भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा का फ्लो बढ़ाने के लिए शुरू की गई रियायती विदेशी मुद्रा अदला-बदली योजना को जारी रखने का फैसला किया है। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा कि इस योजना को समय से पहले बंद करने का कोई प्रस्ताव नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई कि इसके जरिए आगे भी देश में विदेशी मुद्रा का अच्छा फ्लो बना रहेगा।
मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद मल्होत्रा ने कहा कि इस योजना से अब तक करीब 41 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा जुटाई जा चुकी है। इसमें 36.25 अरब डॉलर की एफसीएनआर-बी जमा, 2.5 अरब डॉलर की विदेशी उधारी और 1.5 अरब डॉलर का बाहरी वाणिज्यिक कर्ज शामिल है। उन्होंने कहा कि योजना से देश की विदेशी मुद्रा स्थिति मजबूत हुई है और आगे भी इससे अच्छा फायदा मिलने की उम्मीद है।
आरबीआई ने रुपये में कमजोरी को देखते हुए जून में यह योजना शुरू की थी। इसके तहत विदेशी मुद्रा जुटाने के लिए बैंकों और अन्य माध्यमों को प्रोत्साहित किया गया। एफसीएनआर-बी जमा योजना सितंबर में समाप्त होगी, जबकि अन्य दो योजनाएं दिसंबर तक जारी रहेंगी। इस योजना में मुद्रा हेजिंग की लागत आरबीआई खुद उठा रहा है।
मल्होत्रा ने कहा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के फंडामेंटल मजबूत हैं और इस योजना से देश की बाहरी आर्थिक स्थिति और बेहतर हुई है। उन्होंने बताया कि अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया हाल में 97 से सुधरकर 95 के स्तर तक पहुंचा है। वैश्विक परिस्थितियों में सुधार होने पर रुपये में और मजबूती आ सकती है। उन्होंने कहा कि आरबीआई केवल जरूरत पड़ने पर और बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव की स्थिति में ही मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है।
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आरबीआई ने कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूती पर भी जोर दिया। गवर्नर ने कहा कि सिंचाई सुविधाओं के विस्तार, कृषि मशीनों के इस्तेमाल, बेहतर बीज और डेयरी-पशुपालन जैसी गतिविधियों से खेती पहले के मुकाबले ज्यादा मजबूत हुई है।
आरबीआई की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने कहा कि पिछले 15 वर्षों में सिंचित क्षेत्र बढ़ने, कृषि ऋण की उपलब्धता, मशीनीकरण और बेहतर फसल तकनीक से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली है। उन्होंने कहा कि इन सुधारों के कारण अब कम बारिश जैसी चुनौतियों का असर पहले की तुलना में कम होता है।