अंतरिक्ष क्षेत्र में काम करने वाली निजी कंपनी स्काईरूट एरोस्पेस कक्षीय श्रेणी (ऑर्बिटल-क्लास) के रॉकेट ‘विक्रम-1’ के प्रक्षेपण के लिए कमर कस रही है। यह निजी क्षेत्र की तरफ से विकसित पहला कक्षीय श्रेणी का रॉकेट है। इसके साथ भेजे जाने वाले प्रमुख उपकरण (पेलोड) में एक अंतरिक्ष से उपग्रहों एवं रॉकेट के टुकड़े हटाने (ऐक्टिव डेब्री रिमूवल) में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होने वाला है। इससे कक्षा में बढ़ते उपग्रहों के मलबे की समस्या दूर करने का दीर्घकालिक समाधान मिलने की उम्मीद है।
एडीआर तकनीक विकसित करने वाली भारतीय स्टार्टअप इकाई ‘कॉस्मोसर्व स्पेस’ ने मंगलवार को अपने पहले कक्षीय तकनीकी परीक्षण ‘मिशन एम्ब्रेस’ की घोषणा की। यह मिशन स्काईरूट एरोस्पेस के ‘विक्रम-1’ के पहले कक्षीय प्रक्षेपण ‘मिशन आगमन’ के साथ उड़ान भरेगा। यह प्रक्षेपण 12 जुलाई और 4 अगस्त के बीच किसी दिन हो सकता है। ‘मिशन एम्ब्रेस’ सैटेलाइट पेलोड ले जाने वाले भारत के पहले निजी कक्षीय प्रक्षेपण यान पर उड़ान भरेगा, साथ ही कक्षा में ‘सॉफ्ट रोबोटिक कैप्चर’ का पहला परीक्षण भी करेगा।
सॉफ्ट रोबोटिक कैप्चर एक ऐसी लचीली रोबोटिक तकनीक है जिसे निष्क्रिय उपग्रहों या अंतरिक्ष में फैले कचरे को बिना किसी नुकसान के सुरक्षित रूप से पकड़ने के लिए तैयार की गई है।
कॉस्मोसर्व स्पेस अंतरिक्ष उड़ान की सबसे बड़ी चुनौतियों में एक का समाधान तैयार कर रही है। यह चुनौती है पृथ्वी की कक्षा में बेकार और छोड़े गए उपग्रहों का बढ़ता मलबा। अभी हजारों निष्क्रिय उपग्रहों और मलबे पृथ्वी की कक्षा में बिखरे हैं और उपग्रह समूहों के विस्तार के साथ इनकी तादाद र बढ़ने वाली है। ऐसे में कक्षा में लंबे समय तक स्थिरता बनाए रखने के लिए एडीआर तकनीक सबसे जरूरी क्षमताओं में एक बनकर उभरी है।
कंपनी का मुख्य उत्पाद एक दोहरी अंतरिक्ष यान प्रणाली है जिसमें एक रोबोटिक सर्विसर स्पेसक्राफ्ट बेकार हो चुके उपग्रह पकड़ने और हटाने में सक्षम है। यह कार्य फिलहाल उपलब्ध किसी भी समान समाधान की तुलना में लगभग दसवें हिस्से की लागत में किया जा सकता है।
कॉस्मोसर्व स्पेस के संस्थापक एवं सीईओ चिरंजीवी फनींद्र ने कहा, ‘मिशन एम्ब्रेस भारत के पहले निजी कक्षीय प्रक्षेपण का हिस्सा है जो सैटेलाइट पेलोड ले जाएगा, साथ ही कक्षा सॉफ्ट रोबोटिक कैप्चर का दुनिया का नजारा पेश करेगा। हमने इंजीनियरिंग की बारीकियों से कोई समझौता किए बिना एक साल से भी कम पुरानी कंपनी में केवल चार महीनों में इस तकनीक को संकल्पना से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक विकसित किया है’।
इस प्रणाली के केंद्र में कॉस्मोसर्व का सॉफ्ट रोबोटिक कैप्चर प्रणाली है। ‘मिशन एम्ब्रेस’ दुनिया में पहली बार अंतरिक्ष के माहौल में इस कैप्चर टेक्नोलजी का परीक्षण करेगा। कंपनी इसे अपने बड़ी अंतरिक्ष का कचरा हटाने की योजना के लिए एक अहम कदम मानती है।
फणींद्र ने कहा,‘स्काईरूट के साथ इस मिशन के जरिये हम दिखा रहे हैं कि भारत का निजी अंतरिक्ष तंत्र सहयोग के जरिये कितनी तेजी से नवाचार कर सकता है। मिशन एम्ब्रेस उन तकनीक को आगे बढ़ाने में एक अहम पड़ाव है जो अंतरिक्ष का कचरा हटाने में मदद करेंगी।’
‘मिशन एम्ब्रेस’ के विकास की रफ्तार भी काफी दमदार है। सॉफ्ट रोबोटिक कैप्चर तकनीक को शुरुआती विचार से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक पहुंचाने में महज चार महीने लगे। कॉस्मोसर्व स्पेस को बने हुए अभी एक साल भी नहीं हुआ है।
शुरुआती अवधारणा से लेकर उड़ान के लिए तैयार हार्डवेयर तक का सफर केवल चार महीनों में पूरा कर ‘मिशन एम्ब्रेस’ दिखाता है कि कैसे भारत का उभरता हुआ निजी क्षेत्र अंतरिक्ष से जुड़ी तकनीक के विकास में लगने वाला समय तेजी से कम कर रहा है, साथ ही दुनिया भर में काम आने वाला नवाचार भी कर रहा है।
इसे तैया करने का काम एक व्यवस्थित अभियांत्रिकी और समीक्षा प्रक्रिया के तहत किया गया जिसकी देखरेख इसरो के पूर्व वैज्ञानिकों और अंतरिक्ष क्षेत्र से जुड़े अनुभवी लोगों की एक स्वतंत्र समिति ने की। उड़ान के लिए मंजूरी मिलने से पहले हर अहम पड़ाव पर सिस्टम कॉन्सेप्ट रिव्यू (एससीआर), शुरुआती विकास समीक्षा (पीडीआर), क्रिटिकल डिज़ाइन रिव्यू (सीडीआर) और उड़ान की तैयारी की समीक्षा के जरिये (एफआरआर) इस तकनीक का औपचारिक मूल्यांकन किया गया।
‘मिशन एम्ब्रेस’ कॉस्मोसर्व स्पेस के उस लंबे समय के नजरिये का पहला अहम पड़ाव है जिसका मकसद एडीआर और इन-ऑर्बिट सर्विसिंग (कक्षा में मरम्मत) के लिए ऐसी तकनीक तैयार करनी है जिन्हें बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जा सके। जैसे-जैसे उपग्रह समूह बढ़ रहे हैं और कक्षा में भीड़ बढ़ रही है वैसे ही बेकार हो चुके अंतरिक्ष यान पकड़ने और हटाने में मदद करने वाली तकनीक अंतरिक्ष अभियान के भविष्य के लिए जरूरी हो जाएंगी।
‘मिशन एम्ब्रेस’ के साथ कॉस्मोसर्व स्पेस कक्षा में आवश्यक ढांचा बनाने की दिशा में अपना पहला कदम उठा रहा है जिससे एक सुरक्षित, अधिक टिकाऊ और व्यावसायिक रूप से फायदेमंद अंतरिक्ष ढांचा बनाने में मदद मिलेगी।