जुलाई के पहले पखवाड़े में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (एफपीआई) भारतीय शेयरों में सावधानी के साथ निवेश करते दिख रहे हैं। वे उपभोक्ता सेवाएं, धातु एवं खनन और स्वास्थ्य सेवा जैसे चुनिंदा सेक्टरों में खरीदारी कर रहे हैं। उन्हें अर्थव्यवस्था और बाजार के हालात जैसे हाई फ्रीक्वेंसी इकनॉमिक इंडिकेटर्स और कमाई में बढ़ोतरी के सकारात्मक अनुमानों से भी मदद मिल रही है।
नैशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी (एनएसडीएल) के आंकड़ों के अनुसार 1 से 15 जुलाई के बीच इक्विटी निवेश के मामले में एफपीआई ने उपभोक्ता सेवाओं, धातु एवं खनन और स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में सबसे ज्यादा खरीदारी की। इन क्षेत्रों में क्रमशः 7,361 करोड़ रुपये, 5,993 करोड़ रुपये और 4,101 करोड़ रुपये का शुद्ध निवेश हुआ।
धातु एवं खनन क्षेत्र में ट्रेंड में बदलाव दिखा। इसमें एक पखवाड़े पहले करीब 4,370 करोड़ रुपये की निकासी हुई थी। जुलाई के पहले दो हफ्तों में टिकाऊ उपभोक्ता और वित्तीय जैसे दूसरे सेक्टरों में शुद्ध निवेश की आवक जारी रही।
जुलाई के पहले पखवाड़े में एफपीआई का शुद्ध निवेश 15,559 करोड़ रुपये रहा जबकि इससे पहले के दो हफ्तों (16 जून से 30 जून) में यह 14,019 करोड़ रुपये रहा था। जून के दूसरे पखवाड़े में एफपीआई शुद्ध खरीदार बन गए थे। लेकिन पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने के कारण जुलाई में कई दिनों तक निकासी भी हुई। बावजूद, लगातार चार महीनों तक निकासी के बाद 20 जुलाई तक विदेशी निवेशकों का शुद्ध निवेश 11,682 करोड़ रुपये रहा।
मगर वाहन, वाहन कलपुर्जा और पूंजीगत सामान जैसे सेक्टरों से रकम की निकासी जारी रही। आदित्य बिड़ला सन लाइफ एएमसी में ऑफशोर और ऑल्टरनेट इन्वेस्टमेंट इक्विटी के प्रमुख समीर नारायण ने कहा कि निवेश की जगह के तौर पर भारत विदेशी निवेशकों के लिए एआई का जवाब साबित हो सकता है।
उन्होंने कहा, एफपीआई के लिए भारत में कई तरह के यानी दायरे, गहराई और क्वॉलिटी के मामले में अच्छे मौके हैं। हाल में उन्होंने बिकवाली की है, लेकिन ऐसा भारत के प्रति नकारात्मक सोच की वजह से नहीं बल्कि इसलिए हुआ है क्योंकि पैसे के डॉलर परिसंपत्तियों में जाने की वजह से है। अब यह भरोसा लौट रहा है कि कमाई में बढ़ोतरी फिर से 16-17 फीसदी के दायरे में आ जाएगी। इस तरह, एक परिसंपत्ति वर्ग के तौर पर भारत आकर्षक बन सकता है।
जानकारों का कहना है कि विदेशी निवेशकों ने ताइवान और दक्षिण कोरिया की चिप और मेमोरी कंपनियों में निवेश के लिए भारत से पैसा निकाला था। हालांकि, वे यह भी कहते हैं कि अब इस ट्रेड में सुस्ती के संकेत दिख रहे हैं क्योंकि एक ही जगह ज्यादा निवेश करने के जोखिम की वजह से मूल्यांकन को लेकर निराशा लगती है।
लाइटहाउस कैंटन की एक रिपोर्ट के अनुसार विदेशी निवेशकों ने जून 2026 में अकेले लगभग 30.5 अरब डॉलर के दक्षिण कोरियाई शेयर बेचे। यह करीब 25 सालों में सबसे बड़ी मासिक निकासी थी। उन्होंने जुलाई में अब तक अतिरिक्त 8 अरब डॉलर के शेयर बेचे हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि ताइवान के शेयरों से जून में 18.4 अरब डॉलर और जुलाई में अब तक 13 अरब डॉलर की निकासी हुई।
लाइटहाउस कैंटन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है, ट्रेड में आई इस भारी बिकवाली का भारत के लिए खास मतलब है। बहुत ज्यादा निवेश वाले दांव से पूंजी निकासी का मतलब यह नहीं है कि उसकी एआई आधारित वृद्धि में दिलचस्पी खत्म हो गई है बल्कि यह पूंजी कम मूल्यांकन प्रीमियम और ऑर्डर बुक पर आधारित ज्यादा टिकाऊ वृद्धि वाले मौकों की तलाश में है। भारत दुनिया के उन चुनिंदा बाजारों में से एक है, जो उसे यह मुहैया कराने की स्थिति में है।