोकस करना चाहिए।
द वेल्थ कंपनी म्युचुअल फंड की CIO-इक्विटी, अपर्णा शंकर ने कहा, “पूरे मार्केट में वैल्यूएशन अब एक जैसा नहीं है। जहां कुछ सेक्टर अभी भी प्रीमियम पर ट्रेड कर रहे हैं, वहीं पहले आए करेक्शन ने फंडामेंटली मजबूत कंपनियों में निवेश के अच्छे मौके बनाए हैं।”
उनके मुताबिक, मिडकैप और स्मॉलकैप को एक समान नहीं मानना चाहिए। निवेशकों को मोमेंटम के बजाय रिसर्च-आधारित ‘बॉटम-अप’ रणनीति अपनाकर ऐसी कंपनियों का चयन करना चाहिए जिनकी कमाई लगातार बढ़ रही हो, बैलेंस शीट मजबूत हो और जिनका बिजनेस मॉडल टिकाऊ हो।
गांग का कहना है कि बाजार के शीर्ष स्तरों की तुलना में वैल्यूएशन अब ज्यादा वाजिब हैं, लेकिन हर जगह आकर्षक नहीं हैं। उनके अनुसार, वैल्यूएशन के लिहाज से मिडकैप सेगमेंट अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में है, जबकि स्मॉलकैप के कुछ हिस्से करेक्शन के बाद भी महंगे बने हुए हैं। उनका कहना है कि अब बाजार काफी चुनिंदा हो गया है। लगातार बेहतर कमाई, मजबूत कैश फ्लो और अच्छे रिटर्न रेशियो वाली कंपनियों को ही प्रीमियम वैल्यूएशन मिल रहा है, जबकि कमजोर कंपनियों को निवेशकों का समर्थन नहीं मिल रहा।
पडियार का मानना है कि मौजूदा समय में सभी मार्केट कैप कैटेगरी में बेहद सोच-समझकर निवेश करना चाहिए। हर कंपनी भविष्य में तेज ग्रोथ बनाए नहीं रख पाएगी और यदि कमाई की रफ्तार धीमी पड़ती है तो ऊंचे वैल्यूएशन को बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। इसलिए उनका फोकस मजबूत फंडामेंटल वाली चुनिंदा मिडकैप और स्मॉलकैप कंपनियों पर है, जिनमें लंबे समय तक बेहतर ग्रोथ देने की क्षमता हो।
एक्सपर्ट्स की राय है कि मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स में निवेश बढ़ाने का फैसला केवल हालिया शानदार रिटर्न देखकर नहीं करना चाहिए। निवेश हमेशा आपकी जोखिम उठाने की क्षमता, निवेश अवधि और कुल एसेट एलोकेशन के आधार पर होना चाहिए।
गांग का कहना है कि जिन निवेशकों का नजरिया कम से कम 5-7 साल का है, वे मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स में SIP के जरिए धीरे-धीरे निवेश बढ़ा सकते हैं। हालांकि, सिर्फ हाल के बेहतर प्रदर्शन के आधार पर इन फंड्स में एक्सपोजर बढ़ाना सही रणनीति नहीं होगी। उनके मुताबिक, लार्ज कैप फंड्स की तुलना में मिडकैप और स्मॉलकैप फंड्स ज्यादा उतार-चढ़ाव वाले होते हैं और बाजार में गिरावट के दौरान इनमें नुकसान भी ज्यादा हो सकता है।
शंकर का कहना है कि मिडकैप और स्मॉलकैप फंड लंबी अवधि में वेल्थ क्रिएशन का अच्छा माध्यम बन सकते हैं। लेकिन इनमें निवेश का फैसला हमेशा निवेशक की रिस्क प्रोफाइल, निवेश अवधि और एसेट एलोकेशन को ध्यान में रखकर करना चाहिए। उनका सुझाव है कि 5-7 साल या उससे ज्यादा की निवेश अवधि वाले निवेशक एकमुश्त निवेश करने के बजाय SIP या चरणबद्ध (स्टैगर्ड) तरीके से निवेश बढ़ाएं। इससे बाजार के उतार-चढ़ाव का असर कम होता है और उभरती कंपनियों की लॉन्ग टर्म ग्रोथ का फायदा उठाने का बेहतर अवसर मिलता है।
एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत की स्ट्रक्चरल ग्रोथ स्टोरी से जुड़े सेक्टर्स आने वाले वर्षों में बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। हालांकि, उनका कहना है कि केवल किसी सेक्टर की थीम देखकर निवेश नहीं करना चाहिए। निवेशकों को मजबूत फंडामेंटल, अच्छी कमाई, काबिल मैनेजमेंट और सही वैल्यूएशन वाली कंपनियों का चयन करना चाहिए।
पडियार का कहना है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में कॉर्पोरेट इंडिया का प्रदर्शन लगातार मजबूत रहा है। उनके मुताबिक, इस सेक्टर की कई कंपनियां अपने-अपने सेगमेंट में मार्केट लीडर बनने की क्षमता रखती हैं। इसलिए मीडियम से लॉन्ग टर्म के लिए मैन्युफैक्चरिंग थीम आकर्षक बनी हुई है। वहीं, शॉर्ट से मीडियम टर्म में बैंकिंग सेक्टर बेहतर रिस्क-रिवॉर्ड का अवसर प्रदान करता है।
वहीं, शंकर का मानना है कि मैन्युफैक्चरिंग, कैपिटल गुड्स, डिफेंस, पावर एवं एनर्जी ट्रांजिशन, इंडस्ट्रियल ऑटोमेशन, चुनिंदा फाइनेंशियल सर्विसेज, हेल्थकेयर, कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग और प्रीमियम कंजम्पशन जैसे सेक्टर्स भारत की लॉन्ग टर्म ग्रोथ की कहीनी से सबसे ज्यादा फायदे में रह सकते हैं।
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इन सेक्टर्स पर रखें खास नजर:-
कैपिटल गुड्स और इंडस्ट्रियल मैन्युफैक्चरिंग: इन्हें सरकार के इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च, प्राइवेट सेक्टर में कैपिटल एक्सपेंडिचर (capex) की वापसी, डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग, रेलवे और लोकलाइजेशन की कोशिशों से बढ़ावा मिल रहा है।
पावर और पावर से जुड़े सेक्टर: बिजली की बढ़ती मांग, ट्रांसमिशन में निवेश, रिन्यूएबल एनर्जी का विस्तार और ग्रिड को आधुनिक बनाने से इन्हें बढ़ावा मिल रहा है। यहां वैल्यूएशन को लेकर सावधानी बरतनी होगी।
फाइनेंशियल सर्विसेज: बढ़ती फाइनेंशियलाइजेशन से चुनिंदा NBFCs, इंश्योरेंस से जुड़े बिजनेस, कैपिटल मार्केट इंटरमीडियरी और खास तरह के लेंडर को फायदा होने की उम्मीद है।
हेल्थकेयर और फार्मास्यूटिकल्स: खासकर CDMO, हॉस्पिटल, डायग्नोस्टिक्स और स्पेशियलिटी फार्मा कंपनियां। इन्हें घरेलू बाजार के साथ-साथ निर्यात मांग का भी फायदा मिल रहा है।
इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सर्विसेज (EMS) और डिफेंस: चीन+1 रणनीति, सरकार की PLI योजना और देश में बढ़ते मैन्युफैक्चरिंग पर जोर से इन सेक्टर्स की ग्रोथ को मजबूत समर्थन मिल रहा है।
कंज्यूमर डिस्क्रेशनरी: प्रीमियम कंज्यूमर प्रोडक्ट्स, ट्रैवल, हॉस्पिटैलिटी और ऑर्गेनाइज्ड रिटेल से जुड़ी चुनिंदा कंपनियां बढ़ती आय और खपत का लाभ उठा रही हैं।