सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को 32 वर्षीय हरीश राणा को जीवन रक्षक उपचार प्रणाली से हटाए जाने की इजाजत दे दी। राणा अगस्त 2013 में चार मंजिला इमारत से गिरने के बाद से ही पूरी तरह बिस्तर पर वेजिटेटिव अवस्था (जीवित लेकिन चेतनाहीन) अवस्था में हैं।
यह देश में इस तरह की इच्छामृत्यु का पहला मामला है। सर्वोच्च न्यायालय ने राणा को चिकित्सा उपकरणों से हटाने को कहा है ताकि गरिमापूर्ण ढंग से उनका जीवन समाप्त हो सके। न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और केवी विश्वनाथन ने कहा कि राणा को दी जा रही क्लिनिकली असिस्टेड न्यूट्रीशन ऐंड हाइड्रेशन (सीएएनएच) सहित सभी चिकित्सकीय उपचार व्यवस्था बंद कर दी जाए। अदालत ने जोर देकर कहा कि यह पूरी प्रक्रिया ‘मानवीय’ और गरिमापूर्ण ढंग से अंजाम दी जाए।
पीठ ने इस मामले के विशिष्ट हालात को देखते हुए 30 दिन की पुनर्विचार की अवधि भी समाप्त कर दी क्योंकि इस मामले के सभी पक्षकार इस बात पर एकमत थे कि चिकित्सकीय हस्तक्षेप जारी रखने की जरूरत नहीं है। न्यायालय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स दिल्ली को कहा कि राणा को गंभीर देखभाल वाले विभाग में रखकर चिकित्सकों की निगरानी में इस प्रक्रिया को अंजाम दिया जाए।
पीठ ने कहा, ‘एम्स को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि इस तरह उपचार को समाप्त करना एक मजबूत जीवन-समापन देखभाल योजना के माध्यम से किया जाए, जो विशेष रूप से लक्षणों को इस प्रकार नियंत्रित करने के लिए तैयार की गई हो कि संबंधित व्यक्ति को कोई असुविधा न हो और उसकी गरिमा सर्वोच्च स्तर पर सुरक्षित रहे।’ पीठ ने यह भी कहा कि भारत में इस प्रकार के अवसरों के लिए समुचित व्यापक सांविधिक ढांचा मौजूद नहीं है। उसने केंद्र सरकार से कहा कि वह इस दिशा में कानून बनाने पर विचार करे।
राणा के परिवार ने सर्वोच्च न्यायालय से जीवन-रक्षक उपचार को वापस लेने की अनुमति की गुजारिश की थी। यह सर्वोच्च न्यायालय के 2018 के संविधान पीठ के उस निर्णय के अनुरूप है जिसमें असाध्य रोगियों के लिए निष्क्रिय इच्छामृत्यु की वैधता को मान्यता दी गई थी। उस निर्णय ने ऐसे मामलों में जीवन रक्षक चिकित्सा प्रणाली हटाने के लिए दिशा-निर्देश तय किए थे, जहां रोगी ने पहले से निर्देश या ‘लिविंग विल’ जारी किया हो, साथ ही उन परिस्थितियों में भी जहां ऐसा कोई निर्देश मौजूद न हो। वर्ष 2023 में एक अन्य संविधान पीठ ने 2018 के दिशानिर्देशों को संशोधित करके प्रक्रिया को और सरल बना दिया था ताकि इसमें मेडिकल बोर्ड तय समय में निर्णय ले सकें और इसमें न्यायिक मजिस्ट्रेट की भूमिका कम हो सके।
पीठ ने कहा, ’32 वर्षीय हरीश राणा एक उज्ज्वल भविष्य वाले युवा थे, उनकी दिमागी चोट ने उन्हें पूरी तरह चेतनाशून्य अवस्था में ला दिया। रिपोर्ट बताती हैं कि 13 साल में उनकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है।’ न्यायमूर्ति पारदीवाला ने राणा के माता-पिता के त्याग और समर्पण की भी सराहना की।
उन्होंने कहा, ‘यह मामला मानव अस्तित्व की कई सच्चाइयों को उजागर करता है, जिनमें सबसे स्थायी सत्य प्रेम की दृढ़ता है। हमारे विचार में, जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी मृत्यु नहीं बल्कि परित्याग है। विनाशकारी त्रासदी के बावजूद उसका परिवार कभी उसके साथ से नहीं हटा। उसकी हर पल देखभाल, सुरक्षा और स्नेह किया गया है। हमारे लिए यह अटूट प्रेम के सच्चे अर्थ का प्रमाण है।’
इससे पहले दिल्ली उच्च न्यायालय ने परिवार का अनुरोध यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि राणा मैकेनिकल जीवन रक्षक प्रणाली पर निर्भर नहीं हैं और बिना बाहरी मदद के जीवित रह सकते हैं। विधि विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
सिरिल अमरचंद मंगलदास के साझेदार विप्लव लेनिन ने कहा, ‘भारत में निष्क्रिय इच्छामृत्यु को एक दशक से अधिक समय से अनुमति दी गई है, लेकिन इसके क्रियान्वयन पर स्पष्ट मिसालों की कमी के कारण अदालतें सतर्क रही हैं। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय अरुणा शानबाग (2011) में विकसित और कॉमन कॉज (2018) में परिष्कृत ढांचे का पहला व्यावहारिक प्रयोग है, जिसने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी थी।