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इजरायल-अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव में अयातुल्ला अली खामेनेई का नाम बार-बार आता है। वो ईरान के सबसे बड़े नेता हैं, जिन्होंने चार दशकों से देश की कमान संभाली हुई है। उनका जीवन एक साधारण क्लर्क से शुरू होकर सुप्रीम लीडर तक पहुंचा, और आज वो इजरायल के साथ संघर्ष में ईरान की रणनीति तय करते हैं। लेकिन वो अभी कहां हैं? आइए, इस पर बात करते हैं।
अयातुल्ला अली खामेनेई का जन्म 1939 में ईरान के मशहद शहर में हुआ था। उनका परिवार बहुत साधारण था। पिता अयातुल्लाह जवाद हुसैनी खामेनेई एक धार्मिक विद्वान थे, जो स्थानीय मस्जिद में नमाज पढ़ाते थे। घर इतना छोटा था कि सिर्फ एक कमरा और एक अंधेरा बेसमेंट था। मेहमान आने पर परिवार को बेसमेंट में छिपना पड़ता था। खामेनेई को ‘सैय्यद अली’ कहा जाता था, क्योंकि उनका परिवार पैगंबर मोहम्मद के वंश से जुड़ा माना जाता है। वो अजरबैजानी मूल के थे, लेकिन ईरानी संस्कृति में रचे-बसे।
बचपन से ही धर्म की तरफ झुकाव था। 1960 के दशक में वो कोम शहर गए, जहां उन्होंने अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी के साथ पढ़ाई की। खोमैनी बाद में ईरान की 1979 की इस्लामिक क्रांति के नेता बने। उस वक्त शाह की सरकार के खिलाफ विरोध शुरू हो गया था। खामेनेई ने 1963 में, सिर्फ 24 साल की उम्र में, राजनीतिक गतिविधियों के लिए जेल की सजा काटी। मशहद में उन्हें टॉर्चर किया गया। 1974 में फिर जेल हुई, जहां वो साथी कैदियों के साथ बहस करते और विचार साझा करते थे। वो एक मिलनसार लेकिन कट्टर विचारों वाले व्यक्ति के रूप में जाने जाते थे। उनके पिता पारंपरिक क्लर्क थे, लेकिन खामेनेई क्रांतिकारी इस्लाम की तरफ झुके। ये दौर उनके जीवन को आकार देने वाला था, जहां जेल और संघर्ष ने उन्हें मजबूत बनाया।
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1979 की इस्लामिक क्रांति ने ईरान बदल दिया। शाह को बाहर किया गया, और खोमैनी पेरिस से लौटे। खामेनेई ने इस्लामिक रिपब्लिक पार्टी बनाने में मदद की। क्रांति के बाद वो बड़े पदों पर पहुंचे। 1981 में वो ईरान के पहले राष्ट्रपति अबुल हसन बनी सद्र को हटाने में शामिल थे। उसी साल एक बम हमले में वो बुरी तरह घायल हो गए, जिससे उनका एक हाथ कमजोर हो गया। लेकिन वो रुके नहीं। अक्टूबर 1981 में वो खुद राष्ट्रपति चुने गए।
खोमैनी की मौत जून 1989 में हुई। तब असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने खामेनेई को सुप्रीम लीडर चुना। कुछ बड़े क्लर्क्स को लगता था कि वो इसके लिए पूरी तरह योग्य नहीं हैं, क्योंकि उनका धार्मिक रैंक उतना ऊंचा नहीं था। लेकिन संविधान में बदलाव कर उन्हें ये पद दिया गया। जुलाई 1989 से वो सुप्रीम लीडर हैं। इस पद पर वो सेना के कमांडर हैं, युद्ध घोषित कर सकते हैं, बड़े अफसरों को नियुक्त या हटा सकते हैं। फैसलों में वो आखिरी आवाज हैं। उन्होंने रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से अच्छे रिश्ते बनाए, जो ईरान की सेना का अहम हिस्सा हैं।
उन्होंने सेताद नाम की संस्था बनाई, जो जब्त संपत्तियों को संभालती है और अब एक बड़ा आर्थिक साम्राज्य है। ये सब उनके सत्ता को मजबूत करने का तरीका था। वो सलाह लेते हैं, लेकिन जिद्दी हैं और शासन की रक्षा को सबसे ऊपर रखते हैं। उनके बेटे मोजतबा अब उनके करीब हैं, जो रिवोल्यूशनरी गार्ड्स से जुड़े हैं और फैसलों में मदद करते हैं।
खामेनेई का शासन इजरायल और अमेरिका के खिलाफ दुश्मनी पर टिका है। वो ईरान को मिडिल ईस्ट में मजबूत रखना चाहते हैं। 2025 में ये तनाव चरम पर पहुंच गया। इजरायल ने तेहरान और दूसरे इलाकों पर भारी हवाई हमले किए, जो 12 दिन चले। ये जून-जुलाई में हुआ। इजरायल ने ईरान के न्यूक्लियर साइट्स पर हमला किया, और अमेरिका ने भी बॉम्बिंग की। खामेनेई बच गए, लेकिन 1,000 से ज्यादा ईरानी मारे गए, ज्यादातर आम लोग। उनके इनर सर्कल से कई बड़े लोग मारे गए, जिसमें मुख्य रूप से रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कमांडर हुसैन सलामी, एयरोस्पेस चीफ अमीर अली हाजीजादेह, और स्पाईमास्टर मोहम्मद काजमी शामिल हैं। ये हमले इजरायल की तरफ से थे, जो ईरान के मिसाइल प्रोग्राम और न्यूक्लियर साइट्स को निशाना बनाते थे।
खामेनेई ने इन हमलों के बाद ईरान की रक्षा पर जोर दिया। उनके फैसलों से ईरान ने जवाबी मिसाइल दागे। लेकिन ये सब उनके नेतृत्व पर सवाल उठा रहा है। लोग सोच रहे हैं कि 86 साल की उम्र में वो कितने दिन और सत्ता संभालेंगे। उनके सलाहकारों का घेरा कमजोर हो गया है, जिससे रणनीतिक गलतियां होने का खतरा है। वो विरोध प्रदर्शनों को दबाने के लिए गार्ड्स भेजते हैं, जैसे 1999, 2009 और 2022 में। इजरायल के साथ संघर्ष में वो ईरान को एकजुट रखने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आर्थिक प्रतिबंधों से देश कमजोर हो रहा है।
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BBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, खामेनेई अभी तेहरान में रहते हैं। उनका कंपाउंड वहां है, जहां वो 15-20 करीबी सलाहकारों से मिलते हैं। ये बैठकें अनियमित होती हैं, लेकिन बड़े फैसलों के लिए जरूरी रहती है। 5 जुलाई 2025 को वो आशूरा सेरेमनी में शामिल हुए थे, जो तेहरान में हुई थी। ये दिखाता है कि वो सक्रिय हैं और सार्वजनिक रूप से नजर आते हैं। लेकिन इजरायल के हमलों के बाद उनका घेरा खाली हो गया है। बाकी सलाहकार जैसे अली असगर हेजाजी (इंटेलिजेंस), मोहम्मद गोलपयेगानी (ऑफिस हेड), और पुराने लोग जैसे अली अकबर वेलायती और अली लारिजानी अभी उनके साथ हैं।
ईरानी मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, वे सतर्क हैं, पश्चिम पर भरोसा नहीं करते और शासन बचाने पर फोकस करते हैं। उनके बेटे मोजतबा खामेनेई अब ज्यादा अहम हो गए हैं, जो गार्ड्स से जुड़े हैं और गुटों के बीच समन्वय करते हैं। ये सब 2025 के ताजा घटनाक्रम से पता चलता है, जहां हमलों ने उनके नेतृत्व को चुनौती दी है।