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Explainer: 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड क्या है और इस पर सबकी नजर क्यों रहती है? 

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सरकारी बॉन्ड दरअसल वह कर्ज होता है जो सरकार निवेशकों से लेती है। बॉन्ड यील्ड वह रिटर्न है, जो निवेशकों को उस बॉन्ड को खरीदकर रखने पर मिलता है

Last Updated- May 21, 2026 | 4:01 PM IST
Bonds

10-Year Government Bond: पिछले कुछ सप्ताह में अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड (US Treasury yields) में तेज बढ़ोतरी ने वैश्विक बाजारों को अस्थिर कर दिया है। वित्तीय परिस्थितियों को कड़ा बनाया है और इस बात पर फिर से ध्यान केंद्रित किया है कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं को अमेरिकी बॉन्ड बाजार की चाल के साथ कितनी निकटता से तालमेल बैठाना चाहिए। अमेरिका के बेंचमार्क 10-वर्षीय ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड इस महीने 4.6 फीसदी से ऊपर पहुंच गई, जो लगभग एक साल के उच्चतम स्तर के करीब थी। हालांकि, बुधवार को इसमें थोड़ी नरमी आई। ट्रेडिंग इकोनॉमिक्स के आंकड़ों के अनुसार, 19 मई को यह यील्ड 4.61 फीसदी पर थी।

यील्ड में इस उछाल के पीछे कई कारण एक साथ एक्टिव रहे। इनमें अमेरिका में लगातार बनी महंगाई की चिंताएं, ईरान संघर्ष के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेजी, अमेरिकी राजकोषीय घाटे के और बढ़ने की आशंका तथा फेडरल रिजर्व की संभावित ब्याज दर कटौती को लेकर बाजार की बदली हुई उम्मीदें प्रमुख रहीं।

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल (Brent crude) की कीमत 109 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने के बाद तेल की कीमतें इस तेजी की बड़ी वजह बन गईं। निवेशकों के बीच यह धारणा मजबूत होने लगी कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व लंबे समय तक ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रख सकता है।

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अमेरिका की राजकोषीय स्थिति को लेकर चिंताओं ने भी बाजारों को झटका दिया। मूडीज (Moody’s) ने बढ़ते कर्ज और ब्याज लागत का हवाला देते हुए पिछले साल अमेरिका की सॉवरेन क्रेडिट रेटिंग को ‘Aaa’ से घटाकर ‘Aa1’ कर दिया था। विश्लेषकों ने चेतावनी दी कि लॉन्ग टर्म अमेरिकी सरकारी बॉन्ड रखने के बदले निवेशक अब ज्यादा यील्ड की मांग कर सकते हैं।

यील्ड में बढ़ोतरी का असर तेजी से वैश्विक बाजारों में भी दिखाई दिया। आम तौर पर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड बढ़ने से डॉलर मजबूत होता है। निवेश अमेरिकी एसेट की ओर आकर्षित होता है और भारत जैसे उभरते बाजारों में निवेश अपेक्षाकृत कम आकर्षक लगने लगता है।

भारत भी इन दबावों से अछूता नहीं रहा। इस सप्ताह रुपया गिरकर नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया और कुछ समय के लिए डॉलर के मुकाबले 97 के करीब चला गया। वहीं, रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को डॉलर की आक्रामक बिक्री के जरिए मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप बढ़ाना पड़ा।

इन घटनाओं को देखते हुए, आरबीआई ने बुधवार को 5 अरब डॉलर के डॉलर-रुपया बाय-सेल स्वैप नीलामी की घोषणा की, जिसकी अवधि तीन साल होगी और यह 26 मई को आयोजित की जाएगी। इसका उद्देश्य विदेशी मुद्रा बाजार में लगातार हस्तक्षेप से कम हुई बैंकिंग सिस्टम की नकदी (liquidity) को फिर से मजबूत करना है।

बैंकरों ने रॉयटर्स से कहा कि यह कदम मुद्रा बाजार में बढ़े हुए फॉरवर्ड प्रीमियम को कम करने में भी मदद कर सकता है। दिलचस्प बात यह रही कि सप्ताह की शुरुआत में तेज उछाल के बाद बुधवार को अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड करीब 10 बेसिस अंक घटकर 4.60 फीसदी से नीचे आ गई, जिससे वैश्विक बाजारों को अस्थायी राहत मिली।

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बॉन्ड यील्ड अचानक चर्चा में क्यों?

10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड यील्ड पर एक बार फिर बाजार की नजरें टिकी हैं। इसकी वजह यह है कि अगर आरबीआई ब्याज दरों में बदलाव नहीं भी करे, तब भी बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव का असर आम लोगों और कारोबारों के लिए कर्ज की लागत पर पड़ सकता है। इससे अर्थव्यवस्था में पैसों की उपलब्धता आसान या मुश्किल हो सकती है।

दरअसल, 10-वर्षीय यील्ड को केवल मौजूदा ब्याज दर का संकेत नहीं माना जाता। यह इस बात का भी संकेत देती है कि बाजार भविष्य में महंगाई, सरकारी उधारी, आर्थिक वृद्धि, लिक्विडिटी और मौद्रिक नीति को लेकर क्या उम्मीदें लगा रहा है।

भारत में इसका बेंचमार्क 10-वर्षीय सरकारी प्रतिभूति (G-sec) की यील्ड होती है, जबकि अमेरिका में निवेशक 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड पर नजर रखते हैं। दोनों के बीच का अंतर, जिसे अक्सर भारत-अमेरिका यील्ड स्प्रेड कहा जाता है, काफी अहम होता है क्योंकि दुनियाभर के निवेशक करेंसी रिस्क और अन्य जोखिमों को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग बाजारों के रिटर्न की तुलना करते हैं।

आखिर 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड क्या है?

आसान शब्दों में समझें तो सरकारी बॉन्ड दरअसल वह कर्ज होता है जो सरकार निवेशकों से लेती है। बॉन्ड यील्ड वह रिटर्न है, जो निवेशकों को उस बॉन्ड को खरीदकर रखने पर मिलता है। बॉन्ड की कीमत और यील्ड एक-दूसरे के उलटी दिशा में चलती हैं। जब निवेशक बॉन्ड बेचते हैं तो उनकी कीमत घटती है और यील्ड बढ़ जाती है। वहीं, जब बॉन्ड की मांग बढ़ती है तो यील्ड कम हो जाती है।

10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड को बेंचमार्क माना जाता है क्योंकि यह पूरे फाइनैंशियल सिस्टम के केंद्र में होती है। इसका असर कंपनियों के कर्ज लेने की लागत, होम लोन की ब्याज दरों, इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग और लंबी अवधि के निवेश फैसलों पर पड़ता है।

आरबीआई सीधे तौर पर केवल शॉर्ट टर्म पॉलिसी रेट को कंट्रोल करता है, जैसे रीपो रेट। खुद केंद्रीय बैंक भी मानता है कि मौद्रिक नीति का असर तब दिखता है जब नीतिगत दरों में बदलाव व्यापक बाजार, ब्याज दरों और वित्तीय परिस्थितियों तक पहुंचता है। लेकिन लंबी अवधि की बॉन्ड यील्ड बाजार की ताकतों से तय होती हैं। निवेशक लगातार महंगाई के जोखिम, सरकारी वित्तीय दबाव और भविष्य की ब्याज दरों को लेकर अपनी उम्मीदों का आकलन करते रहते हैं और यही आकलन 10-वर्षीय यील्ड में दिखाई देता है।

आरबीआई की नीतिगत घोषणाओं और बॉन्ड बाजार पर किए गए अध्ययनों से पता चला है कि लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड यील्ड अक्सर मौजूदा ब्याज दर में बदलाव से ज्यादा, भविष्य में पॉलिसी किस दिशा में जा सकती है, इस संकेत पर ज्यादा प्रतिक्रिया देती हैं।

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RBI 10-वर्षीय यील्ड पर इतनी नजर क्यों रखता है?

भले ही आरबीआई सीधे तौर पर 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड तय नहीं करता, लेकिन वह इसे नजरअंदाज भी नहीं कर सकता। अगर लंबी अवधि की यील्ड तेजी से बढ़ती है तो रीपो रेट बढ़ाए बिना भी इससे अर्थव्यवस्था में पैसों की उपलब्धता आसान या मुश्किल हो सकती है। इससे कंपनियों के लिए कर्ज लेना महंगा हो जाता है, सरकार की उधारी लागत बढ़ती है और बॉन्ड पोर्टफोलियो की वैल्यू घट सकती है।

यील्ड में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए आरबीआई समय-समय पर लिक्विडिटी बढ़ाने वाले कदम, बॉन्ड खरीद और नीतिगत संकेतों जैसे उपायों का इस्तेमाल करता रहा है। हालांकि, वह लंबी अवधि की ब्याज दरों को किसी एक निश्चित स्तर पर स्थायी रूप से तय नहीं करता।

महंगाई की उम्मीदें भी यील्ड को प्रभावित करने वाला बड़ा फैक्टर हैं। आरबीआई के अनुसार, नॉमिनल ब्याज दरों में वास्तविक रिटर्न के साथ-साथ महंगाई को लेकर बाजार की अपेक्षाएं भी शामिल होती हैं।

यह स्थिति खास तौर पर तब अहम हो जाती है जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हों या सरकार बड़े पैमाने पर उधारी ले रही हो। तेल महंगा होने से महंगाई बढ़ने की आशंका तेज होती है, जबकि ज्यादा सरकारी उधारी से बाजार में बॉन्ड की सप्लाई बढ़ जाती है। दोनों ही स्थितियां बॉन्ड यील्ड को ऊपर धकेल सकती हैं।

हाल के समय में बाजार से जुड़े एक्सपर्ट्स ने महंगाई, सरकार की वित्तीय स्थिति की मजबूती और लिक्विडिटी की परिस्थितियों को लंबी अवधि की बॉन्ड यील्ड को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारण बताया है।

भारत-अमेरिका यील्ड स्प्रेड इतना अहम क्यों?

दुनियाभर के निवेशक भारतीय बॉन्ड को अकेले नहीं देखते। वे भारतीय सरकारी बॉन्ड यील्ड की तुलना अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड से करते हैं, जिसे दुनिया में सबसे सुरक्षित निवेश का मानक माना जाता है।

अगर अमेरिकी यील्ड तेजी से बढ़ती है और भारतीय यील्ड स्थिर रहती है, तो भारत और अमेरिका के बीच यील्ड का अंतर कम हो जाता है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बॉन्ड अपेक्षाकृत कम आकर्षक लगने लगते हैं। खासकर, जब करेंसी रिस्क को भी ध्यान में रखा जाए।

यील्ड अंतर घटने की स्थिति में आरबीआई भी ब्याज दरों में आक्रामक कटौती करने से बच सकता है, क्योंकि भारत और अमेरिका की ब्याज दरों में बहुत ज्यादा अंतर बनने पर रुपये पर दबाव बढ़ सकता है और विदेशी पूंजी का फ्लो प्रभावित हो सकता है। हालांकि, आरबीआई अपनी नीतियां केवल अमेरिका के मुकाबले यील्ड अंतर बनाए रखने के लिए तय नहीं करता। उसके लिए घरेलू महंगाई, आर्थिक वृद्धि और वित्तीय स्थिरता ज्यादा महत्वपूर्ण रहती है।

फिर भी अमेरिकी यील्ड में होने वाले बदलाव वैश्विक बाजारों को प्रभावित करते हैं, क्योंकि उनका असर निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में पूंजी के फ्लो पर पड़ता है।

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विदेशी निवेशकों की बढ़ती भूमिका

ग्लोबल बॉन्ड इंडाइसेस में भारत को शामिल किए जाने के बाद 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड का महत्व और बढ़ गया है। जेपी मॉर्गन ने जून 2024 से अपने उभरते बाजार बॉन्ड इंडेक्स में भारतीय सरकारी बॉन्ड को शामिल करने की घोषणा की थी। इसमें भारत की हिस्सेदारी धीरे-धीरे बढ़ाकर 10 फीसदी तक की जानी है। इस कदम से आने वाले समय में भारतीय डेट बाजार में विदेशी निवेशकों से बड़े पैमाने पर पैसिव निवेश आने की उम्मीद है।

ऐसे ग्लोबल इंडाइसेस को ट्रैक करने वाले विदेशी निवेशक लगातार कुछ प्रमुख बातों पर नजर रखते हैं। जैसे कि भारत-अमेरिका यील्ड अंतर, रुपये की स्थिरता, महंगाई का रुख और आरबीआई की नीतिगत दिशा। वैश्विक निवेशकों की भागीदारी बढ़ने के साथ भारतीय बॉन्ड बाजार भी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय परिस्थितियों से ज्यादा जुड़ते जा रहे हैं।

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First Published - May 21, 2026 | 4:01 PM IST

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