यूबीएस में ग्लोबल मार्केट्स इंडिया के प्रमुख गौतम छाओछरिया का कहना है कि भारतीय शेयरों के मूल्यांकन में गिरावट आई है लेकिन वैश्विक निवेशकों के लिए ये अभी भी उतने आकर्षक नहीं हैं क्योंकि आय वृद्धि कमजोर कड़ी बनी हुई है। सुंदर सेतुरामन और समी मोडक को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि हाल में अमेरिका के साथ हुए व्यापार समझौते ने अल्पावधि की बड़ी रुकावट को दूर कर दिया है। हालांकि अर्थव्यवस्था में कोई भी बड़ा सुधार होने में समय लगेगा। मुख्य अंश:
असल में भारत मूल्यांकन, कमाई और लिक्विडिटी के एक त्रिकोण में फंसा हुआ है। बाकी देशों की तुलना में मूल्यांकन अभी भी महंगे हैं, कमाई में बढोतरी उम्मीद से कम रही है जबकि घरेलू लिक्विडिटी मजबूत है, पूंजी जुटाना और भी मजबूत हुआ है, जिससे उस लिक्विडिटी का बड़ा हिस्सा इस्तेमाल हो गया है। एक साल पहले मूल्यांकन और भी ज्यादा थे, उनमें कुछ गिरावट आई है लेकिन वे अभी भी वैश्विक निवेशकों के लिए उतने आकर्षक नहीं हैं। कमाई में वृद्धि कमज़ोर कड़ी है। कुछ सुधार की उम्मीद है, लेकिन यह अभी उस स्तर पर नहीं है जिसकी उम्मीद लंबी अवधि के निवेशक भारत से या इस क्षेत्र के बाकी देशों की तुलना में करते हैं।
दो साल पहले वैश्विक और क्षेत्रीय कमाई कमजोर थी। लेकिन अब चीन सहित कई बाजार कमाई में बेहतर वृद्धि दर्ज कर रहे हैं। इसमें टेक्नॉलजी का भी योगदान है। वहां मूल्यांकन भी ज्यादा सही हैं। ऐतिहासिक रूप से भारत की कमाई में बढ़ोतरी अपने समकक्षों के मुकाबले बेहतर रही है। लेकिन इस बार सापेक्षिक तस्वीर अलग है। यह मौजूदा साइकल की खासियतों में से एक है।
हां, अल्पावधि के लिए। हालांकि कुछ चीज़ें अभी भी सेटअप को बेहतर बना सकती हैं। एक, विदेशी बिकवाली की रफ्तार धीमी हो सकती है। हमें उम्मीद नहीं है कि विदेशी निवेशक तेजी से वापस आएंगे, लेकिन बिकवाली की रफ्तार कम हो सकती है। दूसरा, जब उभरते बाजार को एक परिसंपत्ति वर्ग के तौर पर निवेश मिलता है तो भारत को भी कुछ आवंटन होता है, भले ही निवेशक अंडरवेट हों। कुल मिलाकर, विदेशी बिकवाली कम हो सकती है।
इस चक्र में दो बहुत ही खास बातें हैं। पहली है टेक्नॉलॉजी। आज ज्यादातर वैश्विक मौके, जैसे आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, सेमीकंडक्टर और हार्डवेयर- ये सब भारत के बाहर हैं। भारत असल में उस थीम का हिस्सा नहीं है। दूसरा है सापेक्षिक कमाई। अगर आप इतिहास देखें तो भारत आमतौर पर कमाई में बेहतर वृद्धि देता है। इस बार ऐसा नहीं है और कई बाजार बढ़ोतरी दर्ज कर रहे हैं। यह मेलजोल इस घटनाक्रम को पिछले चक्र से अलग बनाता है और बताता है कि जब तक कमाई में वृद्धि बहाल नहीं होती, तब तक रुझान में जल्द बदलाव नहीं आएगा।
अमेरिका से समझौते से निकट भविष्य में बाजार के सेंटिमेंट पर मंडरा रहा खतरा खत्म हो गया है। इकॉनमी में सुधार होना चाहिए, लेकिन इसमें थोड़ा समय लग सकता है। यूरोप भी दिलचस्प है, भले ही वह उतनी सुर्खियां न बटोरता हो। मुख्य बात यह है कि अमेरिकी पूंजी और महंगी टेक्नॉलजी तक पहुंच को लेकर चिंताएं कम हो गई हैं। इससे बड़े वैश्विक निवेशक और टेक्नॉलजी कंपनियां ज्यादा सहज महसूस कर रहे हैं। हालांकि, असल में निवेश कभी रुका नहीं था।
ज्यादातर आर्थिक चीजें असल में सही जगह पर हैं – आर्थिक स्थिरता, नीतिगत समर्थन, अच्छी बैंकिंग व्यवस्था और कम ब्याज दरों के अलावा दूसरे देशों के साथ अंतर भी कम है। लेकिन कुछ कमी है – शायद मांग के मजबूत उत्प्रेरक। आर्थिक चक्र में आप शायद ही कभी किसी एक संकेतक को पहचान पाते हैं। हम जिस चीज पर करीब से नजर रख रहे हैं, वह है क्रेडिट की मांग, सिर्फ क्रेडिट ग्रोथ नहीं। पिछले एक-दो सालों में बैंक दकियानूस थे, लेकिन उधारी के मानक धीरे-धीरे आसान हो सकते हैं। क्रेडिट ग्रोथ बाजार और विश्लेषकों की उम्मीदों के मुकाबले सकारात्मक आश्चर्य दे सकती है और यह उम्मीद से ज्यादा तेजी से कमाई में दिख सकता है, शायद 6 से 12 महीनों के अंदर। इस पर नजर रखना चाहिए।
कई रुकावटें मसलन एफपीआई सेंटिमेंट, ट्रेड के मसले, डॉलर की मजबूती अक्सर एक साथ असर डालती हैं। इनमें से कुछ में नरमी आने से निकट भविष्य में माहौल ज्यादा मददगार हो सकता है, हालांकि धीरे-धीरे गिरावट का लंबी राह नहीं बदली है।