facebookmetapixel
Advertisement
Trump-Xi Meeting: अमेरिका-चीन की बड़ी डील! ट्रंप-शी बैठक में तनाव कम करने की कोशिश, जानें 5 बड़े फैसलेदिल्ली की रेखा सरकार का बड़ा फैसला! वर्क फ्रॉम होम से लेकर ‘नो व्हीकल डे’ तक कई नए नियम लागूHUF के जरिए घर खरीदना कैसे बन सकता है टैक्स बचत का स्मार्ट तरीका, जानिए क्या हैं फायदे और जरूरी बातेंNEET में लाखों छात्रों का भविष्य खतरे में? पेपर लीक के बाद चौंकाने वाले आंकड़ेTata Motors Q4 Results: मुनाफा 31% गिरा, राजस्व में बढ़त; JLR का दबाव भारीSenior Citizens के लिए खुशखबरी! FD पर मिल रहा 8.3% तक बंपर ब्याज, जानें कौन से बैंक दे रहे सबसे ज्यादा रिटर्नMutual Fund: अप्रैल में इक्विटी AUM रिकॉर्ड स्तर पर, फंड हाउसेस ने किन सेक्टर और स्टॉक्स में की खरीदारी?तेल संकट और कमजोर पर्यटन ने मॉरीशस की अर्थव्यवस्था को झकझोरा, भारत भी रहे सतर्कप्लेटिनम हाइब्रिड लॉन्ग-शॉर्ट फंड: 20 मई से खुलेगा NFO, किसे करना चाहिए इस SIF में निवेश?Airtel को लेकर सुनील मित्तल का 10 साल का मास्टरप्लान सामने आया

सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति

Advertisement

13 साल से चेतनाहीन युवक को गरिमापूर्ण मृत्यु की अनुमति, सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला

Last Updated- March 12, 2026 | 9:04 AM IST
Supreme Court

सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को 32 वर्षीय हरीश राणा को जीवन रक्षक उपचार प्रणाली से हटाए जाने की इजाजत दे दी। राणा अगस्त 2013 में चार मंजिला इमारत से गिरने के बाद से ही पूरी तरह बिस्तर पर वेजिटेटिव अवस्था (जीवित लेकिन चेतनाहीन) अवस्था में हैं।

यह देश में इस तरह की इच्छामृत्यु का पहला मामला है। सर्वोच्च न्यायालय ने राणा को चिकित्सा उपकरणों से हटाने को कहा है ताकि गरिमापूर्ण ढंग से उनका जीवन समाप्त हो सके। न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन ने कहा कि राणा को दी जा रही क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रीशन ऐंड हाइड्रेशन (सीएएनएच) सहित सभी चिकित्सकीय उपचार व्यवस्था बंद कर दी जाए। अदालत ने जोर देकर कहा कि यह पूरी प्रक्रिया ‘मानवीय’ और गरिमापूर्ण ढंग से अंजाम दी जाए।

पीठ ने इस मामले के विशिष्ट हालात को देखते हुए 30 दिन की पुनर्विचार की अवधि भी समाप्त कर दी क्योंकि इस मामले के सभी पक्षकार इस बात पर एकमत थे कि चिकित्सकीय हस्तक्षेप जारी रखने की जरूरत नहीं है। न्यायालय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स दिल्ली को कहा कि राणा को गंभीर देखभाल वाले विभाग में रखकर चिकित्सकों की निगरानी में इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जाए।

पीठ ने कहा, ‘एम्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस तरह उपचार को समाप्त करना एक मजबूत जीवन-समापन देखभाल योजना के माध्यम से किया जाए, जो विशेष रूप से लक्षणों को इस प्रकार नियंत्रित करने के लिए तैयार की गई हो कि संबंधित व्यक्ति को कोई असुविधा न हो और उसकी गरिमा सर्वोच्च स्तर पर सुरक्षित रहे।’ पीठ ने यह भी कहा कि भारत में इस प्रकार के अवसरों के लिए समुचित व्यापक सांविधिक ढांचा मौजूद नहीं है। उसने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस दिशा में कानून बनाने पर विचार करे।

राणा के परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय से जीवन-रक्षक उपचार को वापस लेने की अनुमति की गुजारिश की थी। यह सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के संविधान पीठ के उस निर्णय के अनुरूप है जिसमें असाध्य रोगियों के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की वैधता को मान्यता दी गई थी। उस निर्णय ने ऐसे मामलों में जीवन रक्षक चिकित्सा प्रणाली हटाने के लिए दिशा-निर्देश तय किए थे, जहां रोगी ने पहले से निर्देश या ‘लिविंग विल’ जारी किया हो, साथ ही उन परिस्थितियों में भी जहां ऐसा कोई निर्देश मौजूद न हो। वर्ष 2023 में एक अन्य संविधान पीठ ने 2018 के दिशानिर्देशों को संशोधित करके प्रक्रिया को और सरल बना दिया था ताकि इसमें मेडिकल बोर्ड तय समय में निर्णय ले सकें और इसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका कम हो सके।

पीठ ने कहा, ’32 वर्षीय हरीश राणा एक उज्ज्वल भविष्य वाले युवा थे, उनकी दिमागी चोट ने उन्हें पूरी तरह चेतनाशून्य अवस्था में ला दिया। रिपोर्ट बताती हैं कि 13 साल में उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है।’ न्यायमूर्ति पारदीवाला ने राणा के माता-पिता के त्याग और समर्पण की भी सराहना की।

उन्होंने कहा, ‘यह मामला मानव अस्तित्व की कई सच्चाइयों को उजागर करता है, जिनमें सबसे स्थायी सत्य प्रेम की दृढ़ता है। हमारे विचार में, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी मृत्यु नहीं बल्कि परित्याग है। विनाशकारी त्रासदी के बावजूद उसका परिवार कभी उसके साथ से नहीं हटा। उसकी हर पल देखभाल, सुरक्षा और स्नेह किया गया है। हमारे लिए यह अटूट प्रेम के सच्चे अर्थ का प्रमाण है।’

इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने परिवार का अनुरोध यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि राणा मैकेनिकल जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर नहीं हैं और बिना बाहरी मदद के जीवित रह सकते हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

सिरिल अमरचंद मंगलदास के साझेदार विप्लव लेनिन ने कहा, ‘भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को एक दशक से अधिक समय से अनुमति दी गई है, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर स्पष्ट मिसालों की कमी के कारण अदालतें सतर्क रही हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अरुणा शानबाग (2011) में विकसित और कॉमन कॉज (2018) में परिष्कृत ढांचे का पहला व्यावहारिक प्रयोग है, जिसने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी थी।

Advertisement
First Published - March 12, 2026 | 9:04 AM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement