न्यायमूर्ति उदय उमेश ललित ने शनिवार को भारत के 49 वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली।
राष्ट्रपति भवन में आयोजित संक्षिप्त कार्यक्रम के राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ सहित कई केंद्रीय मंत्री इस समारोह में शामिल हुए। न्यायमूर्ति ललित से पहले मुख्य न्यायाधीश के रूप में सेवाएं देने वाले न्यायमूर्ति एन वी रमण भी इस मौके पर मौजूद थे।
शुरुआती जीवन
इन्होंने अपने करियर की शुरुआत वकालत से 1983 में शुरू किया था। 1983 से लेकर 1985 तक इन्होंने बॉम्बे हाईकोर्ट में वकालत किया। 1985 में वो सुप्रीम कोर्ट में वकालत करने लगे। धीरे धीरे इनकी गिनती एक तेज तर्रार वकील के रूप में होने लगी। साल 1986 से लेकर साल 1992 तक ये पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी के साथ भी काम कर चुके हैं। सुप्रीम कोर्ट में एक वकील के रूप में लंबे समय तक सेवा देने के बाद 13 अगस्त 2014 को इनको सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया था।
राम मंदिर मामले से खुद को कर लिया था अलग
राम मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम पक्ष की ओर से पेश वकील राजीव धवन ने तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया था कि जस्टिस ललित उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की पैरवी करने के लिए 1994 में अदालत में पेश हुए थे। हालांकि धवन जस्टिस ललित को मामले की सुनवाई से अलग होने की मांग नहीं कर रहे थे। धवन की आपत्ति के बाद जस्टिस ललित ने फैसला लिया कि वे अब इस केस में पीठ में शामिल नहीं होंगे और खुद को मामले की सुनवाई से अलग कर लिया था।