वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भारतीय संसद ने शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968 पारित किया, जिसके तहत ऐसी संपत्तियों को गृह मंत्रालय के अधीन एक प्राधिकरण, भारत के लिए शत्रु संपत्ति संरक्षक (सीईपीआई) को सौंप दिया गया
महाराष्ट्र सरकार ने शत्रु संपत्तियों की खरीद-बिक्री पर स्टांप शुल्क माफ करने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य नीलामी में भागीदारी बढ़ाना है। इस निर्णय के साथ ही दक्षिण मुंबई के पॉश इलाके मलाबार हिल में स्थिति एक बंगला फिर से चर्चा में आ गया। यह कोई आम बंगला नहीं बल्कि इसी बंगले में भारत के विभाजन की योजना बनी थी। जी हां, जिन्ना हाउस के नाम से मशहूर यह बंगला पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना का हुआ करता था जिसे जिन्ना ने लंदन से लौटने के बाद 1936 में बनवाया था। जिन्ना हाउस की वर्तमान कीमत 2,600 करोड़ रुपये आंकी जा रही है।
शत्रु देशों की संपत्तियां उन लोगों की संपत्तियां हैं जो उन देशों में चले गए जिन्हें भारत शत्रु मानता है, मुख्य रूप से पाकिस्तान और चीन। वर्ष 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भारतीय संसद ने शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968 पारित किया, जिसके तहत ऐसी संपत्तियों को गृह मंत्रालय के अधीन एक प्राधिकरण, भारत के लिए शत्रु संपत्ति संरक्षक (सीईपीआई) को सौंप दिया गया। यह कानून शत्रु देशों के नागरिकों और उनके उत्तराधिकारियों को ऐसी संपत्तियों को हस्तांतरित करने, बेचने या विरासत में प्राप्त करने से रोकता है।
वर्ष 2017 में, अधिनियम में संशोधन किया गया ताकि सीईपीआई को केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति से शत्रुतापूर्ण संपत्तियों को बेचने या उनका निपटान करने की अनुमति मिल सके। बिक्री आमतौर पर निविदाएं आमंत्रित करके या कोटेशन प्राप्त करके ई-नीलामी के माध्यम से की जाती है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस शत्रु संपत्ति पर कहते हैं कि इसकी खरीद-बिक्री के समय पहली पंजीकरण प्रक्रिया में स्टांप शुल्क माफ करने को मंजूरी दी गई है। ये संपत्तियां कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी ऑफ इंडिया द्वारा प्रबंधित की जाती हैं। महाराष्ट्र में कुल 428 शत्रु संपत्तियां हैं। इन संपत्तियों की नीलामी में कम प्रतिक्रिया मिलती थी।
स्टांप शुल्क माफी से खरीद लागत घटेगी और खरीदारों की संख्या बढ़ने की उम्मीद है। भारत का शत्रु संपत्ति संरक्षक (सीईपीआई), जो केंद्र सरकार के गृह विभाग के नियंत्रण में है, शत्रु संपत्ति का संरक्षण, प्रबंधन और विक्रय करता है।
महाराष्ट्र राजस्व, पंजीकरण एवं मुद्रांक शुल्क विभाग के अधिकारियों ने बताया ये उन नागरिकों की संपत्तियां हैं जिन्होंने युद्ध के दौरान भारत छोड़कर शत्रु देशों में पलायन किया था। सीईपीआई ऐसी संपत्तियों की बिक्री के लिए नीलामी आयोजित करता है।
हालांकि, इन नीलामियों में कम ही खरीदार आते हैं। इसके लिए स्टांप शुल्क माफ करने का निर्णय लिया गया है। यह निर्णय सीईपीआई द्वारा राज्य सरकार से किए गए अनुरोध के बाद लिया गया। गौरतलब है कि मुंबई में स्टांप शुल्क छह फीसदी लगता है।
महाराष्ट्र में शत्रु संपत्तियों का सरकारी मूल्य 12,900 करोड़ रुपये है हालांकि इनका बाजार मूल्य करीब एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। रियल एस्टेट और प्रशासनिक मामलों के जानकारों का कहना है कि मुंबई में जगह की कमी है और राज्य सरकार एवं केंद्र सरकार के कई कार्यालय किराये की इमारतों से काम करते हैं।
ऐसे में कुछ आइकॉनिक प्रॉपर्टी को सरकार को अपने पास रखना चाहिए जहां सरकारी दफ्तर खोले जा सके जबकि कुछ को नीलाम कर देना चाहिए। इससे सरकार को आय भी होगी और उसकी जरूरतें भी पूरी हो जाएगी।
एयू कॉर्पोरेट ऐंड लीगल एडवाइजरी सर्विसेज लिमिटेड (एयूसीएल) के संस्थापक अक्षत खेतान कहते हैं कि मुंबई के संदर्भ में शत्रु संपत्ति हालिया नीतिगत बदलाव, जैसे ई- नीलामी के जरिये बिक्री और स्टांप ड्यूटी में छूट आर्थिक रूप से व्यावहारिक और सरकारी राजस्व बढ़ाने के लिहाज से सही कदम है, खासकर तब जब ये संपत्तियां दक्षिण और मध्य मुंबई जैसे प्राइम इलाकों में वर्षों से विवादों और उपेक्षा के कारण जर्जर हालत में पड़ी हैं।
लेकिन दूसरी ओर, मानवीय दृष्टि से यह भी सच है कि कई परिवार दशकों से इन मकानों या दुकानों में रह रहे हैं, किराया देते रहे हैं और उनका जीवन इन्हीं जगहों से जुड़ा रहा है, इसलिए बिना वैकल्पिक नीति या पुनर्वास के केवल नीलामी-केंद्रित दृष्टिकोण सामाजिक असंतोष और कानूनी टकराव बढ़ा सकता है।
इसलिए मुंबई जैसे संवेदनशील शहरी माहौल में सरकार को सख्त कानून के साथ-साथ केस-टू-केस मानवीय समाधान, पारदर्शिता और दीर्घकालिक निवासियों के लिए स्पष्ट नीति अपनानी चाहिए, ताकि राष्ट्रीय हित और सामाजिक न्याय दोनों के बीच संतुलन बना रहे।
महाराष्ट्र में 428 शत्रु संपत्तियां हैं, जिनमें से 239 सिर्फ मुंबई में हैं। इनमें से 62 मुंबई महानगर में हैं, जबकि 177 उपनगरों में हैं। राज्य के अन्य भागों में, ठाणे में 86, पालघर में 77, रत्नागिरि में 11, नागपुर में 6, पुणे में 4, छत्रपति संभाजीनगर में 2, जालना में 2 और सिंधुदुर्ग में 1 संपत्ति है।
मुंबई में मौजूद शत्रु संपत्तियों में की पुराने बंगले, सिनेमा हॉल, चॉल और फ्लैट्स शामिल हैं। जिनमें ताड़देव की डायना टॉकीज बिल्डिंग, बोरी चॉल, कोलाबा की दो इमारतें, मोती सिनेमा और कांदिवली की काले खां चाल शामिल है।
2017 में अधिनियम में संशोधन के बाद इन संपत्तियों की निगरानी तेजी कर दी गई लेकिन इनके नीलामी में खास तेजी नहीं आ सकी। मुंबई की सबसे चर्चित शत्रु संपत्ति में जिन्ना हाउस का नाम आता है।
यह जिन्ना हाउस ही था जहां पाकिस्तान को अलग देश बनाने की योजना पर चर्चा हुई थी। कहा जाता है कि इसी बंगले में जिन्ना ने सितंबर 1944 महात्मा गांधी से भारत के विभाजन पर निर्णायक वार्ता की थी। इसके बाद 15 अगस्त, 1946 को जिन्ना ने जवाहरलाल नेहरू के साथ पाकिस्तान के निर्माण के बारे में एक और दौर की बातचीत की। विभाजन के बाद जिन्ना पाकिस्तान चले गए। वर्ष 1949 में जिन्ना हाउस को शत्रु संपत्ति घोषित कर दिया और भारत सरकार ने इसका नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया। इसे ब्रिटिश उच्चायोग को आवंटित किया गया था, जो 1981 तक जिन्ना हाउस से काम करता था, उसके बाद वे वहां से चले गए।
पाकिस्तान ने भारत सरकार से अनुरोध किया कि उसे जिन्ना हाउस को अपने वाणिज्य दूतावास के रूप में इस्तेमाल करने की अनुमति दी जाए, हालांकि ये संभव नहीं हुआ।
मोहम्मद अली जिन्ना ने अपनी वसीयत में अपनी अविवाहित बहिन फातिमा जिन्ना को इस बंगले सहित अपनी संपत्तियों का एकमात्र उत्तराधिकारी बनाया। विभाजन के समय फातिमा जिन्ना पाकिस्तान चली गईं। बाद में वर्ष 1962 में फातिमा ने बंबई हाई कोर्ट से उत्तराधिकार का प्रमाण पत्र प्राप्त किया, लेकिन यह शत्रु संपत्ति अधिनियम, 1968 के कानून बनने से पहले की बात है। उसके बाद जिन्ना की एकमात्र बेटी दीना वाडिया ने जो एक भारतीय से विवाह करके भारत में बस गई थीं भारत सरकार से लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
दीना वाडिया ने वर्ष 2007 में बंबई हाईकोर्ट में दावा किया कि वह जिन्ना की इकलौती संतान होने के नाते उनकी संपत्ति की वारिस हैं। विदेश मंत्रालय ने जिन्ना हाउस सहित जिन्ना की संपत्तियों के कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में दीना वाडिया के दावे को खारिज कर दिया। वर्ष 2017 में पारित शत्रु संपत्ति (संशोधन) अधिनियम कानून केंद्र को शत्रु संपत्ति का मालिक बनाता है। अब जिन्ना हाउस केंद्र सरकार की संपत्ति है।
यह बंगला जिन्ना हाउस के नाम से मशहूर था, लेकिन इसका मूल नाम साउथ कोर्ट था। जिन्ना हाउस का निर्माण मोहम्मद अली जिन्ना ने वर्ष 1936 में इंगलैंड से लौटने के बाद करवाया था। जिन्ना हाउस की वास्तुकला यूरोपीय शैली की है जिसे क्लाउड बैटले ने डिजाइन किया था, जो भारतीय वास्तुकार संस्थान के पूर्व प्रमुख थे। जिन्ना हाउस के निर्माण के लिए विशेष रूप से इटली से प्रशिक्षित राजमिस्त्री भारत बुलाए गए थे। कहा जाता है कि मोहम्मद अली जिन्ना ने इस आलीशान बंगले को 2 लाख रुपये से बनवाया था। वर्ष 1936 में यह रकम बहुत ज्यादा हुआ करती थी।
मौजूदा समय में इस बंगले की कीमत 2,600 करोड़ रुपये आंकी जा रही है। 2.5 एकड़ भूमि पर फैले इस बंगले का निर्माण इतालवी संगमरमर और अखरोट की लकड़ी से किया था। लेकिन चार दशकों से ज्यादा समय से यह बंगला वीरान पड़ा है।
शत्रु संपत्ति की देखरेख और हिसाब रखने वाली संस्था सीईपीआई (कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी फॉर इंडिया) करती है। इस संस्था के अनुसार, देशभर में कुल 13,252 शत्रु संपत्तियां हैं। इसमें 12,485 संपत्तियां पाकिस्तान के नागरिकों की हैं, जबकि 126 चीनी नागरिकों की हैं। सबसे ज्यादा 6,255 शत्रु संपत्ति उत्तर प्रदेश में हैं, जबकि 4,088 संपत्ति पश्चिम बंगाल में हैं।