‘निलंबन समाप्त होने के बाद आईबीसी मामलों में नहीं होगी अधिक वृद्धि’

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बीएस संवाददाता
Last Updated- December 12, 2022 | 7:02 AM IST

बीएस बातचीत
भारत का दिवालिया कानून अपने कई दांव पेच के साथ अब चौथे वर्ष में पहुंच चुका है। भारतीय दिवाला और शोधन अक्षमता बोर्ड (आईबीबीआई) के चेयरमैन एमएस साहू ने रुचिका चित्रवंशी के साथ बातचीत में आईबीसी की उपलब्धियों, विकास और चुनौतियों पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि निलंबन के समाप्त होने के बाद मामलों में वृद्धि होगी, लेकिन यह बहुत अधिक नहीं होगी। पेश हैं मुख्य अंश:
दिवालिया और ऋणशोधन अक्षमता संहिता अब चार वर्ष पुराना कानून हो चुका है। आप इस यात्रा को किस तरह से देखते हैं और क्या बड़ी उपलब्धियां रही हैं?
हां, इस कानून के चार वर्ष पूरे हो चुके हैं और फिर भी ऐसा लगता है कि यह कानून हाल ही में आया है। इस कानून के जरिये बाजार का वर्चस्व और दिवाला के समाधान में कानून का शासन स्थापित हुआ है। वित्तीय संकट में फंसी कंपनियों को उबारने के लिए उन्हें बाहर निकलने की स्वतंत्रता देने से लेकर ऋणदाताओं को अपना बकाया वसूलने में मदद करने तक और सबसे प्रमुख बात देनदार-लेनदार के संबंधों को पुनर्परिभाषित करने तक संहिता की उपलब्धियों की सूची लंबी है।

न्यायिक प्राधिकारी के पास आने वाली करीब 95 फीसदी कंपनियों में संहिता के जरिये दबाव का समाधान हो रहा है। यदि कोई उद्यमी सफल नहीं हो पा रहा है तो उसे कारोबार में अटके नहीं रहना चाहिए?
संहिता के जरिये स्वच्छता अभियान चलाया गया है जिससे एनपीए (गैर-निष्पादित आस्तियों) की सफाई हुई है और कंपनियों को सक्षम और भरोसेमंद हाथों में सौंपा गया है। इसने बढ़ते एनपीए को रोकने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है और एनपीए के स्तर को 2017-18 के 11.5 फीसदी से घटाकर 8.2 फीसदी कर दिया है। भले ही संहिता के तहत कंपनियों को बचाने के लिए वसूली आकस्मिक है लेकिन यह वसूली के मजबूत तरीके के तौर पर उभरा है। समाधान योजनाएं ऋणदाताओं के 40 फीसदी से अधिक दावों और कंपनियों के करीब 200 फीसदी परिसमापन मूल्य की वसूली कर रही हैं। संहिता के आने को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने ठीक ही कहा है कि चूककर्ताओं के अच्छे दिन चले गए।
गत चार वर्षों में सर्वोच्च अदालत ने कई सारे विवादास्पद मुद्दों का समाधान किया है?
कानून का लगभग हरेक प्रावधान और संशोधन गहन न्यायिक निरीक्षण से गुजरा है। विधायिका को प्रयोग करने की स्वतंत्रता को स्वीकृति देते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सक्रिय रूप से विवादास्पद मुद्दों का समाधान किया है और अप्रत्याशित तेजी के साथ अपरिभाषित क्षेत्रों का समाधान किया है। अदालतों के आदेश से समाधान प्रक्रिया में विभिन्न साझेदरों की भूमिकाएं स्पष्ट हुई हैं और किन बातों की अनुमति है और किन की नहीं, वह भी स्पष्ट हुआ है।

दबाव वाली संपत्तियों के समाधान के लिए सरकार की शक्ति योजना के आलोक में आप आईबीसी की भूमिका को किस प्रकार से देखते हैं?
बाजार की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से पसंद का मामला है। कंपनियों के पास निश्चित तौर पर चुनने के लिए कई सारे विकल्प होने चाहिए। संहिता, शक्ति, कंपनी अधिनियम के तहत व्यवस्था की योजना, आरबीआई के विवेकपूर्ण तंत्र के तहत पुनर्गठन और यहां तक कि अनौपचारिक व्यवस्थाएं सभी का निश्चित परिस्थितियों में विशेष लाभ है। हालांकि संहिता का प्राथमिक उद्देश्य वसूली है और किसी की वसूली में रुचि है तो संहिता कोई विकल्प नहीं है।

बैंक जून तक एनसीएलटी की कार्रवाई पर रोक को बढ़ाना चाहते हैं। इसको लेकर आपका क्या कहना है?
कानून के तहत रोक को बढ़ाकर 24 मार्च, 2021 किया गया है। इसमें और विस्तार के लिए ध्यानपूर्वक मूल्यांकन करने की जरूरत है क्योंकि बाजार अर्थव्यवस्था में प्रत्येक उपाय से किसी न किसी का हित प्रभावित होता है फिर चाहे वह सकारात्मक हो या नकारात्मक। यदि किसी मामले में संहिता कोई विकल्प है तो साझेदार इसे तब भी नहीं अपनाएंगे जब रोक को आगे नहीं बढ़ाया जाता है।

First Published : March 14, 2021 | 11:26 PM IST