भूराजनीतिक झटकों, अमेरिकी टैरिफ की चोट और महंगाई में इजाफे के बीच भारतीय रिजर्व बैंक ने नीतिगत दरों को जस का तस रखा है। बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति के बाद मीडिया से बातचीत में यह बात कही। इस दौरान उन्होंने कई सवालों के जवाब दिए। बातचीत के मुख्य अंश:
बाजार ने आपके नीति संबंधित बयान को उम्मीद से ज्यादा नरम रुख वाला माना है। इसकी वजह यह है कि आपके महंगाई के अनुमान लगभग एक साल तक 5 प्रतिशत से ऊपर बने हुए हैं, जो लक्ष्य से करीब 1 प्रतिशत ज्यादा है। इसका मतलब यह होगा कि अगले छह महीनों में से ज्यादातर समय वास्तविक नीतिगत दर ऋणात्मक रहेगी। क्या इसका मतलब यह है कि आरबीआई ‘कोर इन्फ्लेशन’ पर अधिक ध्यान दे रहा है? क्या आरबीआई नेगेटिव, या कम से कम बहुत कम, ‘रियल पॉलिसी रेट’ से सहज है?
सबसे पहले मैं यह कहना चाहूंगा कि हम न तो ‘डोविश’ (नरम रुख वाले) हैं और न ही ‘हॉकिश’ (सख्त रुख वाले)। हमारा मानना है कि मौजूदा हालात और हमने जो अनुमान लगाए हैं, उन्हें देखते हुए यह सही पॉलिसी है। अभी काफी अनिश्चितता है, जो समय के साथ साफ होगी। हमारा फ्रेमवर्क बहुत स्पष्ट है और इसे लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए। हमारा लक्ष्य ‘हेडलाइन महंगाई’ है, न कि ‘कोर महंगाई’ या कुछ खास चीजों को छोड़कर मापी गई महंगाई। हमें ‘हेडलाइन महंगाई’ का लक्ष्य दिया गया है और हम उसी के आधार पर काम करते रहेंगे। हमारी कोशिश है कि मध्यावधि में इसे लक्ष्य के स्तर पर लाया जाए। हम ‘कोर महंगाई’ पर भी ध्यान देते हैं क्योंकि इससे हमें महंगाई के असल ट्रेंड को समझने और यह जानने में मदद मिलती है कि हेडलाइन महंगाई के किस लेवल पर आने की संभावना है।
हमने देखा है कि एफसीएनआर-बी स्कीम के जरिये 40 अरब डॉलर जुटाए गए हैं, फिर भी रुपये की कीमत में ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई है। क्या ऐसा इसलिए है कि आप अपनी फॉरवर्ड पोजीशन को स्क्वावयर-ऑफ यानी निपटान कर रहे हैं और डॉलर बाजार में नहीं आ रहा है?
मुझे लगता है कि हमारी भारतीय अर्थव्यवस्था के बुनियादी आधार बहुत मजबूत हैं, जैसा कि मैंने पहले भी कहा है। कुछ लोगों का यह तर्क हो सकता है कि शायद नॉमिनल या रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट के हिसाब से इसका मूल्यांकन कम आंका गया है। इसमें काफी अनिश्चितता है।
आरबीआई की बैलेंस शीट पर एफसीएनआर-बी संग्रह का क्या असर होता है? आरबीआई को जो स्वैप पोजीशन मिलेंगी, उनसे निपटने की आपकी क्या योजना है?
हम स्वैप करते हैं। हम विदेशी मुद्रा खरीदते और बेचते हैं और इसके परिणामस्वरूप जो भी हमारे रिजर्व बनते हैं, उनके लिए एक उच्च-स्तरीय समिति होती है जिसमें सरकार के सदस्य शामिल होते हैं। हम तय करते हैं कि रिजर्व को कैसे मैनेज करना है।